Srishti Khanda Extracted Page 481
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-481
Sanskrit Original
एवं स्तुत्वा ततो राजा ब्राह्मणान् वेदपारगान् । ब्रह्माण्डं तु गुरोः प्रादात्सविधानं पुनः क्षणात् ॥४०८॥ सर्वकामैस्ततस्तृप्तो ययौ स्वर्ग नराधिपः। तेनैव गुरुणा तच्च विभक्तं ब्राह्मणैः सह ॥४०९॥ दत्तं तेनापि चान्येभ्यो ब्रह्मांडं च नराधिप । ब्रह्मांडे भूमिदाने च ग्राही चैको न वै भवेत्॥४१०॥ गृह्णन् दोषमवाप्रोति ब्रह्महत्यां न संशयः । सर्वेषां चैव प्रत्यक्षं दातव्यं परिकीर्त्य वै॥४९१॥ दीयमानं च पश्यंति तेपि पूता भवंति हि । दर्शनादेव ते मुक्ता भवंन्त्येव न संशयः॥४१२॥ या भीमद्वादशी प्रोक्ता स्वर्ण तोयं मृगाजिनं । एतानि कृत्वा पश्यन्तु दृषटरेतैः क्रियाफलम् ॥४९३॥ अयत्मादेव लभ्येत कर्तुश्चैव सलोकता। सदा गावः प्रणम्याश्च मंत्रेणानेन पार्थिव ॥४१४॥ नमो गोम्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च । नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमोनमः ॥४१५॥ मंत्रस्य चास्य स्मरणाद्रोदानफलमाप्रुयात् । तस्मात्त्वमपि राजेद्रपुष्करे तीर्थ उत्तमे ॥४१६॥ कार्तिक्यां तु विशेषेण गोदानफलमाप्स्यसि । यत्किचिद्रिद्यते पापं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥४१७॥ पुष्करे स्नानमात्रेण तदशेषं प्रणश्यति । पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रात्तु भारत ॥४१८॥ पुष्करे तान्युपायांति कार्तिक्यां तु विशेषतः ॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे ब्रह्मांडदानं नाम चतुसिंशत्तमो5ध्याय: ॥३४॥ re द्विजश्रेष्ठों ! ध्यान करने मात्र से सभी सन्तुष्ट हो जायँ ॥४०७॥ राजा वेद पारंगत ब्राह्मणों की इसतरह से स्तुति करके विधिपूर्वक आचार्य को ब्रह्माण्ड दान किए ॥४०८॥ इसके पश्चात् सभी कामनाओं से तृप्त होकर राजा स्वर्ग चले गये । उस आचार्य ने ही सम्पूर्ण दान सामग्री को सभी ब्राह्मणों के साथ बाँट लिया ॥४०९॥ उस आचार्य ने मी दूसरे ब्रह्मणों को ब्रह्माण्ड दान किया । ब्रह्माण्ड की भूमि का दान करने में एक ही ग्रहीता को नहीं होना चाहिए।४१०॥। यदि कोई अकेले ब्रह्माण्ड का दान लेता है तो उसको ब्रह्महत्या का पाप लगता हैं, इसमें कोई मी संशय नहीं है । अतएव सबों के सामने गिनकर ब्रह्माण्ड का दान देना चाहिए ॥४११॥ दिए जाने वाले ब्रह्माण्ड का जो दर्शन करते हैं, वे लोग भी पवित्र हो जाते हैं । दर्शन करके ही वे लोग मुक्त हो जाते हैं, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है ॥४१२॥ पहले जो भीम द्वादशी बतलायी गयी है, उसका दर्शन सुवर्ण, जल तथा मृगचर्म लेकर उसका दर्शन करे । ऐसा करने का फल है कि ॥४१३॥ वह बिना प्रयास के ही ब्रह्माजी के लोक में चला जाता है। हे राजन् ! सर्वदा इस मन्त्र से गायों को प्रणाम करे ॥४१४॥ श्रीमती तथा सौरभेयी गायों को नमस्कार है । ब्रह्मसुता तथा पवित्र गायों को नमस्कार है ॥४१५॥ इस मन्त्र का स्मरण करने मात्र से गोदान करने का फल प्राप्त होता है। अतएव हे राजेन्द्र ! तुम भी उत्तम पुष्कर तीर्थ में ॥४१६॥ विशेष रूप से कार्तिक मास में गोदान करके गोदान के फल को ग्राप्त करोगे । स्त्री हो या पुरुष पुष्कर तीर्थ में स्नान करने से उसके सभी पाप विनष्ट हो जाते हें । हे भारत! समुद्र पर्यन्त जितने भी तीर्थ पृथिवी पर हैं ॥४१७-४१८॥ वे सबके सब कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर तीर्थ में आते हैं । इसतरह से श्रीपद्ममहापुराण के सृष्टिखण्ड के ब्रह्माण्डदान नामक चौतीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३४।। —— ke
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