Srishti Khanda Extracted Page 480
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-480
Sanskrit Original
मौक्तिकैश्रापि सोमस्य शोभां वज्रैर्दिवाकरे। ग्रहाणां चैव सर्वेषां सुवर्णानि च दापयेत् ॥३९२॥ ् वर्णात्सप्तगुणं रौप्यं रौप्यात्ताग्रं तथाविधम् । ततःसप्तगुणं कार्य कांस्यं सप्तगुणं तथा॥३९३॥ कांस्यात्सप्तगुणं कार्य त्रपुचैव नराधिप । त्रपुसप्तगुर्ण सीसं सीसाल्लोहं च कारयेत् ॥३९४॥ सप्तद्वीपास्समुद्राश्च सप्त वै कुलपर्वताः । अनयासंख्यया कृत्वा निपुणैः शिल्पिभिस्ततः ॥३९५॥ पादपादीनि भूतानि राजतान्येव कारयेत् । आरण्यानि च सत्त्वानि सौवर्णानि च कारयेत्॥३९६॥ वृक्षान्वनस्पतीन् गुल्मतृणपर्णानि वीरुधः । सर्वं प्रकल्प्य विधिवत्तीर्थे देयं विचक्षणैः ॥३९७॥ कुरुक्षेत्रे गयायां च प्रयागेऽमरकंटके । द्वारावत्यां प्रभासे च गङ्गाद्वारे च पुष्करे ॥३९८॥ तीर्थेष्वेतेषु वै देयं ग्रहणे शशिसूर्ययोः । दिनच्छिद्रेषु सर्वेषु अयनेदक्षिणोत्तरे ॥३९९॥ व्यतीपाते बहुगुणं विषुवे चविशेषतः । दातव्यमेतद्राजेंद्र विचारं नैव कारयेत् ॥४००॥ शालाग्निहोत्रिणं कृत्वा सुरूपं च गुणान्वितम् । सपत्नीकं च संपूज्य भूषयित्वा च भूषणैः ॥४०९॥ पुरोहितं मुख्यतमं कृत्वान्ये च तथा द्विजाः। चतुर्विशह्ठुणोपेताः सपत्नीका निमंत्रिताः ॥४०२॥ अङ्कलीयानि च तथा कर्णवेष्टं च दापयेत् । एवं विधांस्तु तान्पूज्य तेषामग्रे सुसंस्थितः ॥४०३॥ अष्टांगप्रणिपातेन प्रणम्य च पुनः पुनः । पुरोहिताय पुरतः कृत्वा वै करसंपुटम्॥४०४॥ यूयं वै ब्राह्मणाः प्रीता मैत्रत्वेनानुगृह्णत । सौमुख्येन द्विजश्रेष्ठा भूयः पूततरस्त्वहम् ॥४० ५॥ भवतां प्रीतियोगेन स्वयं प्रीतः पितामहः । ब्रह्मांडेन तु दत्तेन तोषं यातु जनार्दनः ॥४०६॥ पिनाकपाणिर्भगवान् शक्रश्च त्रिदशेश्वरः । एते तोषं समायांतु अनुध्यानाद्विजोत्तमः ॥४ ० ७॥ उनको अलंकारों में नील मणि तथा मरकत मणि लगाये । बुद्धिमान् पुरुष उनकी शोभा में गोमेद लगाये ॥३९१॥ चन्द्रमा की शोभा मोतियों से तथा सूर्य की शोभा को हीरो से बनाये । सभी ग्रहों की शोभा सुवर्ण से बनवाये॥३९२॥ इसमें सुवर्ण के सात गुना चाँदी लगाये, उसके सात गुना ताम्बा लगाये । उसके सात गुना कांस्य और कांसा के सात गुना रङ्गा लगाये । रङ्गे के सात गुना शीशा, शीशे के सात गुना लोहा लगाये ॥३९३-३९४॥ सात द्वीपां सात समुद्रं, सात कुल पर्वतों इन सबों का इसी तरह से कुशल शिल्पी से ब्रह्माण्ड मूर्ति का निर्माण करे ॥३९५॥ वृक्षों आदि को चाँदी का ही बनवाये । वन तथा उनमें रहने वाले जीवों की मूर्ति सुवर्ण की बनवाये ॥३९६॥ वृक्षों, वनस्पतियों, गुल्मों, तृणों, पत्तों तथा वीरुधों इन सबों की विधिवत् रचना करवाकर विचक्षणों को चाहिए कि वे उसका दान तीर्थ में जाकर करें ॥३९७॥ कुरुक्षेत्र, गया, प्रयाग, अमरकण्टक, द्वारका, प्रभास क्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्कर ॥३९८॥ इन्हीं तीर्थो में जाकर ग्रहण अथवा संक्रान्ति के अवसर पर, सभी दिनछिद्रों (तिथि हानियों) उत्तरायण तथा दक्षिणायन के अवसर पर ॥३९९॥ व्यतीपात योग में तथा संक्रान्ति के अवसर पर दान अधिक फलप्रद होता है । हे राजेन्द्र ! इन्हीं अवसरों पर दान करे इसमें कोई विचार न करे ॥४००॥। सुन्दर गुणवान सपत्नीक शालाग्निहोत्री सबसे मुख्य पुरोहित को अलंकारों से अलङ्कत करके, तथा चौबीस गुणों से युक्त तथा सपत्नीक दूसरे ब्राह्मणों को अंगूठी तथा कुण्डल प्रदान करे । इस प्रकार से उन ब्राह्मणों की पूजा करके उन सबों के समक्ष अच्छी तरह से खड़ा होकर ॥४०२-४०३॥ उन लोगों को बार-बार साष्टाङ्ग प्रणाम करके, पुरोहित के सामने हाथ जोड़कर ॥४०४॥ कहे कि आप सभी ब्राह्मण प्रसन्न होकर मुझे अपने मैत्रभाव से अनुगृहीत करें । आपलोगों की अनुकूलता से में अत्यन्त पवित्र हो गया हूँ ॥४०५॥। आपलोगों की प्रसन्नता से ब्रह्माजी भी स्वयं प्रसन्न हो गये हैं । ब्रह्माण्ड का दान करने से भगवान् जनार्दन प्रसन्न हो जायँ ।।४०६॥। पिनाकधारी भगवान् शङ्कर और देवेश्वर इन्द्र हे
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