Srishti Khanda Extracted Page 479
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-479
Sanskrit Original
तृष्णया क्षुधया यद्वा पीडितो राजसत्तम। तद्दानं कार्तिके देयं पूर्वं देहि नराधिप ॥३७८॥ ब्रह्मांडं सर्वसंपन्नं भूतरत्मौषधीयुतम् । देवदानवयक्षैश्च युक्तमेतत्सदा विभो ॥३७९॥ एतत्तुसकलं कृत्वा सर्वतो रजतान्वितम् । सुरत्मसूर्यचंद्राब्यं कार्तिके द्वादशी दिने॥३८०॥ अथवा पंचदश्यां तु कार्तिकस्यैव नान्यतः । पुरोहिताय गुरवे दापयेद्भक्तिमान्नरः ॥३८१॥ ब्रह्मांडोदरवर्तीनि यानि भूतानि पार्थिव । तानि दत्तानि वै तेन समासात्कथितं तव॥३८२॥ यद्यज्ञ र्यजतो राजन् समाप्तवरदक्षिणैः । सर्व फलं तत्खंडस्य ब्रह्मांडस्य विशेषतः ॥३८३॥ यः पुनः सकलं चेदं ब्रह्मांडं प्रदिशेन्नरः । तेन॒ जप्तं हुतं दत्तं पठितं कीर्तितं भवेत् ॥३८४॥ राजोवाच विधिं ब्रह्मांडदानस्य कृत्वा तत्मोक्षभागभवेत् । कालं देश विप्रतीर्थं सर्व त्वं वद मेऽनघ॥३८५॥ कृतेन येन सर्वस्य फलभागी भवाम्यहम् । कुत्सितस्यास्य भावस्य मोक्षस्स्यादचिराच्च मे ॥३८६॥ वसिष्ठ उवाच एवं श्रुत्वा ततो राजन् पुरोधास्तस्य सद्विजः। ब्रह्मांडं कारयामास सौवर्ण सर्वधातुभिः ॥३८७॥ युतं निष्कसहस्रेण पद्यं तत्र ह्यकल्पयत्। तत्र ब्रह्मा तस्य मध्ये पद्यरागैरलंकृतः ॥३८८॥ सावित्र्या चैव गायत्र्या ऋषिभिर्मुनिभिः सह। नारदाद्याः सुताः सर्व इन्द्राद्याश्च दिवौकसः ॥३८९॥ सौवर्णविग्रहाः सर्वे ब्रह्मणस्तु पुरः सराः । वराहरूपी भगवान् लक्ष्म्या सह सनातनः ॥३९०॥ नीलं मरकतं चैव भूषायां तस्य कारयेत्। गोमेदैस्तस्य वै शोभां कारयेत च बुद्धिमान् ॥३९९॥ को करने वाले ब्रह्माजी ने किया है और उसका अपार फल बतलताया है ॥३७७॥ हे नराधिप ! चाहे आप भूख से पीडित हों या प्यास से व्याकुल हों आपको उसका दान कार्तिक मास में करना चाहिए, किन्तु आप पहले ही इसका दान कर दें ॥३७८॥ हे विभो ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, भूतों, रत्नों तथा अत्रों से सम्पन्न है । तथा यह ब्रह्माण्ड देवता, दानव एवं यक्षों से युक्त है ॥३७९॥ भक्ति सम्पन्न पुरुष को चाहिए कि इन सभी दानों को करने के पश्चात् पूर्ण रूप से चाँदी सुन्दर रत्न सूर्य तथा चन्द्रमा से युक्त ब्रह्माण्ड का कार्तिक शुक्ल द्वादशी अथवा पूर्णिमा के दिन अपने आचार्य को दान दे दे ॥३८०-३८१॥ हे राजन् ! मैंने आपको संक्षेप में बतला दिया कि इस तरह से दान करने वाले व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के भीतर विद्यमान् सम्पूर्ण वस्तुओं के दान करने का फल प्राप्त होता है ॥३८२॥ श्रेष्ठ दक्षिणा के साथ समाप्त करने वाले यज्ञिकों को जो फल प्राप्त होता है, वह ब्रह्माण्ड से होने वाले फल के एक अंश के समान होता है ॥३८३॥ जो व्यक्ति इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के दान की विधि का उपदेश करता है, उसे इसके जप करने, होम करने, दान देने, पाठ करने तथा कीर्तन करने का फल प्राप्त होता है ॥३८४॥ राजा ने कहा-- जो ब्रह्माण्ड दान की विधि को सम्पन्न करता है, वह मोक्ष का पात्र होता है हे अनघ विप्र ! आप मुझे ब्रह्माण्ड दान के अनुकूल काल, देश तथा तीर्थ इन सारी बातों को बतलायें ॥३८५॥ जिसको करके मैं सबों के फल का पात्र बन जाऊं और शीघ्र ही मेरे इस निन्दित भाव से मोक्ष हो जाय ॥३८६॥ वसिष्ठ महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! उस राजा की बात को सुनकर उसके पुरोहित ने सभी मनुष्यों से युक्त सुवर्ण का ब्रह्माण्ड बनवाया उसमें हजारों निष्क जड़े गये थे । उसके ऊपर कमल का निर्माण किया | उस कमल के बीच में पद्मराग मणि से भूषित ब्रह्माजी को सावित्री देवी तथा गायत्री देवी तथा ऋषियों के साथ बनवाया । ब्रह्माजी के नारद आदि पुत्रों तथा इन्द्र आदि देवताओं की सुवर्ण मूर्तियों को ब्रह्माजी के आगे बनवाया। वही पर लक्ष्मीजी के साथ सनातन वराह भगवान् को बनवाया ॥३९०॥
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