Srishti Khanda Extracted Page 478

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-478

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Sanskrit Original

पुरोहित उवाच विधान तिलधेनोस्तु तच्छृणुष्व नराधिप ॥३६४॥ धेनुस्स्यात्वोडशाढक्या चतुभिर्वत्सको भवेत् ।इक्षु दंडमयाः पादा दन्ताः पुष्पमया: शुभा:॥३६५॥ नासागंधमयी तस्या जिह्वागुडमयी तथा । पुच्छेस्रक्कल्पनीया स्याद् घंटाभरणभूषिता॥३६६॥ ईद्दशीं कल्पयित्वा तु स्वर्णशृंगी तु कल्पयेत् । रौप्यखुरां कांस्यदोहां पूर्वधेनुविधानतः ॥३६७॥ कृत्वा तां ब्राह्मणायाशु दापयेन्मंत्रतो नृप । स्थितां कृष्णाजिने धेनुं वासोभिर्गोपितां शुभाम्॥३६८॥ सूत्रेण सूत्रिता कृत्वा पंचरत्मसमन्विताम् । सरवौषधिसमायुक्तां मंत्रपूतां तु दापयेत् ॥३६९॥ अन्नम्मेजायतां सद्यःपानं सर्वरसास्तथा । कामान् संपादयास्माकं तिलधेनो द्विजेर्पिता ॥३७०॥ गृह्णामि देवि त्वां भक्त्या कुटुम्बार्थे विशेषतः । देहि कामान्वितान्सर्वां स्तिलधेनो नमोस्तुते ॥३७९॥ एवंविधानतो दत्ता तिलधेनु जृपोत्तम। सर्वकामसमावाप्ति कुरुते नात्र संशयः ॥३७२॥ जलधेनुस्तथैवेह कुंभैरेव प्रकल्पिता । दत्ता तु विधिना कामान् सद्यः सर्वान्प्रयच्छति।३७३॥ धेनुशतं तथादत्तं पूणिमानियमेन हि । सावित्री इव वैस्वर्गे सर्वकामप्रदा भवेत् ॥३७४॥ घृतधेनुस्तथा दत्ता विधानेन विचक्षणैः। सर्वकामसमावाप्ति कुरुते कांतिदा भवेत् ॥३७५॥ रसधेनुस्तथादत्ता कार्तिके मासि पार्थिव । सर्वान् कामान प्रयच्छेत्तु नित्यं सा गतिदा भवेत्।३७६॥ एत्तते सर्वमाख्यातं समासाइइहुविस्तरम् । अपारं फलमुष्दिष्टं ब्रह्मणा सर्वकर्मणा ॥३७७॥ राजा ने फिर उनसे पूछा ॥३६३॥ आप मुझे तिलधेनु का रूप बतलाइये वैसा करके मैं दान देता हूँ । पुरोहित ने कहा-- हे राजन् ! आप तिल धेनु के विधान को सुनो ॥३६४।। सोलह आढक की गौ बनाये, चार आढक का बछड़ा बनाये । इक्षु दण्ड से उसके पैरों को बनाये तथा पुष्पों से उसके दाँतों को बनाये ॥३६५॥ सुगन्धित द्रव्य से उसकी नाक तथा गुड से उसकी जीभ बनाये । माला से उसकी पूंछ बनाये तथा उसको धण्टा रूपी आभरण से अलङ्कृत करे ॥३६६॥ इसतरह से तिलधेनु को बनाकर सुवर्ण का उसका सींग बनाये । चाँदी से खुरों को तथा कांस्य निर्मित दोहन पात्र के साथ पूर्व वर्णित विधि पूर्वक दान दे ॥३६७॥ हे नृप ! इस तरह से गौ का निर्माण करके उसे मन्त्र पूर्वक दान देना चाहिए । उस धेनु को काले मृग चर्म पर रखकर वखों से ढंक दे ॥३६८॥ पञ्चरत्नों से युक्त सूत्र से उसे सूत्रित (बाँध) करके सभी प्रकार के अन्नों के साथ मन्त्र से पवित्र बनी हुयी उस गौ को ब्राह्मण को दान दे दे ॥३६९॥ उसके बाद प्रार्थना करे हे तिल धेनो ! मुझे शीघ्र ही अन्न, पान तथा सभी प्रकार के रसों की प्राप्ति हो और मेरी सारी कामनाओं को पूर्ण करो ॥३७०॥ हे देवि ! मैं कुटुम्ब के लिए आपको ग्रहण करता हुँ अतएव तुम सारी कामनाओं को पूरा करो ।हे तिलधेनो ! तुम्हें नमस्कार है ॥३७१॥ हे नृप ! इस विधान से दी गयी तिलधेनु दाता की सारी कामनाओं की पूर्ति कर देती है, इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥३७२॥ उसी तरह घड़ों से जल धेनु की कल्पना करनी चाहिए । दान दी गयी जल धेनु दाता की शीघ्र ही सभी कामनाओं को पूर्ण कर देती है ॥३७३॥ पूर्णिमा को नियम से सौ धेनुओं का दान करने से वह दाता की सारी कामनाओं की उसी तरह से पूर्ति करती हैं जिस तरह माता अपने पुत्र की कामनाओं को पूर्ण करती है ॥३७४॥ विचक्षण पुरुषों द्वारा दान की गयी घृतधेनु दाता की सारी कामनाओं को पूर्ण करके उसे कान्ति प्रदान करती है ॥३७५॥ हे पार्थिव! कार्तिक के महीनें में दान दी गयी रसधेनु सभी कामनाओं को प्रदान करके नित्य गति (मुक्ति) को प्रदान करने वाली होती है ॥३७६॥ इस तरह मैने संक्षेप में सारी बातें बता दी और इसका बहुत अधिक विस्तार से वर्णन सभी कर्मो

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