Srishti Khanda Extracted Page 477
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-477
Sanskrit Original
रत्नहेमप्रदानेने भोगवान् जायते नर: । अन्नदानप्रदानेन सर्वकामैः प्रदीपित: ॥३५९॥ तन्न दत्तं त्वया राजन् स्तोकं मत्वा नराधिपः । श्वेत उवाच अदतस्य च संभूतिर्यथा भवति मे गुरो ॥३५२॥ वसिष्ठ त्वत्प्रसादेन तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः । वसिष्ठ उवाच अस्त्येकं कारणं येन जायते नात्र संशयः ॥३५३॥ तच्छृणुष्व नरव्याघ्र कथ्यमानं मया तव। आसीद्राजापुरा कल्पे विनीताश्वेति कीर्तितः ॥३५४॥ सचाश्वमेधमारेभे यज्ञं कर्तु वरं नृपः । यजनांते द्विजेंद्रेभ्यो दत्तं गोश्वादि याचितम् ॥३५५॥ नान्नं दत्तं तेन किंचित् स्वल्पं मत्वा यथा त्वया । ततः कालेन महतामृतोऽसौ जाह्नवीतटे ॥३५६॥ मायापुर्या विनीताश्च: सार्वभौमोऽ भवन्नप: । स्वर्गं च गतवान्योपि यथा राजाभवाम्प्रभो ॥३५७॥ असावपि क्षुधाविष्ट एव मेवागतो भवत् । मर्त्यलोके नदीतीरे गङ्गायां नीलपर्वते॥३५८॥ विमानेनार्कवर्णेन भास्वता देववन्जप । ददर्शतत्स्वकं देहं तथास्वं च पुरोहितम् ॥३५९॥ होतारं ब्राह्मणं नाम यजंतं जाह्नवी तटे । तं दृष्ट्वासावपि पुनः पर्यपृच्छदिद्दजोत्तमम् ॥३६०॥ क्षुघाया: कारणं राजन् स होता तमुवाच ह । तिलधेनुं च वै राजन् घुृतधेनुं च सत्तम ॥३६९॥ जलधेनुं च धेनुं च रसधेनुं च पार्थिव । देहि शीघ्रं येन भवास्तृट्क्षुधावर्जितो दिवि ॥३६२॥ रमेत यावदादित्यस्तपते दिवि चंद्रमाः । एवमुक्तस्ततो राजा तं पुनः पृष्टवानिदम् ॥३६३॥ तिलधेनुस्थितिं ब्रूहि तथा कृत्वा ददाम्यहम् । का दान करने से जीव परलोक में भोग सम्पन्न होता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं है । अन्न दान करने से उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३५१॥ हे राजन् ! तुमने अपने को राजा मानकर थोड़ा सा भी अन्न दान नहीं किया। श्वेत राजा ने कहा-- हे गुरो ! यद्यपि मैंने दान नहीं दिया फिर भी मुझे आप उस उपाय को बतलाइये कि मुझे अन्न की प्राप्ति हो । हे वसिष्ठ मैं आपसे उस उपाय को पूछता हूँ, मुझे वतलाइये । वसिष्ठ ने कहा-- एक उपाय है, उसी से यह सम्भव हे ॥३५३॥ उसे में बतलाता हूँ, हे राजन् ! उसे आप सुनिये । इससे पहले के कल्प में विनीताश्च नामक राजा थे ॥३५४॥ उस राजा ने अश्वमेघ यज्ञ करना प्रारम्भ किया । यज्ञ के अन्त में याचकों ने जो माँगा उन्हें गौ तथा अश्व इत्यादि को राजा ने दान दिया ॥३५५॥ तुम्हारे ही समान अपने को राजा मानकर उसने थोड़ा सा भी अन्न दान नहीं किया । बहुत दिनों के बाद वह राजा गङ्गा के तट में अपने प्राणों का परित्याग किया॥३५६॥ उसकी मृत्यु मायापुरी हरिद्वार में हुयी । मृत्यु के पश्चात् वह भी राजा आपके ही समान स्वर्ग गया॥३५७।। वह भी भूख से व्याकुल होकर विमान से नील पर्वत पर गङ्गा नदी में आता था ॥३५८॥ उसका विमान सूर्य के समान चमकता था । वहाँ पर उसने अपने शरीर तथा अपने पुरोहित को देखा ॥३५९॥ वे ब्राह्मण होता थे और गङ्गा नदी के तट पर पूजन करते थे । उन ब्राह्मण को देखकर राजा ने उनसे पूछा ॥३६०॥ उसके बाद उन ब्राह्मण श्रेष्ठ ने भूख का कारण बतलाते हुए कहा हे राजन् ! आप तिल धेनु, धृत धेनु ॥३६१५॥ जल धेनु तथा रस धेनु का दान करें । ऐसा ही करने से तुम्हारे भूख और प्यास की शान्ति होगी ॥३६२॥ ऐसा करने वाला जीव स्वर्ग में तब तक आनन्दानुभव करता है जब तक स्वर्ग में सूर्य और चन्द्रमा रहते हें । इस तरह से कहने पर
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know