Srishti Khanda Extracted Page 476

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-476

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Sanskrit Original

पुलस्त्य उवाच नान्नेन किंचित्तेन दत्ते होम्रिद्विजे प्रभो । नकिंचिद्वस्त्वितिज्ञात्वा न दत्तं तत्कदाचन ॥३३६॥ रक्तवसत्रमलंकारं ग्रामांश्च नगरफणि च। अददाद्वाह्मणेभ्योऽसौ श्वेतो राजा महायशाः ॥३३७॥ नान्नं जलं तेन राज्ञा दत्तमासीत्कदाचन । ततोश्वमेधैर्बहुभिर्यज्चासौ नृपसत्तम ॥३३८॥ स्वर्ग गतः पुण्यजितं तपस्तप्त्वार्बुदत्रयम्। ब्राह्मी सलोकतां प्राप्तः सर्वालंकार भूषितः ॥३३९॥ ृ त्यंत्यप्सरसस्तत्र गायते सिद्धयोषितः । तुंबुरुर्नारदस्तत्र द्वावप्यनुगतौ सदा॥३४०॥ अगायेतां महाप्राज्ञौ मुनयश्च तपोन्विताः । वेदोक्तमंत्रैः स्तुन्वंति अनेकक्रतुयाजिनम् ॥३४१॥ एवंविभवयुक्तस्य राज्ञस्तस्य महात्मनः । क्षुधयापीड्यते देहं तृष्णया च विशेषतः ॥३४२॥ स तयापीड्यमानस्तु क्षुधया राजसत्तमः । विमानेनाप्यसौस्वर्गं त्यक्त्वागादृक्ष पर्वतम् ॥३४३॥ चत्रात्मूर्तिस्तत्रागात्परा दग्धा महावने । तत्रास्थीनि स्वयं गृह्य लिहन्नास्ते सपार्थिवः ॥३४४॥ पुनर्विमानमारुह्ण ययौ नाकं नराधिपः। अथ कालेन महता स राजा संशितव्रतः ॥३४५॥ स्वान्यस्थीनिलिहन् दृष्टो वसिष्ठेन पुरोधसा। उक्तश्चकिन्नुराजेंद्र स्वास्थिभक्षो नराधिप ॥३४६॥ एवमुक्तस्ततो राजा वसिष्ठेन महर्षिणा । उवाच वचनं चेदं श्वेतो राजाथ तं मुनिम् ॥३४७॥ भगवस्तृट्क्षुधार्तोहमन्नदानं पुरा मया। न दत्तं मुनिशार्दूल तेन मां क्षुत्प्रबाधते ॥३४८॥ एवमुक्तस्तदा राज्ञा वसिष्ठो मुनिपुंगवः । उवाच तं तृपं भूयो वाक्यमेतन्महामुनिः ॥३४९॥ किन्ते करोमि राजेंद्र क्षुधितस्य विशेषतः । वस्तुकस्यापि किंचिद्धि नादत्तमुपतिष्ठति ॥३५०॥ का दान देना चाहता हूँ । हे गुरो ! मैं पृथिवी पर अन्न दान नहीं करना चाहता हूँ ॥३३५॥ सुवर्ण दान कर देने पर अन्न दान देने का क्या महत्त्व है ? उस राजा ने किसी भी वस्तु को अदेय समझकर दान नहीं किया हो ऐसी बात नहीं है ॥३३६॥ महा यशस्वी राजा श्वेत ने रंगीन वख, अलङ्कार, ग्रामों तथा नगरों को ब्राह्मणों को दान दिया॥३३७॥ किन्तु उस राजा श्वेत ने कभी अन्न का तथा जल का दान नहीं दिया । उसके बाद राजा ने अनेक अश्वमेघ यज्ञां को किया ॥३३८॥ उस श्रेष्ठ राजा अपने पुण्य के प्रभाव से तीन अरब वर्षो तक तपस्या करके, सभी अलङ्कार से अलङ्कृत होकर ब्रह्माजी के लोक में गये ॥३३९॥ उस राजा के सन्निकट अप्सरायें नृत्य करती थीं और सिद्धों की नारियाँ गीत गाती थीं । राजा के साथ सदा तुम्बुर और नारदजी दोनों रहते थे ॥३४०॥ ये दोनों सदागायन करते थे तथा तपस्वी दूसरे महर्षिगण उस राजा की वेदोक्त मन्त्रों से स्तुति करते रहते थे ॥३४१॥ इसतरह से ऐश्वर्य युक्त भी वह राजा सदा भूख तथा प्यास से पीडित रहता था ॥३४२॥ भूख से व्याकुल उस राजश्रेष्ठ ने स्वर्ग का त्याग कर दिया और विमान से ऋक्ष पर्वत पर आया ॥३४३॥ वह उस महावन में गया जहाँ पर उसका शरीर जलाया गया था वहाँ पर उसकी जो अस्थियाँ पड़ी थीं उसी को वह चाटने लगा ॥३४४॥ उसके बाद विमान पर चढकर स्वर्गलोक चला गया । बहुत समय बाद उस श्रेष्ठ राजा को महर्षि वसिष्ठ ने हड्डियों को चाटते हुए देखा और पूछा राजेन्द्र तुम इन हड्डियों को क्यों चाटते हो ?॥३४५-३४६॥ इसतरह से पूछने पर राजा श्वेत ने तपस्वियों में श्रेष्ठ महामुनि वसिष्ठ से कहा ॥३४७॥ हे मुने ! में भूख और प्यास से व्याकुल हुँ । इसका कारण है कि मैंने सब कुछ दान किया; किन्तु अन्न और जल का दान नहीं किया । इसीलिए मुझे भूख बाधित करती है । इस तरह से राजा के कहने पर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने उस राजा से कहा ॥३४८-३४९॥ हे राजन् ! तुम्हारे भूख की शान्ति के लिए मैं कौनसा उपाय करूँ ? मनुष्य जो वस्तु दान करता है, स्वर्ग में उसको वहीं वस्तु मिलती है ॥३५०॥ रत्नों तथा सुवर्ण

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