Srishti Khanda Extracted Page 475

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-475

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Sanskrit Original

BR श्रीपद्ममहापुराण तस्य सानुग्रहाः सर्वे शांतिं यच्छंति नान्यथा । शनैश्चरं राहुकेतू लोहपात्रेषु विन्यसेत् ॥३२३॥ लोहेन कारयेच्चैनान् ब्राह्मणेभ्यश्च दापयेत्। कृष्णं वस्त्रयुगं देयमेतेषां प्रीणनाय वै ॥३२४॥ सौवर्णांगाश्च दातव्याः शांतिश्रीविजयेप्सुभिः । व्रतांते सर्वएते हि ग्रहास्सौवर्णका नृप ॥३२५॥ दातव्याः शांतिमिच्छद्िब्रतांते द्विजभोजनम् | यथाशक्ति दक्षिणा च ग्रहाणां प्रीतये तथा ॥३२६॥ अल्पायासेन राजेंद्र सर्वन्कामानवापुयात् । शङ्कराज्ज्ञानमन्विच्छेदारोग्यं भास्करात्तथा॥३२७॥ हुताशनाद्धनमिच्छेद्रतिमिच्छेज्ज्मार्दनात् । ब्राह्म्यं पितामहाच्चैव सर्वजन्तु प्रशांतिदम् ॥३२८॥ भीष्म उवाच यस्त्वया कथितो यज्ञो यज्वनां तु फलं महत् । तथायुषस्स्वल्पतया अन्यैः प्राप्तुं न शक्यते॥३२९॥ स्वल्पायासेन यत्पुण्यं संवत्सरमुपोषणम् । भवेत्तन्मे मुनि श्रेष्ठ कथयस्व महाफलम्॥३३०॥ पुलस्त्य उवाच इदमर्थ महाराज श्वेतो राजा महायशाः । वसिष्ठं पृष्टावान्प्रश्नंक्षुधया पीडितो भृशम् ॥३३९॥ आसीदिलावृते वर्षे श्वेतो राजा महाबलः । स महीं सकलां जिग्ये सप्तद्वीपां सपत्तनाम् ॥३३२॥ ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठश्च आसीत्तस्य पुरोहितः । सकदाचिज्न्पश्रेष्ठो जित्वा परमधार्मिकः ॥३३३॥ पुरोहितमुवाचेदं वसिष्ठं जपतां वरम् । श्वेत उवाच भगवन्नश्वमेधानां सहस्रं कर्तुमुत्सहे ॥३३४॥ सुवर्णरूप्यरत्नानां दानं कर्तुं द्विजातिषु । पृथिव्यामन्नदानं तु नेच्छामि वै गुरो ॥३३५॥ ब्रत करता है ॥३२२॥ उसको सभी ग्रह शान्ति प्रदान करने वाले बन जाते हैं । शनिश्चर, राहु तथा केतु की मूर्ति को लोहे के पात्र में रखे और दो काले वस्र के साथ उसे ब्राह्मण को दान दे जिससे कि ये सभी ग्रह प्रसन्न रहें ॥३२३-३२४॥ शान्ति, श्री तथा विजय चाहने वाले को चाहिए कि वे इन सभी ग्रहों की सुवर्ण की मूर्ति बनवाकर दान दें । हे नृप त्रत के अन्त मे इन सुवर्ण निर्मित ग्रहों का ॥३२४॥ शान्ति चाहने वालों को ब्राह्मणों को दान दे देना चाहिए तथा ग्रहों की प्रसन्नता के लिए अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए ॥३२६॥ हे राजेन्द्र ! ऐसा करके मनुष्य थोड़े प्रयास के द्वारा अपने समस्त कामनाओं को पूरा कर लेता है । शङ्करजी से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा करे, सूर्य से आरोग्य प्राप्ति की इच्छा करे ॥३२७॥ अग्नि से धन प्राप्ति की इच्छा करे और मुक्ति की प्राप्ति की इच्छा भगवान् विष्णु से करे, सभी जीवों को शान्ति प्रदान करने वाले ब्रह्मवर्चस की ब्रह्माजी से प्राप्त करने की इच्छा करे ॥३२८॥ भीष्मजी ने कहा-- आपने जो पूजन करने वालों के लिए अल्प प्रयास से महान फल वाला यज्ञ बतलाया है, अन्य साधनों से उस तरह की आयु आदि की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥३२९॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! थोड़े प्रयास से एक वर्ष तक किए जाने वाले व्रत से जिस महान् फल की प्राप्ति होती है उसे आप मुझे बतलायें ॥३३०॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसी प्रकार का प्रश्न महाराज श्वेत ने वसिष्ठजी से किया था वे उस समय बहुत अधिक भूखे थे ॥३३१॥ इलावृत्त वर्ष के महाबलवान् राजा श्वेत थे । उन्होंने सोचा कि मैं सम्पूर्ण सातो द्वीपों वाली तथा समस्त नगरों से युक्त पृथिवी को जीत लूँ ॥३३२॥ उनके पुरोहित ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि वसिष्ठ थे । परम धार्मिक वे राजा एक बार विजयी होकर ॥३३३॥ एक बार जप करने वाले में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ से कहे राजा श्वेत ने कहा-- हे भगवन् ! मैं एक हजार अश्वमेध यज्ञ करना चाहता हूँ ॥३३४।। और ब्राह्मणों को सोना, चाँदी तथा रत्नों

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