Srishti Khanda Extracted Page 474
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-474
Sanskrit Original
उपानहौ च दातव्ये स्थापयेत्ताप्रभाजने। घृतेन स्नपनं कृत्वा संपूर्णागद्विजातये॥३०८॥ दापयेत्कृत्यं विदुषे ब्राह्मणाय विशेषतः । एवं कृते फलं तस्य भवेदारोग्यमुत्तमम् ॥३०९॥ द्रव्यसंपत्समग्राप्तिरिति पौराणिकी क्रिया । अविसंवादिनी चेयं शांतिपुष्टिप्रदा नृणाम् ॥३९०॥ तह्ृच्चित्रासु संगृह्य सोमवारं विचक्षणः । रात्रि भक्षः क्षिपेदष्टौ सोमवारान्प्रयत्मतः ॥३९९॥ प्रत्येकं ब्राह्मणा भोज्या यथा शक्तिविचक्षणाः। नवमे तु ततः पूर्णे कुर्याद्वा्मणभोजनम् ॥३१२॥ वस्त्रयुग्मं च दातव्यं ततः सोमं प्रदापयेत्। कांस्यभाजनसंस्थं तु क्षीरसंपूरितं ततः ॥३१३॥ तदवच्छत्रं पादुके च तथोपानत्समन्वितम् । संपूर्णागाय दातव्यं ब्राह्मणाय विशेषतः॥३९४॥ स्वात्यामंगारकं पूज्यक्षपयेन्नक्त भोजनैः। अष्टावेषं च यावच्च कुर्याद्वाह्मणोजनम् ॥३१५॥ अंगारकं च सौवर्ण स्थापितं ताम्रभाजने । दापयेद्ृह्मणायाथ संपूर्णागाय चैव हि॥३१६॥ नकषत्रानुक्रमेणैव क्षिपेन्नक्तानि सप्त वै। अष्टमे तु क्रमात्खेटान् सौवर्णान् दापयेद्ध्घः ॥३१७॥ अग्निकार्यं च कुर्वीत यथादृष्टं विधानतः । एवंकृते भवेद्यद्वैतन्निबोध नराधिप॥३ १८॥ असौम्याश्चग्रहास्सर्वे सौम्यरूपा भवंति च । सर्वे रोगा विनश्यन्ति तुष्टिमायान्ति देवताः ॥३१९॥ नविरुन्धन्ति तं नागाः पितरस्तर्पितास्तथा । दुस्स्वप्रनाशो भवति शृण्वतां पठतां तथा ॥३२०॥ यदि भौमो रविसुतो भास्करो राहुणा सह। केतुश्च मूर्ध्नितिष्ठंति रौद्राः पीडाकरा ग्रहाः ॥३२९॥ अनेन कृतमात्रेण ससौभाग्या भवंति हि । य एवं कुरुते राजन् सदा भक्तिसमन्वितः॥३२२॥ को ताम्बे के पात्र में स्थापित करे । उसको घी से स्नान कराये । उसको सर्वाङ्ग युक्त कर्मकाण्ड के ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मण को दान दे । ऐसा करने वाले को उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है ॥३०७-३०९॥ इस व्रत से समस्त द्रव्य एवं सम्पत्ति की प्राप्ति होती है । यह पौराणिक क्रिया है । इसमें किसी भी प्रकार का विसंवाद नहीं है । यह क्रिया मनुष्यों को पुष्टि एवं शान्ति प्रदान करने वाली है ॥३१०॥ अथवा निपुण पुरुष को चाहिए कि जब चित्रा नक्षत्र का सोमवार दिन हो उस दिन से आठ सोमवार का त्रत करे । रात्रि में भोजन करे, दिन में भोजन न करे । प्रत्येक व्रत के दिन अपनी शक्ति के अनुसार योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराये । नौवा सोमवार व्रत पूरा होने पर ब्राह्मण भोजन कराये ॥३११-३१२॥ पहले दो वस्त्र देकर फिर सुवर्ण की सोम की मूर्ति का दान करे । मूर्ति को दुग्ध भरे कांसे के पात्र में रखकर दान करे ॥३१३॥ पहले के ही समान छत्र, पादुका तथा उपानह के साथ दान करे । विशेष रूप से सम्पूर्णाङ्ग सम्पन्न ब्राह्मण को दान देना चाहिए ॥३ १५४॥ इसी तरह स्वाती नक्षत्र के भौमवार का व्रत प्रारम्भ करके आठ मङ्गलवारों को ब्रत करे । रात्रि में ही भोजन करे । इसीतरह आठ व्रतों को करके ब्राह्मण भोजन कराये ॥३१५॥ मङ्गल की सुवर्ण की मूर्ति बनवाकर उसे ताम्बे के पात्र में रखे और समस्त अड्डों से युक्त ब्राह्मण को उसका दान दे॥३१६॥ अथवा नक्षत्रों के क्रम से ही सात रात्रियों को बिताये । रात्रि में ही भोजन करे । आठवें नक्षत्र के दिन समस्त ब्रतों की सुवर्ण की मूर्ति बनवाकर ब्राह्मणों को दान दे ॥३१७॥ उसी दिन होम भी विधिपूर्वक करे । हे राजन्! इस तरह से ब्रत करने के फल को आप मुझसे सुनें ।।३१८॥ सभी विपरीत हुए ग्रह अनुकूल फल देने वाले हो जाते हैं, सभी रोग विनष्ट हो जाते हें और सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं ॥३१९॥ उसका विरोधसर्प भी नहीं करते है पितृगण तृप्त हो जाते हैं । इसका श्रवण तथा पाठ करने वालों के भी दुःस्वप्न का नाश हो जाता है ॥३२०॥ यदि मङ्गल, शनि, सूर्य, राहु तथा केतु उच्च स्थान में और अत्यन्त दु:ख देने वाले हों तो ॥३२१॥ इस ब्रत के करने मात्र से वे सबके सब सौभाग्य प्रदान करने वाले बन जाते हैं हे राजन् ! जो व्यक्ति इस तरह से भक्तिपूर्वक
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