Srishti Khanda Extracted Page 473

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-473

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Sanskrit Original

व्हाट श्रीपद्ममहापुराण तन्नशक्यं निगदितुमपि वर्षशतैरपि | दीक्षितोऽथ पुरा भूत्त्वा पाद्यं वै शृणुयाद्यदि ॥२९४॥ तेन वेदा: पुराणानि सर्वमंत्रास्ससंग्रहाः । जप्तास्स्युः पुष्करे तीर्थे प्रयागे सिंधुसागरे ॥२९५॥ देवहृदे कुरुक्षेत्रे वाराणस्यां विशेषतः । ग्रहणे विषुवे चैव यत् फलं जपतां भवेत् ॥२९६॥ फलं शतगुणं तच्च पुष्करस्थं पितामहम् । दृष्ट्वा प्राप्रोति विविधान् कामान् कामयते यदि॥२९७॥ पूजां वैधानिकी कृत्वा दीक्षितो यः शृणोति च। देवा अपि तपः कृत्वा ध्यायंति च वदन्ति च ॥२९८॥ कदा मे भारते वर्षे जन्म स्यादिति पार्थिव । दीक्षिताश्च भविष्यामः पाद्यंश्रोष्यामहे कदा ॥२९९॥ पाद्यं तु षोडशात्मानं न्यस्य देहे कदा वयम्। यास्यामस्तु परं स्थानं यद्वत्वा न पुनर्भवेत्॥३००॥ एवं जल्पंति विबुधा मनसा चिंतयंति च। ब्रह्मयज्ञं च कार्तिक्यां कदा द्रक्ष्यामहे नृप ॥३०१॥ एवं ते विधिरुद्दिष्टो मयायं कुरुसत्तम। देवगंधर्वयक्षाणां सर्वदा दुर्लभो ह्यसौ ॥३०२॥ एवं यो वेत्ति तत्त्वेन यश्च पश्यति मंडलम्। यश्चेमं श्ृणुयाच्चैव सर्वे मुक्ता इति श्रुतिः॥३०३॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि रहस्यमिदमुत्तमम्। येन लक्ष्मी धृतिस्तुष्टिः पुष्टि श्चापि भवेज्रणाम्॥३०४॥ सर्वे ग्रहास्सदा सौम्या जायंते येन पार्थिव । आदित्यवारं हस्तेन पूर्वमादाय भक्तितः॥३०५॥ भक्तैकेन क्षिपेत्तावद्यावत्सप्त च संख्यया। ततस्तु सप्तमे पूर्णे कुर्याद्वाह्मण भोजनम्॥३०६॥ आदित्यं चैव सौवर्ण कृत्वा यत्नेन मानव: । रक्तवस्त्रयुगच्छन्नं छत्रिकां पादुके तथा ॥३०७॥ आदि देना चाहिए । इस तरह से गुरु को दक्षिणा दे, मध्यम को मध्यम दक्षिणा दे । उसके बाद आचार्य को सुवर्ण के साथ दो दक्षिणा और देनी चाहिए | इसतरह से बहुत अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है ॥२९३।। उस पुण्य का वर्णन सैकड़ों वर्ष में भी नहीं किया जा सकता है । यदि दीक्षित व्यक्ति आगे बैठकर पद्मपुराण का श्रवण करता है।।२९४॥ उसको पुष्कर तीर्थ, प्रयाग तथा गङ्गासागर में जाकर वेदों पुराणों सभी मंत्रों तथा संग्रह गन्थों का जप करने का फल प्राप्त होता है ॥२९५॥ देवहूद, कुरुक्षेत्र तथा वाराणसी जाकर ग्रहण, विषुव के अवसर पर जप करने का जो फल होता है, उसके सौ गुण अधिक पुष्कर में ब्रह्माजी के दर्शन करने का फल सकाम पुरुष को प्राप्त होता है । उसकी सारी कामनायें पूर्ण हो जाती हें ॥२९६॥ जो दीक्षित होकर व्यक्ति ब्रह्माजी की पूजा करके पद्मपुराण का श्रवण करता है उसको उपर्युक्त फल की प्राप्ति होती है । देवता भी ध्यान करते हैं तथा कहते हैं ॥२९७-२९८॥ मेरा जन्म भारत वर्ष में कब होगा कि हमलोग भी दीक्षित होकर पद्मपुराण का श्रवण करेंगे ॥२९९॥ षोडशदलात्मक कमल की स्थापना करके हमलोग उस सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करेंगे जहाँ से पुन: इस संसार में लौटना नहीं पड़ता है ॥३००॥ हे राजन् ! देवता लोग इस प्रकार से चिन्ता करते हैं तथा कहते हैं कि हमलोग न जाने कब ब्रह्माजी का दर्शन करने का अवसर प्राप्त करेंगे ॥३०१॥ हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ मैंने इस प्रकार से दीक्षा विधि का वर्णन किया। यह विधि देवता, गन्धर्व तथा यक्षों को पूर्णरूप से दुर्लभ है ॥३०२॥ इसतरह से इस विधि को जो जानता है, तथा जो मण्डल का दर्शन करता है, तथा जो इसका श्रवण करता है, ये तीनों प्रकार के लोग मुक्त हो जाते हैं ॥३०३॥ इसके बाद मैं ऐसे उत्तम रहस्य को बतलाता हूँ कि जिसके द्वारा मनुष्य धृति, तुष्टि तथा पुष्टि को भी प्राप्त कर लेते हैं ॥३०४॥ हे राजन् ! उसका अनुष्ठान करने से सभी ग्रह अनुकूल बन जाते हैं । जब रविवार हस्त नक्षत्र से युक्त हो उस दिन एक प्रकार का अन्न खाकर भक्ति पूर्वक व्रत करे । यह व्रत तब तक करता रहे जब तक कि सात बार रविवार ब्रत पूरा न हो जाय । जब सातवें बार का ब्रत पूरा हो जाय तो ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए ॥३०६॥ सुवर्ण की सूर्य की मूर्ति बनवाकर उसको दो लाल वसतो से ढंककर छाता, खड़ाऊँ, जूता, के साथ दान देना चाहिए । मूर्ति

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