Srishti Khanda Extracted Page 472
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-472
Sanskrit Original
श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव । राज्यार्थिन॑ स्नापयेच्च ऐंद्रेण कलशेन तु ॥२७९॥ द्रव्यप्रतापकामं तु आ्रेयघटवारिणा । मृत्युं जयविधानाययाम्येन स्नापयेन्नरम्॥२८०॥ ु ष्टप्रध्वंसनायालं नैऋतेन विधीयते। स्नापयेद्वारुणेनाशु पापनाशाय मानवम्॥२८९॥ शरीरारोग्यकामं तु वायव्येनाभिषेचयेत्। द्रव्यसंपत्ति कामस्य कौबेरेण विधीयते ॥२८२॥ रौद्रेण ज्ञानकामस्य लोकपालघटास्त्विमे । एकैकेन नरः स्नात्वा सर्वदोषविवर्जितः ॥२८३॥ जायते ब्रह्मसदृशो राजासद्योऽथवा नरः। अथवा दिक्षु सर्वासु यथासंख्येन लोकपान्॥२८४॥ पूजयेत्तु स्वनाम्ना तु कुंभैरेबविधानतः । एवं संपूज्यदेवांस्तुलोकपालान् प्रसन्नधीः ॥२८५॥ पश्चात्परीक्षितान् शिष्यान् बद्धनेत्रान् प्रवेशयेत्। दग्ध्वाग्रेय्याधारणया वायुना विधुनेत्ततः ॥२८६॥ सोमेनाप्यायितान् कृत्वाश्रावयेत्समयांस्ततः । ननिंद्याद्वाह्मणान् देवान् विष्णुं ब्रह्माणमेव च ॥२८७॥ इंद्रमादित्यमभ्रिंच लोकपालान् ग्रहांस्तथा । गुरुं च ब्राह्मणं वापि मुनींद्रं पूर्वदीक्षितम् ॥२८८॥ एवं तु समयान् श्राव्य पश्चाद्धोमं तु कारयेत्। ॐ नमो भगवते ब्रह्मणे सर्वरूपिणे हुं फट् स्वाहा।२८९॥ षोडशाक्षरमंत्रेण होमयेज्ज्वलितेऽनले । गर्भाधानादिकाः सर्वा आहुतीस्संप्रदापयेत् ॥२९०॥ तिसृभिस्तु व्याहतिभि देवदेवस्य सन्निधौ। होमांते दीक्षितः पश्चाद्दापयेहुरुदक्षिणाम् ॥२९९॥ हस्त्यश्वयानशकटहेमधान्यादिकं जृप। दापयेहुरवे प्राज्ञो मध्यमे मध्यमं तथा ॥२९२॥ दापयेदपरो युग्मं सहिरण्यं तु तहुरो:। एवं कृते तु यत्पुण्यं महत्संजायते तथा ॥२९३॥ को वैष्णव कलश से स्नान कराये । राज्य चाहने वाले को इन्द्र कलश से स्नान कराये ॥२७९॥ द्रव्य तथा प्रताप चाहने वाले का आग्नेय घट के जल से स्नान कराये । मृत्युंजय विधान के लिए यम देवताक घट से स्नान कराये॥२८०॥ दुष्टों का विनाश चाहने वाले शिष्य को नैऋत्यदेवताक घट से स्नान कराये । पाप का नाश चाहने वाले मनुष्य को आचार्य वरुण देवताक घट से स्नान कराये ॥२८१॥ शारीरिक आरोग्य चाहने वाले को वायव्य कोण के घट से स्नान कराये द्रव्य तथा सम्पत्ति चाहने वाले को कुबेरदेव ताक घट से स्नान कराये ॥२८२॥ ज्ञान चाहने वाले को ईशान कोण के घट से स्नान कराये । ये सभी घट लोकपाल घट हैं । जो व्यक्ति प्रत्येक घरों से स्नान करता है वह समस्त दोषों से रहित हो जाता है ॥२८३॥ कोई राजा हो अथवा कोई सामान्य मनुष्य हो वह प्रत्येक घट से स्नान करके बह्याजी के सदृश हो जाता है । अथवा सभी दिशाओं में समस्त लोकपालों की पूजा करे २८४।। अपने नाम से उन घटों से ही लोकपालों की विधिपूर्वक पूजा करे । इस तरह से प्रसन्नता पूर्वक लोकपालों की पूजा करके ॥२८५॥ उसके बाद नेत्र बंधे हुए परीक्षित शिष्यों को प्रवेश कराये । उसके बाद अग्नि का ध्यान करके भस्म कर दे, उसके बाद वायु की धारणा द्वारा उसको साफ करे ॥२८६॥ उसके बाद चन्द्रमा की धारणा के द्वारा उन सबों को आप्ययित (पुष्ट) करे । उसके बाद आचार्य शिष्यों को निम्नाङ्कित नियमों को सुनायें । कभी भी ब्राह्मणों, देवताओं तथा ब्राह्माजी की निन्दा नहीं करनी चाहिए ॥२८७॥ इन्द्र, आदित्य, अग्नि तथा लोकपालों तथा ग्रहों की भी निन्दा न करे । इसीतरह गुरु, ब्राह्मण, मुनीन्द्र तथा पहले जो दीक्षित हो चुके हैं, उनकी भी निन्दा न करे ॥२८८॥ इसतरह से नियमों को सुनाने के पश्चात् होम करवाये । प्रदीप्त अग्नि में ओं नमो भगवते ब्रह्मणे सर्वरूपिणे हुं फट् स्वाहा इस षोडशाक्षर मन्त्र से होम कराये । अग्नि के गर्भाधान आदि समस्त संस्कारों के लिए आहुतियों को देना चाहिए ॥२९०॥ होम के अन्त में दीक्षित पुरुष को तीनों व्याहृतियों का उच्चारण करके आचार्य को गुरुदक्षिणा देनी चाहिए ॥२९१॥ हे राजन् ! दक्षिणा में हाथी, घोड़े, रथ, गाडी, सुवर्ण तथा अन्न
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