Srishti Khanda Extracted Page 471

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-471

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Sanskrit Original

इंद्राणी पूर्वकं देवमिंद्रमैद्र्या तु पूजयेत्। लोकपालैः समं तद्ददग्नि संपूज्ययेन्नप: ॥२६५॥ दिशि बल्ले यमं याम्यां नैऋत्यां चैव नित्रहतिम् । वरुणं वारुणाशायां वायुं वायव्यगोचरे॥२६६॥ धनदं चोत्तरे न्यस्य रुद्रमीशानगोचरे। कमंडलुं पूर्वतोहि स्रुचं वै दक्षिणे तथा ॥२६७॥ हंसंवै पश्चिमायां तु उत्तरायां स्रुवं तथा । आग्नेय्यां च वृसीं दद्यान्नैऋत्यां पादुके तथा ॥२६८॥ वायव्यां योगपट्टं च ऐशान्यां च गलंतिकाम्। विष्णुस्तु पूर्वतः पूज्यो दक्षिणे चापि शङ्करम् ॥२६९॥ पश्चिमे तु रविर्देव ऋषयश्चोत्तरे तथा । मध्ये स्वयं पद्मजन्मा सावित्री दक्षिणे तथा ॥२७०॥ उत्तरे चैव गायत्री देवी पद्मदलेक्षणा | ऋग्वेदं पूर्वतोन्यस्य यजुर्वेदं च दक्षिणे॥२७९॥ पश्चिमे सामवेदं च अथर्व चोत्तरे तथा। इतिहासपुराणानि च्छंदोज्यौीतिषमेव च॥२७२॥ धर्मशास्त्राणि चान्यानि इंद्रादिदिक्षुविन्यसेत् । पूर्वपत्रे बलं पूज्यं प्रद्युम्नं दक्षिणे दले ॥२७३॥ पश्चिमे चानिरुद्धं च वासुदेवमथोत्तरे । पूर्वतो वामदेवं च सद्योजातं तु दक्षिणे ॥२७४॥ ईशानं पिश्चमे स्थाप्य तत्पुरुषं चोत्तरे तथा । अघोरस्सर्वतः पूज्य एषा पूजा तु मंडले ॥२७५॥ पूर्वतो भास्करं पूज्य दक्षिणेन दिवाकरम्। प्रभाकरं पश्चिमे तु ग्रहराजमथोत्तरे॥२७६॥ एवं पूज्य विधानेन ब्रह्माणं परमेश्वरम् । दिङ्मंडले तु विन्यस्य अष्टौ कुंभान् विधानतः॥ २७७॥ ब्राह्मं तु कलशं मध्ये नेवमं तत्र कल्पयेत्। स्नापयेन्मुक्तिकामं तु ब्रह्मणौधै घटेन तु ॥२७८॥ तो ॥२६४॥ पूर्व दिशा की नाभि में इन्द्राणी और इन्द्र की पूजा करे । उसी तरह अग्नि कोण की नाभि में लोकपालों के साथ अग्नि की पूजा करे ॥२६५॥ दक्षिण दिशा में यम की पूजा करे, नैऋत्य कोण में निऋति की पूजा करे पश्चिम दिशा में वरुण की तथा वायव्य कोण में वायु की पूजा करे ॥२६६॥ उत्तर दिशा में कुबेर का न्यास (स्थापना) करके उनकी पूजा करे और ईशान कोण में ईशान (रुद्र) की पूजा करे । मण्डल के पूर्व में कमण्डलु की और दक्षिण दिशा में सुच् की ॥२६७॥ पश्चिम दिशा में हंस की तथा उत्तर दिशा में खुव की, अग्नि कोण में मृगचर्म की तथा नैऋत्य कोण में पादुका की ॥२६८॥ वायव्य कोण में योगपट्ट की तथा ईशान कोण में गलंतिका की स्थापना करके पूजा करे । मण्डल के पूर्व में विष्णु की पूजा करे दक्षिण दिशा में शङ्करजी की पूजा करे ॥२६९॥ पश्चिम दिशा में सूर्य की तथा उत्तर दिशा में ऋषियों की पूजा करे । मण्डल के बीच में ब्रह्माजी की स्थापना करे तथा उनकी दाहिनी ओर सावित्री देवी की स्थापना करे ॥२७०॥ ब्रह्माजी के उत्तर में कमलनयनी गायत्री देवी की स्थापना करे । फिर पूर्व दिशा में ऋग्वेद की स्थापना करके, दक्षिण में यजुर्वेद की स्थापना करे ।।२७१॥ पश्चिम दिशा में सामवेद की तथा उत्तर दिशा में अथर्ववेद की स्थापना करे । उसके बाद पूर्व आदि दिशाओं में इतिहास, पुराण, छन्द, ज्योतिष् तथा अन्य धर्मशास्तरों की स्थापना करे । इसके बाद पूर्वदल में बल की पूजा करके दक्षिण दिशा में प्रद्युम्न की पूजा करे।२७२-२७३॥ पश्चिम दिशा में अनिरुद्ध की पूजा करके उत्तर दिशा में वासुदेव की पूजा करे । फिर पूर्व दिशा में वामदेव की पूजा करे और दक्षिण दिशा में सद्योजात की पूजा करे ॥२७४॥ पश्चिम दिशा में ईशान की स्थापना करके पूजा करे, उत्तर दिशा में तत्पुरुष की स्थापना करके पूजा करे, और अघोर की सभी स्थानों में पूजा करे । यह पूजा मण्डल में करनी चाहिए ॥२७५॥ पूर्व दिशा में सूर्य की पुजा करके, दक्षिण दिशा में दिवाकर की पूजा करे ।पश्चिम में प्राकार की पूजा करे और उत्तर दिशा में ग्रहराज की पूजा करे ॥२७६॥ इसतरह परमेश्वर ब्रह्माजी की सविधि पूजा करके सभी दिशाओं में आठ कलशों की स्थापना विधिपूर्वक करे ॥२७७॥ नवें कलश की ब्राह्म कलश के रूप में स्थापना करे । अतएव मुक्ति चाहने वाले शिष्य को ब्राह्मघट से स्नान कराये ॥२७८॥ लक्ष्मी चाहने वाले

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