Srishti Khanda Extracted Page 470
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-470
Sanskrit Original
ब्राहो मुहूर्त चोत्त्याय बद्धपद्मासनास्तु ते। ध्यात्वा गुरुं सहस्रारे श्वेतवस्त्रोपवीतकम् ॥२५१॥ श्वेतमाल्यांबरधरं श्वेतगंधानुलेपनम् । निर्गम्य च बहिर्नद्यां कुर्युर्नित्यमतन्द्रिताः॥२५२॥ क्षीरवृक्षोत्थमाचार्यो दापयेहदन्तधावनम्। ते च तं भक्षयेयुर्हि नदीं गत्वा समुद्रगाम्॥२५३॥ इतरद्वातटाकं वा गृहे वापि विधानतः । तद्भक्षयेयु मत्रेण मंत्रितं परमेष्टिनः ॥२५४॥ आपोहिष्ठेति मंत्रेण सप्तकृत्वोभिमंत्रितम् । देवस्य त्वेति वैजप्त्वा युंजानेति करेन्यसेत् ॥२५५॥ इरावत्येति प्रक्षाल्य ब्रह्मोदनेति वै मुखे । भक्षयित्वा क्षिपेहूरं पतितं च निरीक्षयेत् ॥२५६॥ सम्मुखं प्राङ्मुखं वापि विदिशं चापि वा गतम् । संमुखे देवतालब्धि मत्रसिद्धिश्च जायते ॥२५७॥ पराङ्मुखे दंतकाष्ठे सर्वेदेवाः पराङ्मुखाः। उत्तरेण गते तस्मिन् सिद्धिर्भवति वा नवा ॥२५८॥ दक्षिणेन भवेन्मृत्युर्गुरोस्तस्य न संशयः । प्रेक्ष्याशुभं स्वपेद्धमौ देवदेवस्य सन्निधौ ॥२५९॥ स्वप्नान् दृष्ट्वा गुरोरग्रे ् रावयेयुर्विचक्षणाः । ततः शुभाशुभं तत्र लक्षयेत्परमो गुरुः॥२६०॥ पौर्णमास्यामथ स्नात्वा ततो देवालयं ब्रजेत् । गुरुश्च मंडलं भूमौ कल्पितायां तु वर्तयेत् ॥२६९॥ लक्षणैर्विविधैर्भमिं लक्षयित्वा विधानतः । षोडशारं लिखेत्पद्मं नवधारमथापि वा ॥२६२॥ अष्टपत्रमथो वापि लिखित्वा दशयेद्रुधः । नेत्रबंधं तु कुवीत सितवस्त्रेण यत्नतः ॥२६३॥ वर्णानुक्रमतः शिष्यान्पुष्पहस्तान् प्रवेशयेत्। नवनाभं यदा कुर्यान्मंडलं वर्णकैर्बुधः ॥२६४॥ जगकर वे सब बद्धपद्मासन से बैठकर अपने हृदय में श्वेत वस्र तथा श्वेत यज्ञोपवीत धारण किए हुए ॥२५१॥ श्वेत माला तथा श्वेत चन्दन लगाये हुए गुरु का ध्यान करें । फिर वहाँ से निकलकर विना किसी आलस्य के वे नदी जायं और नित्य कृत्य से निवृत्त होएँ ॥२५२॥ उसके बाद आचार्य उन्हें किसी दूध वाले वृक्ष का दतौन दें । वे पुनः समुद्रगामिनी नदी में जाकर उस दतौन से मुँह धोएँ ॥२५३॥ अथवा किसी दूसरी नदी में या तालाब में अथवा घरपर ही विधिपूर्वक दतौन करे । उसके पहले परमेष्ठी देवता के मन्त्र से उस दतौन को अभिमन्त्रित करे ॥२५४॥ आपोहिष्ठा० इत्यादि मन्त्र को सात बार पढकर अभिमन्त्रित करे । उसके बाद देवस्य त्वा सवितुः इत्यादि मन्त्र का जप करके युजान इत्यादि मन्त्र से करन्यास करे ॥२५५॥ उसके पश्चात् इरावती इत्यादि मन्त्र से दतौन को धोए । फिर ब्रह्मोदन इत्यादि मन्त्र से उसे मुंह में डालकर दतौन करे । मुँह धोकर उसे दूर फेंक दे और उसके जमीन पर गिरते समय देखे ॥२५६॥ वह चाहे सामने गिरे या पूर्व दिशा में गिरे अथवा किसी कोण (विदिश) में जाकर गिरे तो उसका फल जाने; यदि वह सामने गिरे तो उससे देवता की प्राप्ति और मन्त्र की सिद्धि सूचित होती है ॥२५७॥ यदि दतौन पीछे गिरे तो जानना चाहिए कि सभी देवता विपरीत हैं । यदि वह दतौन उत्तर दिशा में जाकर गिरे तो यह निश्चित नहीं होता है कि सिद्धि होगी कि नहीं होगी ॥२५८॥ यदि वह दक्षिण ओर जाकर गिरे तो समझना चाहिए कि इसका फल मृत्यु है । अशुभ शकुन होने पर ब्रह्माजी के सन्निकट पृथिवी पर जाकर सोजाय॥२५९॥ रात्रि में जो स्वप्न दिखायी दे उसे आचार्य को बतलाये । उसके पश्चात् आचार्य उसके (स्वप्न के) शुभाशुभ का विचार गम्भीरता से करें ॥२६०॥ उसके बाद पूर्णिमा के दिन स्नान करके देवालय में जाय । आचार्य भूमि पर बनाये गये मण्डल में अनेक लक्षणों को देखकर विधिपूर्वक उसका उपयोग करें । वहाँ पर वे षोडश दल वाले अथवा नव दलों वाले कमल का निर्माण करें ॥२६१-२६२॥ अथवा आठ दलों वाले कमल को बनाकर उसेशिष्य को दिखायें । उसके बाद श्वत वस्त्र से आचार्य शिष्य के नेत्रों को अच्छी तरह से बाँध दें ॥२६३॥ उसके बाद बर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) वर्णो के क्रम से शिष्यों को प्रवेश करायें । यदि नव नाभियों वाला मण्डल बनायें
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