Srishti Khanda Extracted Page 469

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-469

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Sanskrit Original

.3. श्रीपद्ममहापुराण निर्दहेद्दष्कृतसर्व सकृत्स्नात्वा तु पुष्करे। पुष्करं दुष्करं क्षेत्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥२३६॥ इदानीं शृणु मे राजन् पञ्चपातकनाशनम् । यजनं देवदेवस्य ब्रह्मपुत्रवसुप्रदम् ॥२३७॥ इह जन्मनि दारिद्यव्याधिकुष्ठादिपीडितः । अलक्ष्मीवानपुत्रस्तु यो भवेत्पुरुषो भुवि॥२३८॥ तस्य सद्यो भवेल्लक्ष्मीरायुः पूर्ण सुतास्सुखम् । कृत्वा तु मण्डलगतं लोकपालसमन्वितम्॥२३९॥ ब्रह्माणं तु परं देवं यः पश्यति विधानतः । पूजितं नव नाभेन मन्रमूर्तिमयोनिजम् ॥२४०॥ कार्तिके मासि शुक्लायां पौर्णमास्यां विशेषतः । सर्वासु वा यजेद्देवं पू्णिमासु विधानतः ॥२४१॥ संक्रान्तौ च महाबाहो चन्द्रसूर्यग्रहेऽपि वा। यः पश्यति विभुं देवं पूजितं गुरुणा नृप॥२४२॥ तस्य सद्यो भवेत्तुष्टिः पापध्वंसश्च जायते । स मान्यो देवतानां च भवतीह नराधिप ॥२४३॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां भक्तानां तु परीक्षणम् । संवत्सरं गुरुः कुर्याज्जातिशौचक्रियादिभिः॥२४४॥ उपपन्नमिति ज्ञात्वा हदयेनावधारयेत् । तेपि भक्तियुता ध्यात्वा त्वाचार्य परमेश्वरम् ॥२४५॥ . संवत्सरं गुरौ भक्ति कुर्युर्विष्णौ यथा तथा । प्रसादयेयुश्च ततः पूर्णे संवत्सरे गुरुम् ॥२४६॥ भगवंस्त्वत्प्रसादेन संसारार्णवतारणम् । परब्रह्मोपासनेन विरिंच्याराधनेन च ॥२४७॥ सहस्त्रशीर्षजप्येन मण्डलब्राह्मणेन च ध्यानेन स्यात्तथास्माकमुपदेशः प्रदीयताम् ॥२४८॥ इच्छामो वैदिकी लक्ष्मीं विशेषेण प्रसद्यताम्। अभ्यर्थितो गुरुस्त्वेवं मेधावी तैस्तदाततः ॥२४९॥ यथाविधि समभ्यर्चेद्ृह्माणं विष्णुमग्रतः। ते बद्धनेत्राः स्वाप्यास्तु कार्तिकस्य चतुर्दशीम्॥२५०॥ को वह पुष्कर तीर्थ में एक बार स्नान करके भस्म कर देता है । पुष्कर अत्यन्त दुष्कर क्षेत्र है । तथा सभी पापों को विनष्ट करने वाला है ॥२३६॥ हे राजन् ! अब मैं तुम्हें पाँच प्रकार के पापों को विनष्ट करने वाले तथा ब्रह्मपुत्र की सम्पत्ति प्रदान करने वाले ब्रह्माजी की पूजा का वर्णन करता हूँ ॥२३७॥ इस जन्म की दरिद्रता, कुण्ठा आदि व्याधियों से होने वाली पीडा, लक्ष्मी रहित तथा सन्तान रहित जो व्यक्ति होता है ॥२३८॥ उसको इस पूजन से शीघ्र ही लक्ष्मी की प्राप्ति, तथा आयु से दुक्त पुत्रों की प्राप्ति जन्य सुख की प्राप्ति होती है ।॥२३९॥ जो मनुष्य कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को विशेष रूप से, अयोनिज, मन््रमूर्ति, ब्रह्माजी की नवनाभ के द्वारा करता है उसके सारे पाप विनष्ट हो जाते हैं, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । अथवा वह सभी पूणिमाओं को, सङ्क्रान्ति काल में, सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण के समय, आचार्य बृहस्पति द्वारा पूजित ब्रह्माजी की विधिपूर्वक पूजा करके उनका दर्शन करे ॥२४०-२४२॥ हे राजन् ! यहाँ पर सामान्य देवताओं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा भक्तों की परीक्षा जाति तथा शौचादि क्रियाओं द्वारा गुरु को एक वर्ष तक करनी चाहिए ॥२४३-२४४॥ जब गुरु यह जान जायँ कि यह शिष्य बनाने योग्य है, और वे नवनाभ की दीक्षा प्राप्त करने की इच्छा वाले भी गुरु को परमेश्वर समझकर।।२४५॥ भगवान् विष्णु के ही समान एक वर्ष तक गुरु की भक्ति करे, जब एक वर्ष बीत जाय तो आचार्य को दीक्षा देने के लिए प्रसन्न करे ॥२४६॥ वे गुरु से प्रार्थना करे हे भगवन् कृपा करके आप हमें ऐसा उपदेश दीजिये कि हमें संसार सागर से पार करने वाले, पखह्य की उपासना तथा ब्रह्माजी की आराधना के द्वार ॥२४७॥ सहस्र इत्यादि सूक्त के जप के द्वारा, ब्राह्मण मण्डल ब्राह्मण के द्वारा तथा ध्यान के द्वारा वैदिक लक्ष्मी की प्राप्ति हो जाय, यही हम चाहते हैं । इसके लिए आप हमारे ऊपर विशेष रूप से कृपा करें । उन सबों के द्वारा इस प्रकार से प्रार्थना किए जाने पर मेधावी गुरु ॥२४८-२४९॥ अपने सामने ही ब्रह्माजी की तथा भगवान् विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें और उन शिष्य बनने वालों का नेत्र बाँधकर कार्तिक मास की चतुर्दशी तिथि को सुला दें ॥२५०॥ दूसरे दिन ब्राह्म मुहूर्त में

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