Srishti Khanda Extracted Page 468
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-468
Sanskrit Original
एतान् वै श्राद्धकालांस्तु पुरा स्वायंभुवोऽब्रवीत् । कृते श्राद्धेन वै पुंसां पीडा भवति देहजा॥२२२॥ तदा पुत्रकृतं वापि सर्व त्यजति दुष्कृतम्। यथा न भविता पीडा ग्रहचोरनृपादिकात्॥२२३॥ दुष्कृतं नश्यते सर्व परत्र च गतिं शुभाम् । लभते नात्र सन्देहः प्रजापतिवचो यथा ॥२२४॥ कृते युगे पुष्कराणि त्रेतायां नैमिषं स्मृतम् । द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गां समाश्रयेत् ॥२२५॥ दुष्करः पुष्करे वासो दुष्करं पुष्करे तपः। यदन्यत्रकृतं पापं तीर्थे तद्याति लाघवम् ॥२२६॥ न तीर्थकृतमन्यत्र क्वचित्पापं व्यपोहति । सायं प्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः ॥२२७॥ उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थेषु भारत। सायं प्रातरुपस्पृश्य पुष्करे नियतेन्द्रियः ॥२२८॥ क्रतून्सर्वनिवाप्रोति ब्रह्मलोकं च गच्छति । द्वादशाब्दं द्वादशाहं मासं मासार्धमेव च ॥२२९॥ योवसेत्पुष्करे नित्यं सगच्छेत्परमां गतिम्। सर्वेषामेव लोकानां ब्रह्मलोकोपरि स्थित: ॥२३०॥ य इच्छेत्पुष्करं गन्तुं सोनुसेवेत पुष्करम्। यथालोमविलोमाभ्यां तथा व्यस्तसमस्तयोः॥२३१॥ स्नातस्तु पुष्करे सम्यक् कोट्याश्च फलमश्नुते । विधिवत्क्रियमाणेषु सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ॥२३२॥ पुष्करालोकनादेव नरः प्राप्रोति तत्फलम् । दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वै महीतले॥२३३॥ सान्निध्यं पुष्करे तेषां त्रिसंध्यं कुरुन्दन । यावत्तिष्ठति गिरयो यावत्तिष्ठन्ति सागरा: ॥२३४॥ तावत्पुष्करमृत्यूनां ब्रह्मलोको न संशयः । जन्मान्तरसहस्रैश्च आजन्ममरणान्तिकम्॥ २ ३ ५॥ पर अथवा अपने जन्म नक्षत्र में अथवा किसी प्रकार की पीडा होने पर ॥२२१॥ इन सभी समयों को ब्रह्माजी ने स्वयं श्राद्ध का समय बतलाया है । श्राद्ध करने से मनुष्य के शरीर में किसी प्रकार की पीडा नहीं होती ॥२२२॥ उस समय पुत्र के द्वारा भी किये गये समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं । श्राद्ध करने से ग्रह, तारे तथा राजादि द्वारा क॑ गयी किसी प्रकार की पीडा नहीं होती है ॥२२३॥ इसके करने पर सम्पूर्ण पाप विनष्ट हो जाते हैं और परलोक में शुभ गति की प्राप्ति होती है । इस विषय में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है, यह ब्रह्माजी ने स्वयं कहा है ॥२२४॥ सत्ययुग में पुष्करों का आश्रय ले, त्रेतायुग में नैमिषारण्य का महत्त्व है, द्वापर में कुरुक्षेत्र का महत्त्व है और कलियुग में गङ्गाजी का आश्रय ग्रहण करे ॥२२५॥ पुष्कर में निवास करना कठिन है, तथा पुष्कर में तपस्या करना भी कठिन है । जो अन्यत्र पाप किए जाते हैं वे तीर्थ में जाकर क्षीण हो जाते हैं, किन्तु तीर्थ में किया हुआ पाप अन्यत्र कहीं भी नहीं समाप्त होता है । जो व्यक्ति सायंकाल तथा प्रातःकाल हाथ जोड़कर तीनों पुष्करों का स्मरण करताहै ॥२२६-२२७॥। हे भीष्म ! उसे सभी तीर्था में आचमन करने का फल प्राप्त हो जाता है । जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को संयमित करके पुष्कर में स्नान या आचमन करता है ॥२२८॥ उसे सभी क्रतुओ के करने का फल प्राप्त होता है और वह ब्रह्मलोक में जाता है । बारह वर्ष, बारह दिन या एक मास अथवा पन्द्रह दिन ॥२२९॥ जो पुष्कर तीर्थ में निवास करता है वह निश्चित रूप से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है । ब्रह्मलोक सभी लोकों के ऊपर विद्यमान हैं ॥२३०॥ जो पुष्कर जाने की इच्छा करे उसे पुष्कर का सेवन अनुलोम विलोम ओर व्यस्त-समस्त विधि से करना चाहिए ॥२३१॥ पुष्कर में स्नान करने से करोड़ अश्वमेध का फल प्राप्त होता है । विधिपूर्वक सभी तीर्थो के करने का जो फल होता है, वही फल मनुष्य पुष्कर का दर्शन कर लेने मात्र से प्राप्त कर लेता है । पृथिवी पर विद्यमान दश हजार करोड़ तीर्थ ॥२३२-२३३॥ उन सबों का तीनों सन्ध्याओं में पुष्कर में सान्ध्यि बना रहता है । जब तक पर्वत तथा सागर बने रहते हैं तब तक पुष्कर में शरीर त्याग करने वालों का निवास ब्रह्मलोक में होता है । हजारों पूर्व जन्मो में जीव, जन्म से लेकर मृत्युकाल पर्यन्त जितने पापों के किए रहत। है, ॥२३४-२३५॥ उन समस्त पापों
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