Srishti Khanda Extracted Page 467
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-467
Sanskrit Original
भवने नात्र संदेह: सत्यं पौराणिकं वचः। तीर्थे तु ब्राह्मणं नैव परीक्षेत कथंचन॥२०९॥ अन्नार्थिनमनुप्राप्तं भोज्यं तं मनुरबवीत् । सक्तुभिः पिडदानं च संयावैः पायसेन वा॥२९०॥ कर्त्ञव्यमृषिभिर्दृष्टं पिण्याकेनैगुदेन वा। तिलपिण्याककैर्देयं भक्तिमद्धिर्नरैः सदा ॥२११॥ शराद्धं तत्र तु कर्तव्यमर्घ्यावाहन वर्जितम् । स्वधां तु गृध्राः काका वा नैव दृष्या हरन्ति ते॥२९२॥ श्राद्ध तत्तैर्थिकं प्रोक्तं पितृणां तृप्तिदं परम् । कर्तव्यं तत्प्रयत्नेन भक्तिरेवात्र कारणम् ॥२१३॥ भक्ता तुष्यन्ति पितरस्तुष्टाः कामान्दिशन्ति ते। पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं कामान्यान्मनसेच्छति॥२१४॥ भत्तत्या चाराधितो दद्याज्गणां प्रीतः पितामहः । अकालेप्यथ काले वा तीर्थे श्राद्धं सदा नरैः ॥२९५॥ प्राप्त रेव सदा स्नानं कर्तव्यं पितृतर्पणम्। पिंडदानं च कर्तव्यं पितृणां चाति बल्लभम् ॥२१६॥ पितरो हि निरीक्षन्ते गोत्रजं समुपागतम्। आशया परया युक्ताः कांक्षंत्सलिलं च ते ॥२१७॥ विलम्बो नैव कर्तव्यो नैव विघ्नं समाचरेत्। अच्छिन्ना सन्ततिस्तेषां सदा कालं भविष्यति ॥२१८॥ पितरः पुत्रदातारं वृद्धिश्राद्धभिकांक्षिण: । तेन ते सन्ततिच्छेदं न कुर्वन्ति हि कर्हिचित्॥२१९॥ अतः श्राद्धं पुरा प्रोक्तं स्वयमेव स्वयंभुवा । गुणोत्तरं तु यत्कार्यं द्विजैः “पितृपरायणै: ॥२२०॥ तीर्थे क्षेत्रे गृहे वापि संक्रांतौ ग्रहणेपि वा । विषुवे अयने चापि जन्मर्क्षे च प्रपीडिते॥२२९॥ देखने से जो तुष्टि होती है वह कभी नही दिखायी पड़ती है । पुष्कर क्षेत्र में एक ब्राह्मण को भोजन कराने से एक करोड़ ब्राह्मणों के भोजन कराने का फल मिलता है ॥२०८॥ इस विषय में.किसी प्रकार का संदेह नहीं है, यह पौराणिक वचन है । तीर्थ में कभी भी ब्राह्मणों के ज्ञानादि की परीक्षा नहीं करनी चाहिये ॥२०९॥ मनु का कहना है कि जो व्यक्ति भोजन प्राप्त करने के लिए आये उसे भोजन करा देना चाहिए । तीर्थ में पिण्डदान सत्तु से या यवके आँटे से या खीर से करे ॥२१०॥ अथवा पिण्याक या इंगुदी के फल से करे, यह ऋषियों का कहना है । अथवा तिल से बने हुए पिण्याक से सदा तीर्थो में श्राद्ध करे ॥२११॥ तीर्थ में श्राद्ध अर्ध्य और आवाहन के बिना ही करना चाहिए । कौए अथवा गृध्र देखकर स्वधा (श्राद्ध) का हरण नहीं करते हैं ॥२१२॥ इस प्रकार से तीर्थ में किया गया श्राद्ध पितरों को परम तृप्ति प्रदान करता है । अतएव तीर्थ में जाकर प्रयास करके श्राद्ध अवश्य करना चाहिए॥२१३॥ भक्ति के द्वारा पितरों को तृप्ति होती है और तृप्त होकर पितृगण श्राद्ध करने वालों की कामनाओं को पूर्ण करते हैं । वे उन सबों को अभिप्रेत धन-धान्य तथा पुत्र-पौत्र आदि समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हें. ।। २ १४॥ भक्तिपूर्वक की गयी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी आराधक को सारे फल प्रदान करते हैं । उचित समय हो या न हो तीर्थ में जाने पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए । मनुष्य जब कभी भी तीर्थ में पहुँचे उसी समय स्नान करके वह पितरों का तर्पण करे और पितरों को अत्यन्त प्रिय पिण्डदान भी करे ॥२१६॥ तीर्थ में जाने वाले व्यक्ति को उसके पितृगण अत्यन्त आशान्वित होकर देखते हैं और चाहते है कि यह हमारा वंश यहाँ तर्पण करे ॥२१७॥ अतएव तीर्थयात्री को स्नान करने तथा तर्पण करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए और न तो इन सब कार्यो को करने में किसी भी प्रकार का विघ्न करे । जो लोग इस नियम का पालन करते हैं उनकी सन्तानों का कभी भी उच्छेद नहीं होता है, वह सदा बनी रहती है ॥२१८॥ आभ्युदयिक श्राद्ध को चाहने वाले पितृगण पुत्र प्रदान करने वाले हें इसीलिए वे कभी भी सन्तान का नाश नहीं करते हैं ॥२१९॥ इसीलिए प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने स्वयं ही श्राद्ध करने का विधान किया है । अतएव पित्तृभक्तों को चाहिए कि वह उन कार्यो को अवश्य करे जिनके करने से गुणों की वृद्धि होती है॥२२०॥ तीर्थ में, क्षेत्र में अथवा अपने घर पर संक्रान्ति काल पर, ग्रहण लगने पर, विषुवकाल में, अथवा अयन के बदलने
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