Srishti Khanda Extracted Page 466
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-466
Sanskrit Original
पूपानि चैव पुण्यानि कृतानि मधुराणि च । द्राक्षारसप्रधानं च गुडखंडसमन्वितम् ॥१९४॥ शारदेन तु धान्येन कृत्वा खंडंविमिश्रितम्। स्रीणां चैव तु पेयानि भक्ष्याणि च द्विजन्मनाम्॥१९५॥ इह चाविकवासांसि वर्षायोग्ययानि सर्वशः । यानि यानि च पेयानि तानि योग्यानि दापयेत्॥१९६॥ प्रतिपूज्य विधानेन वसुदानैः सकञ्जुकैः । कुंकुमेनानुलिप्तांग्यः स्रग्दामभिरलंकृताः ॥१९७॥ दत्वा तूपानहावंघ्रयोर्नारिकेलं करे तथा । अक्ष्णोश्चैवांजनं दत्वा सिंदूरं चैव मस्तके ॥१९८॥ गुडं फलानि हृद्यानि वांछितानि मृदूनि च । हस्ते दत्वा सपात्राणि प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥१९९॥ स्वयं भुंजीत वै पश्चात्सबंधुर्बालकैः सह । अथवा नैव संपत्तिस्तीर्थे दानं च भाजनम्॥२००॥ गृहे गतः प्रदास्यामि हृष्टो देव प्रसीद मे । एवमेव पितृणां च आगत्य स्वीयमंदिरे ॥२०९॥ पिडप्रदानपूर्वं तु श्राद्धं कुर्याद्विधानतः । पितरस्तस्य वै तृप्ता भवंति ब्रह्मणो दिनम् ॥२०२॥ तीर्थादष्टगुणं पुण्यं स्वगृहे ददतां शिव । न च पश्यंति वै नीचाः श्राद्धं द्विजातिभिः कृतम्॥२०३॥ एकान्ते तु गृहे गुप्ते पितृणां श्राद्धमिष्यते। नीच दृष्ट्याहतं तच्च पितृन्नैवोपतिष्ठति ॥२०४॥ तस्मात्सर्वप्रयत्मेन श्राद्धं गुप्तं च कारयेत् । पितृणां तृप्तिदं प्रोक्तं स्वयमेव स्वयंभुवा॥२०५॥ गौरीभक्तद्या धिकाया तु शस्ताज्ञातक्रियातु सा। राजसी मनसा ज्ञाता जनानां कीर्तिदायिनी ॥२०६॥ गुप्तं दानं सदा देयमात्मनो हितमिच्छता। पक्वान्नं दृश्यतामेति दीयमानं जनै भुवि ॥२०७॥ दृश्यमानं तु तत्तुष्ट्ये दृश्यते नेह कर्हिचित् । एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता॥२०८॥ हे शम्भो ! जो नारी एक हजार कुमारियों को मोदक का भोजन कराती है, वह प्रत्येक जन्मों में सौभाग्यवती, पुत्रों वाली तथा धन-धान्य से समृद्ध होती है ॥१९३॥ मीठे तथा स्वादिष्ट पूं को बनाकर दाख के रस से युक्त गुड़ के टुकड़ों के साथ तथा अगहनी के चावल के लड्डू के साथ दान करे । ब्राह्मणों की स्त्रियों को भक्ष्य एवं पेय पदार्थों का दान दे ॥१९४-१९५॥ उनके अनुकूल जो योग्य पेय पदार्थ हों उन सबों का दान देना चाहिए ॥१९६॥ ब्राह्मण दाम्पती की विधिपूर्वक पूजा करके धन तथा वस्त्र दान करे, खियों को कुंकुम तथा माला से अलङ्कृत करे । उनके पैरों का चपल और ब्राह्मणों को जूता दान करे, उनके हाथ में नारियल रखे । उनकी आँखों के लिए आंजन तथा मांग में लगाने के लिए सिन्दूर दे ॥१९७-१९८॥ गुड तथा सुन्दर एवं मधुर फल हाथ में देकर ब्राह्मण दम्पती को प्रणाम करके विदा करे ॥१९९।। उसके बाद बालकों तथा बान्धवों के साथ स्वयं भोजन करे । यदि सम्पत्ति न हो तो तीर्थ में पात्रों का ही दान करे ॥२००॥ हे देव ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, में घर जाकर दान करूँगा इसी तरह देवता और पितरों से प्रार्थना करे, उसके बाद अपने घर आकर पिण्डप्रदान पूर्वक सविधि श्राद्ध करे । ऐसा करने वाले के पितृगण ब्रह्माजी के एक दिन (एक कल्प) तक तृप्त रहते हैं ॥२०२॥ हे शिव ! तीर्थ की अपेक्षा अपने घर में आकर दान करने से उसके आठ गुना फल होता है । ऐसा करने से द्विजातियों के द्वारा किए गये श्राद्ध को नीच प्राणी नहीं देख पाते हैं ॥२०३॥ श्राद्ध एकान्त में गृह के भीतर, गुप्त स्थान में करना चाहिए, क्योंकि श्राद्ध को नीच प्राणियों द्वारा देख लिए जाने पर, वह पितरों को नहीं प्राप्त होता है ॥२०४॥। इसलिए प्रयास पूर्वक श्राद्ध को गुप्त स्थान में ही करना चाहिए । इसतरह से किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्ति प्रदान करता है, यह ब्रह्माजी ने कहा है॥२०५॥ जो क्रिया गौरी की भक्ति से भरकर की जाती है, वह अधिक श्रेष्ठ होती है जो राजसी क्रिया होती है, वह मन से भी किए जाने पर मनुष्यों को यश - दान करने वाली होती है ॥२०६॥ आत्मकल्याण चाहने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि वे गुप्त दान दें । संसार में लोगों द्वारा दिया जाने वाला पक्वान्न चूकि दिखायी पड़ता है ॥२०७॥
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