Srishti Khanda Extracted Page 465

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-465

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Sanskrit Original

` श्रीपद्ममहापुराण लक्ष्मीसहायो वरदो वरांस्तस्य प्रयच्छति। उमासहायस्तार्तीये भोजितोसि न संशयः ॥१८०॥ अथवा या कुमारीणां भक्तया दद्याच्च भोजनम् । तस्याः कुले भवेद्वंध्या न कदाचिच्चदुर्भगा ॥१८९॥ न कन्या जननी क्वापि न भर्तुर्या न वल्लभा । तस्मात्सर्वप्रयलेन सावित्र्ग्रे तु भोजनम् ॥१८२॥ पारत्रमैहिकं वापि कामयद्धिर्नरैः सदा। दातव्यं सर्वदा भीष्म कटुतैलविवर्जितम्॥९८३॥ न चाम्लं न च वै क्षारं स्त्रीणां भोज्यं कदाचन । भक्ष्यं पंच प्रकारं च रसैः स वैस्सुसंस्कृतम् ॥१८४॥ घृतपूर्यं सुपक्वाश्च बहुक्षीरसमन्विताः । शिखरिणी तथा पेया दधिक्षीरसमन्विता ॥१८५॥ आह्वादकारिणी पुंसां सत्रीणां चातीव वल्लभा । धनधान्यांजनोपेतं नारीणां च शताकुलम् ॥१८६॥ पूपकं शष्कुलं तस्यां जायते नात्र संशयः । न ज्वरो न च संतापो न दुःखं न वियोगिता॥१८७॥ असौ तारयते स्वानां कुलानामेकविंशतिम् । बंधुभिश्च॒ सुतैश्चैव दासीदासैरनंतकैः ॥१८८॥ पूरितं च कुलं तस्याः पूरिकां या प्रदास्यति । एधते च चिरं कालं पुत्र पौत्रसमन्वितम् ॥१८९॥ कुलं च सकलं तस्य शष्कुलं यः प्रयच्छति । पुत्रिण्यो वै दुहितरो बंधुभिः सहितं कुलम् ॥१९०॥ शिखरिणी प्रदात्रीणां युवतीनां न संशय: । मोदते तु कुलं तस्याः सर्वसिद्धिप्रपूरितम्॥१९९॥ मोदकानां प्रदानेन एवमाह प्रजापतिः । एतदेव तु गौरीणां भोजनं हर शस्यते ॥१९२॥ सुभगा पुत्रिणी साध्वी धनऋद्धिसमन्विता । सहस्नभोजिनी शंभो जन्म जन्म भविष्यति ॥१९३॥ जाता है इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है । ब्राह्मण-दम्पती को भोजन कराने वाले को लक्ष्मी विशिष्ट विष्णु को भी भोजन कराने का फल प्राप्त होता है । उसको भगवान् केशव अनेक प्रकार के वरदानों को प्रदान करते हैं १७९॥ तीन ब्राह्मण दम्पत्तियों को भोजन कराने वाले को सपत्नीक ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव को भोजन कराने का फल प्राप्त होता है ॥१८०॥ अथवा जो व्यक्ति सावित्री देवी के सामने कुमारियों को भोजन कराता है, उसके वंश में कभी कोई स्री बन्ध्या नहीं होती है ॥१८१॥ उसके वंश में कोई स्री केवल कन्याओं को ही जन्म देने वाली भी नहीं होती है, और कोई ऐसी भी नारी नहीं होती है जो अपने पति को प्रियतम न हो । इसलिए हर प्रकार के प्रयास के द्वारा सावित्री देवी के सामने ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए ॥१८२॥ हे भीष्म ! लौकिक एवं पारलौकिक सुख प्राप्त करने की इच्छा वाले को ऐसा भोजन कराना चाहिए जिसमें तीक्ष्णता अथवा तेल का प्रयोग नहीं किया गया हो।१८३॥ खटाई तथा नमक युक्त भोजन स्त्रियों को नहीं करना चाहिये । भोजन पाँच प्रकार की वस्तुओं का होना चाहिए तथा उसे सभी रसों से युक्त होना चाहिए ॥१८४॥ भोजन में घी निर्मित पूड़ी, क्षीरान्न, श्रीखण्ड, पीने योग्य दधि और दूध होना चाहिए ॥१८५॥ इसी प्रकार का भोजन स्त्रियों तथा पुरुषों के लिए सुखप्रद तथा प्रिय होता है । जो व्यक्ति धन, धान्य तथा अञ्जन से युक्त नारियों को सौ पूआ तथा पूड़ी का दान देता है, उसके यहाँ ज्वर, संताप, दुःख तथा किसी प्रकार का वियोग नहीं होता है ॥१८६-१८७॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति अपनी इक्कीस पीढी के पितरों को तार देता है और उसका वंश अनन्त दासी, दास तथा गौ से भरा रहता है । जो स्त्री पूड़ी का दान पुष्कर मे करती है उसका वंश चिरकाल तक पुत्र एवं पौत्रं के द्वारा समृद्ध बना रहता है ॥१८८-१८९॥ पूड़ी दान करने वाली नारी का वंश बन्धु-बांधवों तथा पुत्रवती पुत्रियों से परिपूर्ण रहता है ॥१९०॥ जो स्त्रियाँ पुष्कर में श्रीखण्ड का दान करती हैं, उन सबों का वंश आनन्दित रहता है, और सभी प्रकार की सिद्धियों से भरा रहता है॥१९१॥ मिठाई दान करने वालों के विषय में ब्रह्माजी ने कहा है कि, हे शङ्कर! कुमारियों के लिए मोदक ही श्रेष्ठ भोजन हे॥१९ २॥

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