Srishti Khanda Extracted Page 463
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-463
Sanskrit Original
इंद्रपुर्या देवनाथो द्यूतपायां पुरंदर: । हंसवाहस्तु लंबायां चंडायां गरुडप्रियः ॥९५९॥ महोदये महायज्ञः सुयज्ञो यज्ञकेतने | सिद्धिस्मरे पद्मवर्णः विभायां पद्मबोधनः ॥१५२॥ देवदारुवने लिंगं महापत्तौ विनायकः । त्र्यंबको मातृकास्थाने अलकायां कुलाधिपः॥१५३॥ त्रिकूटे चैव गोनर्द: पाताले बासुकिस्तथा। पद्माध्यक्षश्च केदारे कूष्मांडे सुरतप्रियः ॥१५४॥ कुंडवाप्यां शुभांगस्तु सारण्यां तक्षकस्तथा। अक्षोटे पापहा चैव अंबिकायां सुदर्शनः ॥१५५॥ वरदायां महाबीर: कांतारे दुर्गनाशनः। अनंतश्चैव पणटि प्रकाशायां दिवाकरः ॥१५६॥ विराजायां पद्यानाभः स्वरूद्रश्च वृकस्थले । मार्कडो वटकेचैव वाहिन्यां मृगकेतनः ॥९५७॥ पद्मावत्या पड्गगृहो गगने पद्यकेतनः। अष्टोत्तरं स्थानशतं मया ते परिकीर्तितम् ॥१५८॥ यत्र वै मम सांनिध्यं त्रिसंध्यं त्रिपुरांतक । एतेषामपि यस्त्वेक पश्यते भक्तिमान्नरः॥१५९॥ स्थानं सुविरजं लब्ध्वा मोदते शाश्वतीः समाः। मानसं वाचिकं चैव कायिकं यच्च दुष्कृतम् ॥१६०॥ तत्सर्व नाशमायाति नात्र कार्या विचारणा । यस्त्वेतानि च सर्वाणि गत्वा मां पश्यते नरः॥१६९॥ भवते मोक्षभागी च यत्राहं तत्र वै स्थितः। पुष्पोपहारै धूपै श्चब्राह्मणानां च तर्पणैः ॥१६२॥ ध्यानेन च स्थिरेणाशु प्राप्यते परमेश्वरः। तस्य पुण्यफलं चाम््यमंते मोक्षफलं तथा ॥१६३॥ सब्रह्मलोकमासाद्य तत्कालं तत्र तिष्ठति । पुनः सृष्टौ भवेद्देवो वैराजानां महातपाः ॥९६४॥ चक्रपाणि है ॥१४९॥ दण्डपुरी में में विरूपाक्ष नाम से स्थित हूँ तथा धूतपाप तीर्थ में मेरा नाम गौतम है । माल्यवत् क्षेत्र में मेरा नाम हंसनाथ है तथा बलिक में मेरा नाम द्विजेन्द्र है ॥१५०॥ इन्द्रपुरी में मैं देवनाथ हूँ और धूतपापा में मेरा नाम पुरन्दर है । लम्बा में मेरा नाम हंसवाह है और चण्डा में मैं गरुडप्रिय नाम से स्थित हुँ ॥१५१॥ महोदय में मेरा नाम महायज्ञ है और यज्ञकेतन में मैं सुयज्ञरूप से विद्यमान हूँ । सिद्धिसर तीर्थ में मेरा नाम पद्मवर्ण है तथा विभा में मेरा नाम पद्मबोधन है ॥१५२॥ देवदारु वन में मैं लिङ्ग रूप से विराजमान हुँ और महापत्ति में मेरा नाम विनायक है । मातृकास्थान में त्र्यम्बक नाम से विद्यमान् हँ और अलकापुरी में मेरा नाम कुलाधिप है ॥१५३॥ त्रिकूट क्षेत्र में मेरा नाम गोनर्द है और पाताल में मैं वासुकी रूप से विद्यमान हूँ । केदार में पद्माध्यक्ष और कुष्माण्ड में मेरा नाम सुरतप्रिय है ॥१५४॥ कुण्डवापी में मेरा नाम शुभाङ्ग है तथा सारणी में मैं तक्षक नाम से स्थित हूँ । अक्षोट में मेरा नाम पापहा है तथा अम्बिका में मेरा नाम सुदर्शन है ॥१५४॥ वरदा में मैं महावीर हूँ, कांतार में मैं दुर्गनाशन हूँ । पर्णाट में मैं अनन्त रूप से विद्यमान हूँ प्रकाशा में मैं दिवाकर रूप से स्थित हूँ ।॥१५६॥ विरजा तीर्थ में मैं पद्मनाथ रूप से विद्यमान हूँ तथा वृकस्थल में मेरा नाम रुद्र है । वटकतीर्थ में मेरा नाम मार्कण्डेय हे । और अहिनीतीर्थ में मेरा नाम मृगकेतन है ॥१५७॥ पद्मावती में मेरा नाम पद्मगृह और आकाश में मेरा नाम पद्मकेतन हैं। मैने अपने अष्टोत्तरशत स्थानों का वर्णन किया ॥१५८॥ हे त्रिपुरांतक इन स्थानों में मेरा दर्शन तीनो सन्ध्याओ में होता है । इन सबों में से यदि कोई भक्तिमान पुरुष एक स्थान का भी दर्शन करता है ॥१५९॥। वह निर्मल स्थान को प्राप्त करके निरन्तर आनन्दानुभव करता है । उसके मानसिक, वाचिक तथा कायिक ॥१६०॥ सभी प्रकार के पाप विनष्ट हो जाते हैं । इसमें किसी प्रकार के विचार करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है । जो व्यक्ति मेरे इन समस्त स्थानों में जाकर मेरा दर्शन करता है ॥१६१॥ वह मोक्ष का भागी बन जाता है और जहाँ में रहता हूँ वहीं पर वह भी निवास करता है । फूलों की माला चढाने, धूप के द्वारा तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्थित रूप सेध्यान करने से भी परमेश्वर ब्रह्माजी की प्राप्ति होती है । ऐसा करने वाले को श्रेष्ठ पुण्य की प्राप्ति तथा अन्त में मोक्ष
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