Srishti Khanda Extracted Page 462

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-462

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Sanskrit Original

मल्लिकाक्षे तथा विष्णु महिंद्रे भार्गवस्तथा । गोनर्देस्थविकाकार उज्जयिन्यां पितामह: ॥१३७॥ कौशांब्यां तु महाबोधि रयोध्यायां च राघव: । मुंनीद्रश्चित्रकूटे तु वाराहो विंध्यपर्वते ॥१३८॥ गङ्गाद्वारे परमेष्ठी हिमवत्यपि शङ्करः | देविकाया स्रुचाहस्तः स्त्ुवहस्तश्चतुर्वटे॥१३९॥ वृंदावने पद्मपाणिः कुशहस्तश्चनैमिषे। गोप्लक्षे चैव गोपीन्द्रः सचन्द्रो यमुनातटे ॥९४०॥ भागीरथ्यां पद्यातनुर्जलानंदो जलन्धरे। कौंकणे चैव मद्राक्षः कांपिल्ये कनकप्रियः ॥९४९॥ वेंकटे चान्रदाता च शंभुश्चैव क्रतुस्थले। लंकायां च पुलस्त्योहं काश्मीरे हंसवाहनः ॥१४२॥ बसिष्ठश्चार्बुदे चैव नारदश्रोत्पलावते । मेलके श्रुतिदाता हं प्रपातेयादसांपतिः ॥१४३॥ सामवेदस्तथायज्ञे मधुरो मधुरप्रियः । अंकोटे यज्ञ भोक्ता च ब्रह्मवादे सुरप्रियः ॥१४४॥ नारायणश्च गोमंते मायापुर्यां द्विजप्रियः । ऋषिवेदे दुराधर्षो देवायां सुरमर्दनः ॥९४५॥ विजयायां महारूपः स्वरूपो राष्ट्रवर्द्ने । पृथूदरस्तु मालव्यां शाकंभर्या रसप्रियः ॥१४६॥ पिंडारके तु गोपालः शङ्ोद्धारेङ्गवर्द्नः | कादंबके प्रजाध्यक्षो देवाध्यक्षः समस्थले॥९४७॥ गङ्गाधरो भद्रपीठे जलशाय्यहमर्बुदे । त्र्यंबके त्रिपुराधीशः श्रीपर्वते त्रिलोचनः ॥१४८॥ महादेवः पद्मपुरे कापाले वैधसस्तथा । शृंगबेरपुरेशौरिनैमिषे चक्रपाणिकः॥१४९॥ दंडपुर्या विरूपाक्षो गौतमो धूतपापके । हंसनाथो माल्यवति द्विजेंद्रो वलिके तथा ॥१५०॥ नाम शुभाकार है और वाराणसी में मेरा नाम शिवप्रिय है ॥१३६॥ मल्लिकाक्ष में मेश नाम विष्णु है, महेन्द्र पर्वत पर मेर नाम भागर्व है । गोनदतीर्थ में में स्थविराकार हूँ ओर उज्जयिनी में मेरा नाम पितामह है ।॥१३७॥ कौशाम्बी में मेरा नाम महाबोधि है, और अयोध्या में मैं राघव रूप से विद्यमान हूँ । नैमिष क्षेत्र में मेरा नाम कुशहस्त है, चित्रकूट में मेरा नाम मुनीन्द्र है और विन्ध्यपर्वत पर में वाराह नाम से विद्यमान हूँ ॥१३८।गङ्गाद्वार में मेरा नाम परमेष्ठी है और हिमालय पर में शङ्कर रूप से विद्यमान हूँ । देविका नदी के तट पर मैं खुकहस्त रूप से विद्यमान हूँ और चतुवर्ट में मैं खुवहस्त हूँ ॥१३९॥ वृन्दावन में मैं पद्मपाणि हूँ और नैमिषारण्य में में कुशहस्त हूँ । गोप्लक्ष में मैं गोपीन्द्र हुँ और यमुनातट में मै सुचन्द्र हूँ ॥१४०॥ भागीरथी में में पद्मतनु हूँ और जालन्धर में में जलानन्द हूँ । कोंकण में मैं मद्राक्ष हुँ और काम्पिल्य में मेरा नाम कनकप्रिय है ॥१४१॥ वेङ्कटाचल पर में अन्नदाता रूप से विद्यमान हूँ और क्रतुस्थल में मेरा नाम शम्भु हैं । लङ्का में में पुलस्त्य नाम से विद्यमान हूँ और काश्मीर में मैं हंसवाहन रूप से विद्यमान हूँ ॥१४२॥ अर्बुदक्षेत्र में में वसिष्ठ हूँ और उत्पलावत में में नारद रूप से विद्यमान हुँ । मेलक क्षेत्र में मेरा नाम श्रुतिदाता है और प्रताप क्षेत्र में मैं यादसांपति रूप से विद्यमान हूँ ॥१४३॥ यज्ञ में मेरा नाम सामवेद है और मधुर तीर्थ में मेरा नाम मधुरप्रिय है । अंकोट में मैं यज्ञभोक्ता रूप से विद्यमान हूँ और ब्रह्मवाद में मैं सुरप्रिय रूप से विद्यमान हूँ ॥१४४॥ गोमन्ततीर्थ में मेरा नाम नारायण है और मायापुरी में मेरा नाम द्विजप्रिय है । ऋषिवेद में मेरा नाम दुराधर्ष है और देवा में मेरा नाम सुरमर्दन है ।॥१४५॥ विजया में मेरा नाम महारूप है ओर ाष्टवर्द्धन में मेरा नाम स्वरूप है । मालवी में मेरा नाम पृथूदर है, शाकम्भरी में मैं रसप्रिय रूप से विद्यमान हूँ॥ १४६॥ पिण्डारक तीर्थ में में गोपाल रूप से विद्यमान हुँ, शंखोद्धार में मेर नाम अङ्गवर्द्धन है । कादम्बक क्षेत्र मे मेरा नाम प्रजाध्यक्ष है और समस्थल में मेरा नाम देवाध्यक्ष है ॥१४७॥ गङ्गाधर में मेरा नाम भद्रपीठ है और अर्वुद क्षेत्र में जलशायी रूप से मैं विद्यमान हूँ । त्र्यंबक में मैं त्रिपुराधीश तथा श्रीपर्वत पर मेरा नाम त्रिलोचन है ।।१४८॥ पद्मपुर में महादेव तथा कापाल तीर्थ में मेरा नाम वेधस है । शृङ्गवेरपुर में मेरा नाम शौरि तथा नैमिपक्षेत्र में मेरा नाम

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