Srishti Khanda Extracted Page 461

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-461

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

विरिंचो मे कटिं पातु सृष्टिकृद्दह्ममेब च । नाभिं पद्मनिभ: पातु जठरं चतुराननः ॥१२४॥ उरुस्तु विश्वसृक् पातु हृदयं पातु पद्मज: । सावित्रीपतिमें कंठं हृषीकेशो मुखं मम ॥१२५॥ पड़ावर्णश्च नयने परमात्मा शिरो मम। एवन्यस्य गुरोर्नाम शङ्करो नाम शङ्करः ॥१२६॥ नमस्ते भगवन् ब्रहमन्नित्युक्त्वा विरराम ह । ततस्तुष्टो हरं ब्रह्मा वाक्यमेतदुवाच ह ॥१२७॥ कं ते कामं करोम्यद्य पृच्छ मां यद्यदिच्छसि । रुद्र उवाच यदि प्रसन्नो मे नाथ वरदो यदि वा मम ॥९२८॥ तदेकं मे वद विभो यस्मिन् स्थाने भवान्स्थितः। केषु केषु च स्थानेषु त्वां पश्यन्ति सदाद्विजाः ॥१२९॥ नाम्ना च केन तेस्थानं शोभते धरणीतले । तन्मे वदस्वसर्वेश तव भक्तिरतस्य च ॥१३०॥ ब्रह्मोवाच पुष्करेऽहंसुरश्रेष्ठो गयायां च चतुर्मुखः । कान्यकुब्जे देवगर्भो भृगुकक्षे पितामहः ॥१३१॥ कावेर्य्या सृष्टिकर्ता च नंदिपुर्य्या बृहस्पतिः । प्रभासे पद्मजन्मा चत्वानर्यां च सुरप्रियः ॥१३२॥ द्वारावत्यां तु ऋग्वेदी वैदिशे भुवनाधिपः । पौंडूके पुंडरीकाक्षः पिंगाक्षो हस्तिनापुरे ॥१३३॥ जयंत्यां विजयश्चास्मि जयंतः पुष्करावते। उग्रेषु पद्महस्तोऽहं तमोनद्यां तमोनुदः ॥१३४॥ अहिच्छन्ने जया नंदी कांचीपुर्या जनप्रियः। ब्रह्माहं पाटली पुत्र ऋषिकुंडे मुनिस्तथा ॥९३५॥ महितारे मुकुंदश्च॒ श्रीकंठः श्रीनिवासिते । कामरूपे शुभाकारो वाराणस्यां शिवप्रियः ॥१३६॥ मेरे कटि की रक्षा विरिंचि करें, मेरे गुप्ताङ्गों की रक्षा सृष्टिकृत् करें । पद्मनाभ मेरी नाभि की रक्षा करें तथा मेरे पेट की रक्षा चतुरानन करें ।।१२४॥ उरः स्थल की रक्षा विश्वसृक् करें, मेरे मुख की रक्षा हषीकेश करें ।।१२५॥ दोनों ` नेत्रों की रक्षा पद्मवर्ण करें, मेरे शिर की रक्षा परमात्मा करें । इस तरह से कल्याणकर्ता भगवान् शङ्करजी ने ब्रह्माजी के नामों का अपने अङ्गों में न्यास किया ॥१२६॥ हे भगवन् ! आपको मेरा नमस्कार है, इसतरह से कहकर शङ्करजी चूप हो गये । उससे सन्तुष्ट होकर ब्रह्माजी ने शङ्करजी से कहा ।।१२७॥। बतलाओं मैं तुम्हारी किस इच्छा की पूर्ति करूँ । रुद्र ने कहा-- हे नाथ ! यदि आप प्रसन्न हैं तथा मुझे वरदान देना चाहते हैं ।।१२८॥ तो आप मुझे यह बतलायें कि आप किस-किस स्थान में रहते हैं । आपका ब्राह्मण गण किस-किस स्थान में सदा साक्षात्कार करते हें ॥१२९॥ और भूलोक में वह स्थान किस नाम से सुशोभित होता है ? हे सर्वेश ! में आपका भक्त हुँ, आप मुझे इसी बात को बतलाइये ॥१३०॥ ब्रह्माजी ने कहा-- पुष्कर में मैं सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा के नाम से प्रसिद्ध हुँ और गया में मेरा नाम चतुर्मुख है । कान्यकुब्ज में देवगर्भ मेरा नाम है, भृगुक्षेत्र में मेरा नाम पितामह है ॥१३ १॥ काबेरी में मेरा नाम सृष्टिकर्ता है, नन्दिपुरी में मेरा नाम बृहस्पति है । प्रभास क्षेत्र में मैं पद्मजन्मा के नाम से विख्यात हूँ, वानरी (किकिन्धा) में मेरा नाम सुरप्रिय है ॥१३२॥ द्वारका में मेरा नाम ऋग्वेदी है और विदिशा में मेरा नाम भुवनाधिप है । पौण्डूक क्षेत्र में मेरा नाम पुण्डरीकाक्ष है, हस्तिनापुर में मेरा नाम पिङ्गाक्ष है ॥१३३॥ जयन्ती तीर्थ में मैं जय नाम से स्थित हूँ और पुष्करावत में मेरा नाम जयन्त है । उग्र प्रदेश में में पद्महस्त के नाम से हूँ और तमोनदी (श्यामलापुर) में में तमोनुद के नाम से विख्यात हूँ ॥१३४॥ अहिच्छन्न क्षेत्र में मेरा नाम जयानन्दी है और काञ्चीपुरी में मेरा नाम जनप्रिय है । पाटलीपुत्र में मेरा नाम ब्रह्मा है और ऋषि कुण्ड में में मुनि के नाम से स्थित हूँ।१३५॥। महितार क्षेत्र में मेरा नाम मुकुन्द है और श्रीनिवास क्षेत्र में मेरा नाम श्रीकण्ठ है । कामरूप क्षेत्र में मेरा

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know