Srishti Khanda Extracted Page 460
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-460
Sanskrit Original
इति स्तुतिं मे भगवन् हानंत जुषस्व भक्तस्य विशेषतश्च । समाधियुक्तस्य विशुद्धचेतस स्त्वद्धावभावैकमनोनुगस्य ॥९९२॥ सदा हृदिस्थो भगवन्नमस्ते नमामि नित्यं भगवन्पुराण । इति प्रकाशं तव मेतदीश स्तवं मया सर्वगतिप्रबुद्ध ॥९९३॥ संसारचक्रे भ्रमणादियुक्तांभीतिं पुनर्नः प्रतिपालयस्व ॥११४॥ ब्रह्मोवाच सर्वज्ञस्त्वं न संदेहो प्रज्ञाराशिश्चकेशव। देवानां प्रथमः पूज्यः सर्वदा त्वं भविष्यसि ॥११५॥ नारायणादनंतरं रुद्रोभक्तद्या विरिंचनम् । तुष्टावप्रणतो भूत्वा ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ॥११६॥ नमः कमलपत्राक्ष नमस्ते पद्मजन्मने। नमः सुरासुरगुरो कारिणे परमात्मने ॥१९७॥ नमस्ते सर्वदेवेश नमो वै मोहनाशन । विष्णोर्नाभिस्थितवते कमलासनजन्मने ॥११८॥ नमोविद्रुमरक्तांगपाणिपल्लवशोभिने । शरणं त्वां प्रपन्नोस्मि त्राहि मां भवसंसृतेः॥९१९॥ पूर्व नीलांबुदाकारं कुड्मलं ते पितामह। दृष्ट्वा रक्तमुखं भूयः पत्रकेसरसंयुतम् ॥१२०॥ पड़ा चानेकपत्रान्तमसंख्यातं निरंजनम् । तत्रस्थितिन त्वयैषा सृष्टिश्चैव प्रवर्तिता ॥१२९॥ त्वां मुक्त्वा नान्यतस्त्राणं जगद्वंद्य नमोस्तुते । सावित्री शापदग्धोहं लिंगं मे पतितं क्षितौ॥९२२॥ इदानी कुरु मे शांतिं त्राहि मां सह भार्यया | ब्रह्मा वै पातु मे पादौ जंघे वै कमलासनः ॥९२३॥ उपासना नहीं करते वे नरक में जाते हैं ॥११५०॥ आपकी उपासना करने वाले जीव मुक्त हो जाते हैं । आप ही अश्विनी कुमार, अग्नि, सूर्य, वायु, पृथिवी आदि के रूप को धारण करने वाले हैं; हे विस्तृत स्वभाव वाले देव! आप अपने ही स्वरूप में स्थित रहे हैं ॥१११॥ हे अनन्त ! स्वरूप भगवन् मेरी इस स्तुति को आप स्वीकार करें। में तो आपका विशेष रूप से भक्त हूँ । मेंने समाधिस्थ होकर, शुद्ध अन्तःकरण से तथा आपकी ही भक्ति में मन को लगाकर यह स्तुति की है ॥११२॥ हे मेरे हृदय में विद्यमान रहने वाले भगवन् ! आपको नमस्कार है; हे पुराणपुरुष! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे ईश ! आप सबको सुलभ है; सर्वव्यापक आपकी यह स्तुति मैंने सावधानी पूर्वक की है ॥११३॥ इस संसारचक्र में भ्रमण करने के भय से भयभीत आप हमारी रक्षा करे ॥११४॥ ब्रह्माजी ने कहा-- हे केशव ! इसमें कोई भी सन्देह नहीं है कि आप सर्वज्ञ हें, आप ज्ञान की राशि हें आप सदैव सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य होयेंगे ॥११५॥ नारायण के पश्चात् शङ्करजी ने कमलोद्भव ब्रह्माजी की भक्ति पूर्वक स्तुति की ॥११६॥ हे कमलदल के समान नेत्र वाले, हे कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी आपको नमस्कार है । हे देवताओं और असुरों के पूज्य, जगत् की सृष्टि करने वाले परमात्मन् आपको नमस्कार है ॥११७॥ हे देवेश ! हेअज्ञान को विनष्ट करने वाले, हे विष्णु की नाभि में स्थित कमल से जन्म लेने वाले ब्रह्माजी आपको नमस्कार है॥११८॥ हे विद्रुम के सदृश लाल-लाल हाथ आदि अड्डों से सुशोभित ब्रह्माजी, मैं आपके शरण में हूँ, आप हमारी संसार के बन्धन से रक्षा करे ॥११९॥ हे पितामह ! पहले आपके कमल का कुडमलका वर्ण नील मेघ के समान था । उसको लाल तथा दल के केसरों से युक्त देखकर ॥१२०॥ एवं उसे अनेक पत्रों वाला निर्दोष देखकर आपने उस पर बैठकर इस जगत् की सृष्टि की ॥१२१॥ हे जगद्वंद्य ! आपको छोडकर दूसरा कोई जगत् का रक्षक नहीं है, अतएव आपको नमस्कार है । मैं सावित्री के शाप से दग्ध हुँ, मेरा लिङ्ग पृथिवी पर गिर पड़ा है ॥१२२॥ अपनी पत्नी के साथ आप मेरा कल्याण करें । मेरे चरणों की रक्षा ब्रह्माजी करें, जड्डों की रक्षा कमलासन करें ॥१२३॥
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