Srishti Khanda Extracted Page 459
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-459
Sanskrit Original
वाक्याणिपादैर्विगतेन्द्रियोपि कथं भवान्वै सुगतिस्सुकर्मा । संसारबंधे निहितेंद्रियोऽपि पुनः कथं देववरोसि वेद्यः ॥९०३॥ मूर्तादमूर्त न तु लभ्यते परं परं वपु देवविशुद्धभावैः । संसारविच्छित्तिकरै र्यजद्धि रतोऽ वसीयेत चतुर्मुखत्वम् ॥१ ० ४॥ परं नजानंति यतो वपुस्ते देवादयोऽप्यद्धुतरूपधारिन् । विभोवतारेऽ ग्रतरंपुराण माराधयेद्यत्कमलासनस्थम् ॥१०५॥ न ते तत्त्वं विश्वसृजोपियोनि मेकांततो वेत्ति विशुद्धभाव: । परं त्वहं वेद्मि कथं पुराणं भवंतमाद्यं तपसा विशुद्धम् ॥९०६॥ पद्यासनो वै जनकः प्रसिद्ध एवं प्रसिद्धिर्ासकृत् पुराणात् । संचिंत्यते नाथ विभुं भवंतं जानाति नैवं तपसा विहीनः ॥ १ ०७॥ अस्मादृशैश्च प्रवरै विबोध्यं त्वा देव मूर्खाः स्वमतिं विभज्य । प्रबोद्धमिच्छन्ति न तेषु बुद्धि रुदारकीर्तिष्वपि वेदहीनाः ॥१०८॥ जन्मांतरै वेंदविवेकबुद्धिभि भविद्य॒था वा यदि वा प्रकाशः । तल्लाभलुब्धस्य नमानुषत्वं न देवगंधर्वपतिः शिवः स्यात् ॥१०९॥ नविष्णुरूपो भगवान्सुसूक्ष्मः स्थूलोसि देवः कृतकृत्यतायाः । स्थूलोऽपि सूक्ष्मः सुलभोसि देव त्वद्वाह्मकृत्या नरके पतंति ॥९९०॥ विमुच्यते वा भवतिस्थितेस्मिन् दस्रेन्दुवह्नयर्क मरुन्महीभिः । तत्वैः स्वरूपैः समरूपधारिभि रात्मस्वरूपे विततस्वभावः ॥९ ९ ९॥ आप विशाल मूर्ति तथा सूक्ष्मरूप वाले हैं ॥१०२॥ वाक्, पाणि, पाद आदि कर्मेन्द्रियों से रहित होकर भी आप सुन्दर गति से युक्त तथा सुन्दर कर्म करने वाले हैं । इस संसार के बन्धन में आसक्त इन्द्रियों वाले भी होकर आप देवश्रेष्ठ रूप से जानने योग्य हैं ॥१०३॥ हे देव ! मूर्त की अपेक्षा अमूर्त श्रेष्ठ रूप से नहि प्राप्त होता है । इसीलिए विशुद्धभाव सम्पन्न, संसार बन्धन को विनष्ट करने वाले याजिकों द्वार आपका चतुर्मुख रूप ही निश्चित किया जाता है।। १०४।। हे अद्भुत रूप धारण करने वाले ब्रह्माजी देवतागण भी आपके परं रूप को नहीं जानते हैं, हे विभो ! अवतारो में श्रेष्ठ आपका जो कमलासनस्थ रूप है, उसे नहीं जानने के कारण वे उसकी आराधना नहीं कर पाते हैं। १०५॥ विश्व की सृष्टि करने वाले आपको विशुद्धभाव वाले पुरुष भी तत्त्वत: नहीं जान पाते हैं, ऐसी स्थिति में तपस्या करने के कारण विशुद्ध बने हुए, आद्य पुरुष आपको मैं कैसे जान सकता हुँ ।॥१०६।। आप पद्म के आसन पर बैठे हैं, सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा हैं, इस बात को पुराणों में बार-बार कहा गया है, इस बात का अच्छी तरह से चिन्तन करके भी व्यापक आपको तपस्या से ही व्यक्ति जान पाता है ॥१०७॥ हमारे सदृश श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा जानने योग्य आपको हे देव ! मूर्ख जीव अपनी बुद्धि का विभाग करके आपको जानना चाहते है, उदारकीर्ति वाले भी लोगों में वेदज्ञान नहीं होने के कारण बुद्धि है ही नहीं ॥१०८॥ अनेक जन्मों के प्रयास के द्वारा जिनमें वेद का ज्ञान, तथा विवेक उत्पन्न हो गया है, या प्रकाश उत्पन्न हो गया है । जो उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहता है, वह मनुष्य नहीं होता है, वह तो देव, गन्धर्व या शिव स्वरूप हो जाता है ॥१०९॥ हे देव ! आप विष्णुरूप से अत्यन्त सूक्ष्म नहीं है, आप कृतकृत्यता के स्थूल रूप हैं । आप स्थूल होकर भी सूक्ष्म हैं तथा सुलभ हैं ऐसे आपकी जो लोग
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