Srishti Khanda Extracted Page 457

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-457

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Sanskrit Original

करे रे श्रीपदामहापुराण पुलस्त्य उवाच देवदेवस्तदा ब्रह्मा पुष्करे विष्णुना सह । स्नानावसाने देवानां सर्वेषां प्रददौ वरान् ॥८ १॥ देवानां च पतिं शक्रं ज्योतिषां च दिवाकरम् । नक्षत्राणां तथा सोमं रसानां वरुणं तथा॥८२॥ प्रजापतीनां दक्षं च नदीनां चैव सागरम् । कुबेरं च धनाध्यक्षं तथा चक्रे च रक्षसाम् ॥८३॥ भूतानां चैव सर्वेषां गणानां च पिनाकिनम्। मानवानां मनुं चैव पक्षिणां गरुडं तथा ॥८४॥ ऋषीणां च वसिष्ठं च ग्रहाणां च प्रभाकरम्। एवमादीनि वै दत्वा देवदेवः पितामहः ॥८ ५॥ ब्रह्मोवाच विष्णुं च शङ्करं चैव ब्रह्मा प्रोवाच सादरम् । पृथिव्याः सर्वतीर्थेषु भवंतौ पूज्यसत्तमौ ॥८६॥ भवद्भ्यां न विना तीर्थ पुण्यतामेति कर्हिचित् । लिंगं वा प्रतिमा वापि दृश्यते यत्र कुत्रचित्॥८७॥ तत्तीर्थं पुण्यतां याति सर्वमेव फलप्रदम्। मानवा ह्युपहारैश्च येकरिष्यंति पूजनम् ॥८८॥ युष्माकं मां पुरस्कृत्य तेषां रोगभयं कुतः । येषु राष्ट्रेषु युष्माकमुत्सवाः पूजनादिकाः ॥८९॥ प्रवर्त्स्यंती क्रियाः सर्वा यत्फलं तेषु तच्छृणु। नाधयो व्याध्यश्चैव नोपसार्गा न क्षुद्धयम्॥९०॥ विप्रयोगो न चापीष्टै रनिष्टेर्नापि संगतिः। नाक्षिरोगः शिरोर्ति र्वा पित्तशूलभगंदराः ॥९१॥ नाभिचारभयं तत्रापस्मारो न विषूचिका । वृद्धिर्निकामतस्तस्मिन् सम्यग्बुद्धिरनुत्तमा ॥९२॥ आरोग्यं सर्वतश्चैव दीर्घायुश्च प्रजाधनम् । नाकाले भविता मृत्युर्गावो नाल्पपयोमुचः॥९३॥ नाकालफलिता वृक्षा नोत्पातभयमण्वपि । एतच्छुत्वा ततोविष्णुर्ब्ह्माणं स्तोतुमुद्यतः ॥९४॥ स्नान किया और देवताओं को वरदान दिया ॥८१॥ उन्होंने देवताओं के स्वामी इन्द्र को, ज्योतियों के स्वामी सूर्य को, नक्षत्रों के स्वामी चन्द्रमा को तथा सभी रसों का स्वामी वरुण को बनाया ।।८२॥ प्रजापतियों का स्वामी दक्ष प्रजापति को, नदियों का स्वामी सागर को, धन का तथा राक्षसो का स्वामी कुबेर को बनाया ॥८३॥ सभी भूतो तथा गणों का स्वामी पिनाकधारी भगवान् शङ्कर को, मनुष्यों का स्वामी मनु को तथा पक्षियों का स्वामी गरुड कोबनाया।।८४।। ऋषियों का स्वामी वसिष्ठ को तथा ग्रहों का स्वामी सूर्य को बनाया । इसतरह से वरदानों को देकर देवाराध्य ब्रह्माजी ॥८५॥ ने प्रेम पूर्वक रुद्र एवं विष्णु से कहा आप दोनों पृथिवी के समस्त तीथों में अत्यन्त पूज्य होयेंगे ॥८६॥ आप दोनों के बिना कोई भी पुण्य प्रदान करने वाला तीर्थ नहीं होगा । जहाँ कहीं भी आप दोनों की प्रतिमा अथवा लिङ्ग दिखायी दे वहाँ पर जो भी मनुष्य उपचारों द्वार आप दोनों की पूजा करेंगे उन लोगों को वही: तीर्थ अधिक पवित्र तथा समस्त फलों को प्रदान करने वाला होगा ॥८८॥ मुझको आगे करके जो लोग आपलोगों की पूजा करेंगे । उनको रोग का भय नहीं होगा । जिनके राष्ट्रों में आपलोगों के उत्सव मनाये जायेंगे तथा आपलोगों की पूजा आदि होंगे ॥८९॥ वहाँ पर होने वाली समस्त क्रियाएँ सफल होंगी । वहाँ पर आधि, व्याधि, महामारी तथा भूखमरी के भय नहीं होंगे ॥९०॥ वहाँ किसी को न तो प्रिय का विप्रयोग होगा और न अप्रिय का संयोग होगा । नेत्र के रोग, शिरोरोग, पित्त, शूल तथा भगन्दर के रोग नहीं होंगे ॥९१॥ वहाँ न अभिचारकर्म, न अपस्मार रोग होगा और न विषूचिका होगी । वहाँ के लोगों की समृद्धि इच्छानुकूल होगी और बुद्धि भी सन्मार्ग गामिनी होगी ॥९२॥ हर ओर आरोग्य बना रहेगा दीर्घ आयु होगी, और प्रजाओं के पास धन होगा । बेसमय के किसी की मृत्यु नहीं होगी तथा गायों का दूध नहीं कम होगा ॥९३॥ बेसमय के वृक्षों में फल नहीं आयेंगे । थोड़ा सा भी किसी उत्पात का भय नहीं होगा । इन सारी बातों को सुनकर भगवान् विष्णु ब्रह्माजी की स्तुति करने के लिए उद्यत हो गये ॥९४॥

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