Srishti Khanda Extracted Page 456

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-456

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Sanskrit Original

एवमुक्ता च सा देवी स्वयं देवेन ब्रह्मणा। त्रपयाधोमुखी देवी न च किंचिदवोचत॥६ ८॥ पादयोः पतिता देवी गायत्री ब्रह्मचोदिता । कृतवत्यपराधं ते क्षम देवि नमोस्तुते ॥६९॥ पुलस्त्य उवाच आलिंग्य सादरं कंठे सा परिष्वज्य पीडिताम्। गायत्रीं सांत्वयामास मान्यश्चैष पतिर्मम ॥७०॥ कर्त्तव्यं वचनं तस्य स्त्रीणां प्राणेश्वरः पतिः। उक्तं भगवता पूर्व सृष्टिकाले विरिचिना ॥७१॥ न च ख्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् । भर्ता यद्ददते वाक्यं तत्तुकुर्यादकुत्सया॥७२॥ भर्तनिंदां या कुरुते स्वसृनिंदां तथैव च । परिवादं प्रलापं वा नरकं सा तु गच्छति॥७३॥ पत्यौ जीवति या नारी उपवासब्रतं चरेत्। आयुष्यं हरते भर्तु र्मृुता नरकमिच्छति॥७४॥ एव ज्ञात्वा त्वया भर्तु र्न कार्य विप्रियं सति । नचास्य दक्षिणं त्वंगं त्वया सेव्यं कथंचन॥७५॥ सर्वकार्ये त्वहं चास्य दक्षिणं पक्षमाश्रिता । सव्यं त्वमाश्रयेस्साध्वि पार्श्वे नारदपुष्करौ ॥७६॥ बरह्मस्थानानि चान्यानि स्थितान्यायतनानि च । लभे वै शोभमानेह यावत् सृष्टिः प्रजायते॥७७॥ भवत्या च मया चैव स्थातव्यं च न संशयः। पुष्करे ब्रह्मणः पाश्चे वामं च त्वं समाश्रय ॥७८॥ अनेन चोपदेशेन सुखं तिष्ठ मयान्विता। गायत्र्युवाच एवमेतत्करिष्यामि तव निर्देशकारिका ॥७९॥ तवैवाज्ञा मया कार्या त्वं मे प्राणसमा सखी । अहं ते त्वनुजा देवि सदा मां पातुमर्हसि ॥८०॥ देखकर गायत्री देवी के साथ विद्यमान ब्रह्माजी ने कहा ॥६६॥ हे देवि ! यह आपकी आज्ञाकारिणी है और मैं आपके वशवर्ती हूँ । हे देवि ! आप मुझे आज्ञा दो, आपकी कौन सी सेवा करूँ ॥६७॥ इसतरह से ब्रह्माजी के द्वारा कहे जाने पर सावित्री देवी ने लज्जा से अपना मुख नीचे कर लिया और कुछ नहीं बोलीं ॥६८॥ ब्रह्माजी की आज्ञा प्राप्त करके गायत्री देवी सावित्री देवी के चरणों पर गिर पड़ी और कहीं हे देवि ! मैंने आपका अपराध किया है आप मुझे क्षमा करें । आपको नमस्कार है ॥६९॥ इसके बाद सावित्री देवी ने गायत्री देवी को अपने हृदय से लगा लिया और गायत्री देवी को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा-- ये हमारे पति सम्माननीय हैं ।७०॥ इनकी बातों को मानना चाहिए, पति पत्नी के प्राणेश्वर होते हें । इस बात को ब्रह्माजी ने सृष्टिकाल में ही कहा था ।।७१॥। पति जो कहें उसको बिना किसी चिन्ता के मानना चाहिए, इससे भिन्न स्री के लिए कोई भी यज्ञ, उपवास तथा व्रत नहीं है ॥७२॥ जो स्री अपने पति अथवा सासु की निन्दा करती है अथवा उनका विरोध या कलह करती है, वह नरक में जाती है। पति के जीवित रहने पर जो नारी किसी उपवास या ब्रत को करती है, वह अपने पति की आयु को क्षीण करती है॥७४॥ अतएव तुम कभी भी पति के प्रतिकूल आचरण न करना, इनके कभी भी दाहिनी ओर नहीं बैठना ॥७५॥ सभी कार्यो में मैं इनकी दाहिनी ओर और तुम बायी ओर रहोगी, नारद और पुष्कर दोनों बगल में रहेंगे ॥७६॥ ब्रह्मजी के अन्य भी स्थान और मन्दिर है, इस लोक में मैं सृष्टिकाल पर्यन्त इसीतरह रहूँगी ॥७७॥ तुम और हम दोनों पुष्कर में एक साथ रहेंगे । मै ब्रह्माजी की दाहिनी ओर और तुम बायीं ओर रहोगी ॥७८॥ मेरे इस उपदेश को मानकर मेरे साथ सुख पूर्वक रहो । गायत्री देवी ने कहा-- मैं ऐसा ही करूंगी । में तो आपकी आज्ञा का पालन करने वाली हुँ ॥७९॥। हे सखी ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगी, आप मेरी प्राणप्रिया सखी हैं । हे देवि ! आपकी छोटी बहन हूँ, आप मेरी सदा रक्षा करना ॥८०॥ उसके बाद देवाराध्य ब्रह्माजी ने भगवान् विष्णु के साथ

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