Srishti Khanda Extracted Page 454

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-454

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Sanskrit Original

विना त्वया न चान्यत्र रतिं यास्यति कर्हिचित् । भृगोः पत्न्यां समुत्पन्ना पत्येषा तव सुत्रता ॥४३॥ देवदानवयत्मेन संभूता चोदधौ पुनः। भगवान्यत्र तत्रैषा अवतारं च कुर्वती ॥४४॥ देवत्वे देवदेहा वै मानुषत्वे च मानुषी । त्वत्सहाया न संदेहो दांपत्यव्रतिनी चिरम्॥४५॥ यन्मया चात्र कर्त्व्यं प्रभो तन्मां वदस्व वै । विष्णुरुवाच यज्ञावसानं संजातं प्रेषितोहं तवांतिकम् ॥४६॥ सावित्रीमानय क्षिप्रं मया स्नानं समाचरेत्। आगच्छ त्वरिता देवि याहि तत्र मुदान्विता ॥४७॥ पश्य स्वस्य पतिं गत्वा देवैः सर्वैस्समन्वितम् । लक्ष्मीरुवाच आर्ये उतिष्ठ शीघ्रं त्वं याहि यत्र पितामहः ॥४८॥ बिना त्वया न यास्यामि स्पृष्टौ पादौ मया तव । उत्थाप्य साग्रहीद्धस्त॑ दक्षिणा दक्षिणे करे॥४९॥ चिरायमाणां सावित्रीं ज्ञात्वा देवः पितामहः। समीपस्थं महादेवमिदमाह तदा वचः॥५०॥ ब्रह्मोवाच गच्छ त्वमनया सार्ध पार्वत्याऽसुरदूषण । गौरी त्वदग्रतो यातु पश्चात्त्वं गच्छ शङ्कर ॥५१॥ पुलस्त्य उवाच प्रतिबोध्यानय यथा शीघ्रमायाति तत्कुरु । एवमुक्तौ तदा तौ तु पर्वतीपरमेश्वरौ॥५२॥ गत्वादिष्टौ दंपती तां प्रोचतुर्ब्रह्मण: प्रियाम् । बृहत्कृत्यं त्वया तत्र करणीयं पतिव्रते ॥५३॥ पृच्छस्वेमां वरारोहां गौरीं पर्वतनंदिनीम् । लक्ष्मींचैतां विशालाक्षीमिंद्राणीं वा शुभानने॥५४॥ करेगी ॥४१-४२॥ आपके बिना यह किसी से भी प्रेम नहीं करेगी । आपकी यह सुव्रता पहले भृगु महर्षि की पत्नी ख्याति देवी के गर्भ से उत्पन्न हुयी ॥४३॥ देवताओं तथा दानवों के प्रयास से यह पुन: समुद्र से उत्पन्न हुयी । जहाँ पर आपका अवतार होता है, वहीं पर यह भी अवतार लेती हैं ॥४४।॥ आपके देवता होने पर यह देव शरीर कोधारण करती है और मनुष्य होने पर मानव शरीर को धारण करती है । यह सदा आपके साथ ही रहा करती है, यह दीर्घकाल से दाम्पत्य व्रत को करने वाली है ॥४५॥ हे प्रभो ! मुझे जो कुछ करना है, उसे आप बतलाइये । भगवान् विष्णु ने कहा-- यज्ञ समाप्त हो गया है, मुझे ब्रह्माजी ने आपके पास भेजा है ॥४६॥ उन्होंने कहा है कि शीघ्र सावित्री को लाओ । वह मेरे साथ स्नान करें । हे देवी ! आप वहाँ पर प्रसन्नता पूर्वक शीघ्र चलें ।४७॥ वहाँ जाकर सभी देवताओं के साथ अपने पति को प्रसन्न कीजिये । लक्ष्मी देवी ने कहा-- हे आर्ये ! शीघ्र उठो, तथा शीघ्र वहाँ चलो जहाँ पर श्रीब्रह्माजी हैं ॥४८॥ में आपके बिना जा नहीं सकती हूँ, मैंने आपके चरणों को छू भी लिया है । इसके बाद लक्ष्मीजी ने सावित्री देवी को उठाकर उनके दाहिने हाथ को. पकड़ लिया ॥४९॥ देर करती हुयी सावित्री देवी को जानकर ब्रह्माजी ने शङ्करजी से कहा ॥५०॥ ऐ असुरों को दूषित करने वाले शङ्करजी इस पार्वती देवी के साथ आप जाइये । आगे गौरी देवी जायँ ओर आप उनके पीछे से जाइये ॥५१॥ उसे अश्वस्त करके शीघ्र लाइये । ब्रह्माजी के इसतरह से कहने पर पार्वतीजी तथा शङ्करजी ॥५२॥ पति-पत्नी दोनों जाकर ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री देवी से कहे हे पतिव्रते ! वहाँ पर चलकर आपको बहुत बड़ा काम करना है ॥५३॥ आप इस पर्वत नन्दिनी पार्वती से पूछ लीजिये इस बात को आप विशाल नेत्रों वाली लक्ष्मी तथा शची से भी पूछ लें ॥५४॥ हे देवि ! जिन

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