Srishti Khanda Extracted Page 453

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-453

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Sanskrit Original

अभिप्रसाद्यसावित्री त्वमिहानय सुत्रत। त्वयि दृष्टे न सा कोपं करिष्यति शुभानना ॥२८॥ स्निग्धे: सानुनये र्वाक्यै हेतुयुक्ते विशेषत: । त्वं सदा मधुराभाषी जिह्वा तेस्रवतेमृतम्॥२९॥ यः करोति न ते वाक्यं त्रैलोक्ये न सदृश्यते। गंधर्वैः सहितो गत्वाप्रिया मम समानय॥३०॥ त्वया प्रसादिता साध्वी तुष्टा सा त्वेष्यति ध्रुवम् । विलंबो न त्वया कार्यो ब्रज माधव माचिरम् ॥३९॥ लक्ष्मीस्ते पुरतो यातु सावित्र्याः सदनं शुभा। तस्यास्त्वं पदवीं गच्छ सांत्वयस्व प्रिया मम ॥३२॥ न च ते विप्रियं देवि विविक्तं कर्तुमीहते । मुखं प्रेक्ष्य सदा कालं वर्तते तव सुंदरि ॥३३॥ एवं विधानि वाक्यानि मधुराणि बहूनि च। देवी श्रावयितव्या सा यथा तुष्टाऽचिराद्धवेत् ॥३४॥ एवमुक्तस्तदा विष्णुर्ब्रह्मणा लोककारिणा। जगाम त्वरितो भूत्वा सावित्री यत्र तिष्ठति ॥३५॥ दूरादेवागच्छमानं पत्या सह च केशवम् । उत्तस्थौ सत्वरा भूत्वा विष्णुना चाभिवंदिता ॥३६॥ नमस्ते देवदेवेशि ब्रह्मपत्नि नमोस्तुते। त्वां नमस्कृत्य सवो हि जनः पापात्प्रमुच्यते ॥३७॥ पतिव्रता महाभागा ब्रह्मणस्त्वं हृदि स्थिता । अहर्निशं चितयंस्त्वां प्रसादं तेभिकांक्षति ॥३८॥ सखी चैनां प्रियां पृच्छ लक्ष्मीं भृगुसुतां सतीम्। यदि च श्रद्दधानासि वाक्यादस्मात्सुलोचने ॥३९॥ एवमुक्त्वा ततः शौरिः सावित्र्याश्वरणद्वयम् । उभाभ्यां चैव हस्ताभ्यां क्षम देवि नमोस्तुते ॥४०॥ जगद्वंदो जगन्मातरिति स्पृष्ट्वाऽ भ्यवन्दत । संकोच्य पादौ सा देवी स्वकरेण करौ हरेः ॥४९॥ शृहीत्वोवाच तं विष्णुं सर्व क्षान्तं मयाच्युत। इयं लक्ष्मीः सदा वत्स हृदये ते निवत्स्यति ॥४२॥ सदस्यों को अपनी इच्छा के अनुसार दान देना चाहिए । इसके बाद प्रसन्नता पूर्वक भगवान् विष्णु को बुलाकर ब्रह्माजी ने कहा ॥२७॥ हे सुव्रत ! आप प्रसन्न करके सावित्री को यहाँ लाइये । आपको देखकर सावित्री क्रोध नहीं करेगी ॥२८॥ स्नेह, तथा अनुनय से युक्त तथा युक्ति-युक्त वाक्यों द्वारा उसे लाइये । आप तो सदा मधुर ही बोलते हें । आपकी जिह्वा से सदा अमृत टपकता है ॥२९॥ त्रैलोक्य में ऐसा कोई भी नहीं है जो आपकी बात को न मानें। गन्धर्वो के साथ जाकर आप मेरी पत्नी सावित्री को लाइये ॥३०॥ आपके मनाने पर वह निक्षित रूप से आयेगी । हे माधव ! देर न कीजिये शीघ्र जाइये ॥३१॥ आपसे आगे ही लक्ष्मी देवी सावित्री के घर जायँ । आप लक्ष्मी देवी के पीछे जायँ और मेरी प्रियतमा को सान्त्वना प्रदान करें ॥३२॥ आप उससे कहेंगे कि हे सुन्दरि ! ब्रह्माजी आपके -मन के प्रतिकूल कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हैं, वे सदा आपके मुख को देखते रहते हैं ॥३३॥ इस तरह की अनेक वाक्यों को आप उससे कहें जिससे कि वह शीघ्र प्रसन्न हो जाय ॥३४॥ लोक स्रष्टा ब्रह्माजी के इस तरह कहने पर भगवान् विष्णु शीघ्र ही सावित्री देवी के पास गये ॥३५॥ दूर से अपनी पत्नी के साथ आते हुए भगवान् विष्णु को देखकर सावित्री देवी शीघ्र उठकर खड़ी हो गयीं और भगवान् विष्णु ने उनकी वन्दना की ॥३६॥ हे देवदेवेशि ! आपको नमस्कार है । हे ब्रह्माजी की पत्नी आपको नमस्कार है । आपको नमस्कार करके सभी लोग पापमुक्त हो जाते हें ॥३७॥ आप पतिव्रता, महाभागा तथा ब्रह्माजी के हृदय में निवास करती हैं । आपकी निरन्तर चिन्ता करते हुए ब्रह्माजी आपकी प्रसन्नता चाहते हैं ॥३८॥ आप अपनी प्रिय सखी तथा महर्षि भृगु की पुत्री लक्ष्मी से ही पूछ लीजिये। हे सुलोचने ! आप मेरी इन बातों पर विश्वास करें । इस तरह से कहकर भगवान् विष्णु ने सावित्री देवी के दोनों पैरों को पकड़ कर कहा देवि ! आप क्षमा करें ॥३९-४०॥ हे जगद्रंन्ध मात: इस तरह से सावित्री देवी के चरणों का स्पर्श करके भगवान् विष्णु ने वन्दना की । अपने दोनों पैरों को समेट कर सावित्री देवी ने श्रीहरि के दोनों हाथों को पकड़ लिया और कहा हे अच्युत ! मैंने सब क्षमा कर दिया है । हे वत्स ! यह लक्ष्मी तुम्हारे हृदय में सदैव निवास

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