Srishti Khanda Extracted Page 452

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-452

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

सृष्टिखग्ड ४२७ शतानि त्रीणि षष्टिश्च यज्ञाः सृष्टाः स्वयंभुवा। एतांश्चैतेषु सर्वेषु प्रवदन्ति सदाद्विजान् ॥१९ २॥ सदस्यं केचिदिच्छन्ति त्रिसामाध्वर्युमेव च । ब्रह्माणं नारदं चक्रे ब्राह्मणाच्छंसिगौतमम् ॥१३॥ देवगर्भं च हीतारमाम्रीध्रं चैव देवलम् । उद्गातांगिरसः प्रत्युद्नाता च पुलहस्तथा ॥१४॥ नारायणः प्रतिहर्ता सुब्रह्मण्योत्रि रुच्यते । तस्मिन्यज्ञे भृगुहोता वसिष्ठो मैत्र एव च ॥१५॥ अच्छावाकः क्रतुः प्रोक्तो ग्रावस्तुच्च्यवनस्तथा। पुलस्त्योद्धवर्युरेवासीत््तिष्ठाता च वै शिबिः ॥१६॥ बृहस्पतिस्तत्रनेष्टा उन्नेता शांशपायनः । धर्मः सदस्यस्तत्रासीत्पुत्रपौत्रसहायवान् ॥१७॥ भरद्वाजः शमीकश्च पुरुकुत्सो युगंधर: । एनकस्तीर्णकश्चैव केशः कुतप पव च ॥१८॥ गर्गो वेदशिराश्चैव त्रिसामाद्धवार्यवः कृताः। कण्वादयस्तथाचान्यो मार्कडो तण्डिरेव च ॥१९॥ पुत्रपौत्रसमेताश्च सशिष्याः सह बांधवाः । कर्माणि तत्र कुर्वाणा दिवानिशमतंद्रिताः ॥२०॥ मन्वंतरे व्यतीते तु यज्ञस्यावभृथोऽ भवत् । दक्षिणा ब्रह्मणे दत्ता प्राची होतुस्तु दक्षिणा ॥२९॥ अद्ध्वर्यवे प्रतीची तु उद्गातुश्चोत्तरा तथा । त्रैलोक्यं सकलं ब्रह्मा ददौ तेषां तु दक्षिणाम् ॥२२॥ धेनूनां च शतं प्राज्ञ दतव्यं यज्ञसिद्धये। अष्टौ तु यज्ञवाहानां चत्वारिंशाधिकास्तथा ॥२३॥ द्वितीयस्थानिनां चैव चतुर्विशत्प्रकीर्तिताः । षोडशैव तृतीयानां देया वै धेनवः शुभाः ॥२४॥ द्वादशैव तथा चान्या आग्नीध्रादिषु दापयेत् । अनया संख्यया चैव ग्रामान् दासीरजाविकं ॥२५॥ सहस्त्रभोज्यं दातव्यं स्नात्वा चावभृथे क्रतौ । यजमानेन सर्वस्वं देयं स्वायं भुवोब्रवीत् ॥२६॥ अद्ध्वर्युणां सदस्यानां स्वेच्छया दानमिष्यते । विष्णुं चाहूय वै ब्रह्मा वाक्यमाह मुदान्वितः॥२७॥ सभी यज्ञों के ऋत्विज ब्राह्मणों की सोलह संख्या होनी चाहिए ॥१२॥ कुछ लोग इन ऋत्विजों के अतिरिक्त एक सदस्य तथा ग्यारह त्रिसामाध्वर्युओं को भी बतलाते हैं । ब्रह्माजी ने नारदजी को ब्रह्मा बनाया ओ. एम ऋ! हो आग्नीघ्र बनाया । अङ्गिरा ऋषि को उद्गाता और पुलह ऋषि को प्रत्युद्राता ॥१३-१४॥। नारायण ' प्रतिहर्ता और अत्रि ऋषि को सुव्रह्मण्य बनाया । उस यज्ञ में भृगु महर्षि होता, वसिष्ठ महर्षि को मैत्रावरुण ।, ,५॥ क्रतु को अच्छावाक् तथा च्यवन महर्षि को ग्रावस्तुत बनाया । पुलस्त्य (मुझे) को अध्वर्यु तथा शिवि को प्र/तप्ठाता ॥१६॥ उस यज्ञ में बृहस्पति नेष्टा थे तथा शांशपायन को उन्नेता बनाया गया । उस यज्ञ में अपने पुत्रों तथा पौत्रों के साथ धर्म सदस्य थे ॥१७॥ भरद्वाज, शमीक, पुरुकृत्स, युगन्धर, एनक, तीर्णक, केश तथा कुतप ॥१८॥ गर्ग, वेदशिरा, ये सबके सब त्रिसामाध्वर्यु हुए । कण्व आदि, मार्ण्कडेय, तण्डि ॥१९॥ ये सभी अपने पुत्रों, पौत्रों तथा बान्धवों तथा शिष्यों के साथ बड़ी सावधानी से रात-दिन दूसरे कार्यो को करते थे ॥२०॥ उस मन्वन्तर के बीत जाने पर उस यज्ञ का अवभृथ स्नान हुआ । ब्रह्माजी ने ब्रह्मा को दक्षिणा के रूप में पूर्वदिशा होता को दक्षिण दिशा ॥२१॥ अध्वर्यु को पश्चिम दिशा और उद्गाता को उत्तर दिशा प्रदान किया । इसतरह से ब्रह्माजी ने उन सबों को दक्षिणा के रूप में त्रैलोक्य को ही प्रदान कर दिया ॥२२॥ प्राज्ञ पुरुष को यज्ञ का सम्पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए सो गौओं को दान में देना चाहिए । उनमें से यज्ञ का निर्वाह करने वाले प्रथम ऋत्विज समुदाय को अड़तालिस गायें ॥२३॥ दूसरे स्थान के ऋत्विजं को चौबीस, तीसरे स्थान के ऋत्विजों को सोलह ॥२४॥ तथा आग्नीध्र इत्यादि को वारह गायें देनी चाहिये । इसी संख्या में ऋत्विजों को ग्राम, दासी, बकरी तथा भेंड़ इत्यादि भी दान में देना चाहिए ॥२५॥ यज्ञ के अवभृथ स्नान करने पर एक हजार ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए । स्वायम्भुव मनु ने बतलाया है कि यजमान को अपना सर्वस्व दान में दे देना चाहिए ॥२६॥ त्रिसामाध्वर्युओं को तथा

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know