Srishti Khanda Extracted Page 450
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-450
Sanskrit Original
नापराध्याम रामस्य कर्मणा मनसा गिरा । स्पृष्टौ चरणौ देवि मम नान्या गति भवेत् ॥१७७॥ ततः सीता ब्रवीद्रामं त्यक्तः किमनुजस्त्वया । वैषम्यं त्यज्यतां बाले लक्ष्मणे लक्ष्मिवर्धने ॥१७८॥ राघवस्त्वब्रवीत्सीतां नाहं त्यक्ष्यामि लक्ष्मणम्। परस्परं न पश्यंति स्वात्मनश्च हितं वचः ॥१७९॥ श्रुतपूर्व च सुश्रोणिक्षेत्रस्यास्य विचेष्टितम्। अत्र क्षेत्रे जनास्सत्यं सर्वे हिस्वार्थतत्पराः ॥१८०॥ परस्परं न पश्यंति स्वात्मनश्च हितं वच: । न शृण्वांति पितुः पुत्राः पुत्राणां पितरस्तथा ॥१८ १॥ न शिष्या हि गुरोर्वाक्यं शिष्यस्यापि तथा गुरुः । अर्थानुबंधिनी प्रीतिर्न कश्चित्कस्यचित्प्रियः ॥१८ २॥ इत्येवं कथयन्नेव प्राप्तो रेवां महानदीम्। चक्रेभिषेकं काकुस्थः सानुजः सह सीतया ॥९८३॥ तर्पयित्वा च सलिलैः स्वान्पितृन्दैवतान्यपि । उद्वीक्ष्य च मुहुःसूर्य देवताश्च समाहितः ॥१८४॥ कृताभिषेकस्तु रराज रामः सौीताद्वितीयः सह लक्ष्मणेन । कृताभिषेकः सह शैलपुत्र्या गुहेन सार्धं भगवानिवेशः ॥१८५॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे मार्कडेयाश्रमदर्शनं नाम त्रयस्रिंशो$ध्याय: ॥३३॥ —— ie जाऊंगा । अपने दोनों हाथों से मुख को ढँककर गद्रद कण्ठ से लक्ष्मणजी ने इन सारी बातों को कहा ॥१७६॥ हे देवि ! में आपके दोनों चरणों को छूकर कहता हूँ कि श्रीराम से भिन्न मेरा कोई भी दूसरा आश्रय नहीं हैं । में तो मन, वाणी तथा कर्म किसी भी प्रकार से श्रीराम का अपराध करना नही चाहता हूँ ॥१७७॥ उसके बाद श्रीसीताजी ने श्रीराम से कहा-- लक्ष्मण लक्ष्मी का संवर्धन करने वाले हैं, बालकों पर क्रोध- नहीं करना चाहिए । आप अपने इस अनुज का क्यों त्याग करते हें ॥१७८॥। श्रीरामचन्द्रजी ने सीताजी से कहा-- में लक्ष्मण का त्याग नहीं कर रहा हूँ । हे प्रिये ! स्वप्न में भी मुझे श्रीलक्ष्मण का परित्याग अभिमत नहीं है ॥१७९॥ हे सुन्दरि ! इस क्षेत्र के विषय में मै पहले से ही सुन चुका हूँ । यहाँ सब लोग सत्य का परित्याग करके अर्थ परायण हो चुके हैं ॥१८०॥ वे परस्पर में भी आत्मकल्याण की बातों को नहीं सुनते हैं । यहाँ न तो पिता की बातों को पुत्र सुनते हें और न पुत्र की वातों को पिता सुनता है ॥१८१॥। न शिष्य गुरु की बातों को सुनता है और न गुरु शिष्य की बातों को सुनते हें । सबों के प्रेम का सम्बन्ध अर्थ से है । स्वाभाविक प्रेम किसी का नहीं है । कोई भी किसी का प्रिय नहीं है ॥१८२॥ इसतरह से बातें करते हुए भगवान् श्रीराम रेवा (नर्मदा) नदी पर आ गये । वहाँ पर उन्होंने अपनी पत्नी और अनुज के साथ स्नान किया ॥१८३॥ फिर उन्होंने देवताओं और पितरों का तर्पण किया, उसके बाद थोड़ी देर तक उन्होंने सूर्य और देवताओं का दर्शन किया ॥१८४॥ इसके बाद सीताजी तथा लक्ष्मणजी के साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी तरह सुशोभित हुए जिस तरह पार्वतीजी एवं कार्तिकेय के साथ शङ्करजी सुशोभित होते हैं ॥१८५॥ इसतरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के मार्कण्डेयाश्रम दर्शन नामक तैतीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।३३।। Oe
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