Srishti Khanda Extracted Page 449

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-449

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Sanskrit Original

डरेड श्रीपद्यमहापुराण यस्य प्रणम्य चरणौ वरदस्य भक्त्या स्तुत्वा च वाग्भिरमलाभिरतंद्रितात्मा । दीप्तस्तमांसिनुदते स्वकरैर्विवस्वां स्तं शङ्करं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥१६५॥ ये त्वां सुरोत्तमगुरु पुरुषाविमूढा जानंति नास्य जगतः सचराचरस्य । ऐश्वर्यमाननिगमानुशयेन पश्चा त्तेयातनानुभवंत्यविशुद्धचित्ताः ॥१६६॥ तस्यैवं स्तुवतोऽ वोचच्छूलपाणिर्वृषध्वजः। उवाच वचनं हृष्टो राघवं तुष्टमानसः ॥१६७॥ रुद्र उवाच राम हष्टोस्मि भद्रं ते जातस्त्वं निर्मले कुले। त्वं चापि जगतां वंद्यो देवो मानुषरूपधृत् ॥१६८॥ त्वया नाथेन वै देवाः सुखिनः शाश्वतीः समाः । सेविष्यंते चिरं कालं गते वर्षे चतुर्दशे ॥१६९॥ अयोध्यामागतं त्वां ये द्रक्ष्यन्ति भुवि मानवाः । सुखं तेऽत्र भजिष्यंति स्वर्गे वासन्तथाक्षयम् ॥१७०॥ देवकार्य महत्कृत्वा आगच्छेथाः पुनः पुरीम्। राघवस्तु तथादेवं नत्वा शीघ्रं विनिर्गतः ॥१७९॥ इंद्रमार्गा नदीं प्राप्य जटाजूटं नियम्य च । अब्रवील्लक्ष्मणं राम इदमर्पय मे धनुः ॥१७२॥ रामवाक्य तु तच्छुत्वा सीतां वै लक्ष्मणोब्रवीत्। किमर्थं देवि रामेण त्यक्तोऽहं कारणं विना ॥१७३॥ अपराधं न जानामि कुपितोयन्महाभुजः । रामेणाहं परित्यक्तः प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम् ॥१७४॥ नैव मेजीवितेनार्थो धिग्धिङ्मां कुलपांसनम् । आर्यस्य येन वै मन्युर्जनितः पापकारिणा ॥१७५॥ कांस्तुलोकान्गमिष्यामि अपध्यातो महात्मना। उभौ हस्तौ मुखे कृत्वा साश्रुकंठो व्रवीदिदम्॥१७६॥ में शरणागति करता हूँ ॥१६३॥ अपने वायें हस्त कमल के नख से जिन भगवान् शङ्कर ने विकसित कमल के समान देदीप्यमान ब्रह्माजी के पाँचवें शिर को देवताओं के सामने ही काट दिया उन शरणागत रक्षक शङ्करजी की में शरणगति करता हूँ ॥१६४॥ जिन भगवान् शङ्कर के चरणों की भक्तिपूर्वक स्तुति करके सतत सावधान भगवान् सूर्य सदा अन्धकार को विनष्ट किया करते हैं, उन शरणागत रक्षक भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१६५॥ जो अज्ञानी पुरुष अपने ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा तथा वेदज्ञान के अभिमान के कारण आपको इस चराचरात्मक जगत् के गुरु (कारण) नहीं मानते हैं, वे मलिन अन्तःकरण वाले जीव यमयातना को भोगते हैं ॥१६६॥ जिस समय भगवान् इस तरह से स्तुति कर रहे थे उसी समय शङ्करजी प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी से कहे ॥१६७॥। रूद्र ने कहा-- हे राम! में प्रसन्न हूँ, आप निर्मल वंश में उत्पन्न हुए हें आप मनुष्य का रूप धारण किए हुए हैं, किन्तु आप संसारी जीवों के लिए वन्दनीय (परमात्म तत्त्व) हैं ॥१६८॥ आप संसार के स्वामी है आपकी ही कृपा से सभी सदा सुखी रहा करते हैं । चौदहवें वर्ष के बीत जाने पर वे सभी देवता आपकी सेवा करेंगे ॥१६९॥ आपके अयोध्या लौट जाने पर पृथिवी के जो लोग आपका दर्शन करेंगे वे इस लोक में सुखी रहेंगे, और अन्त में वे अक्षय लोकों को प्राप्त करेंगे ॥१७०॥ आप देवताओं के महान् कार्य को करके अपनी नगरी में आयेंगे । इसके बाद भगवान् श्रीराम शङ्करजी को नमस्कार करके वहाँ से निकल गये ॥१७१॥ इन्दरमार्गा नदी के पार आकर उन्होंने अपने जटा-जूट को बाँधा, इसके वाद उन्होंने लक्ष्मणजी से कहा कि तुम मेरा धनुष दे दो ॥१७२॥ श्रीराम की बातों को सुनकर लक्ष्मणजी ने सीताजी से कहा हे देवि ! क्या कारण है कि श्रीराम ने बिना किसी कारण के मेरा त्याग कर दिया है 2॥१७३॥ में अपने उस अपराध को नहीं जानता हूँ, जिसके कारण श्रीराम कुपित हुए हैं । यदि श्रीराम ने मेरा त्याग कर दिया तो में अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगा ॥१७४॥ मुझे अपने जीवन से कोई लाभ नहीं है, मुझको धिक्कार हे । मैं पापी हूँ, इसीलिए आर्य मुझसे नाराज हुए हैं ॥१७५॥ महात्मा श्रीराम के क्रोध का पात्र होकर में न जाने किस लोक में

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