Srishti Khanda Extracted Page 448

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-448

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Sanskrit Original

एन: कृतोपि विषयेष्वपि सक्तचित्ता ज्ञानान्वयश्रुतगुणैरपि नैव युक्ताः । ये संश्रिता: सुखभुज: पुरुषा भवंति तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१५७॥ अत्रिप्रसूतिरविकोटिसमानतेजाः सत्रासनं विबुधदानवसत्तमानाम् । यः कालकूटमपि बत प्रसभंसुदीप्तं तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१५८॥ ब्रहद्ररुद्रमरुतां च सषण्मुखानां दद्याद्वरं सुबहुशो भगवान्महेशः । नन्दिच मृत्युवदनात्पुनरुज्जहार तं शङ्कर शरणदं शरणं व्रजामि ॥१५९॥ आराधितः सुतपसा हिमवन्निकुजे धूमब्रतेन मनसापि परैरगम्ये । संजीवनीमक थयद्भृगवे महात्मा तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१६०॥ नानाविधैर्गजबिडालसमानवक्त्रै ् दक्षाध्वरप्रमथनै ् बलिभिर्गणोन्द्रैः । योग्यर्चितोऽ मरगणैश्च सलोकपालै स्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१६९॥ शंखेंदुकुंदघवलं वृषभं प्रवीर मारुह्य यः क्षितिधरेद्रसुतानुयातः । यात्यंबरं प्रलयमेघविभूषितं च तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१६२॥ शांतं मुनिं यमनियोगपरायणैस्तै भीमैर्महोग्रपुरुषैः प्रतिनीयमानम् । भक्तया न तं स्तुतिपरं प्रसभं ररक्ष तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१६३॥ यः सव्यपाणि कमलाग्रनखेन देव स्तत्पंचमं प्रसभमेव पुरस्सुराणाम् । ब्राह्मं शिरस्तरुणपद्यनिभं चकर्त्त तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१६४॥ फोड़ दिया तथा पृषा देवता के दाँतों को तोड़ कर नीचे गिरा दिया, हाथ में वज्र धारण करने वाले इन्द्र को जिन्होंने स्तम्मित कर दिया, उन शरण प्रदान करने वाले भगवान् शङ्कर की मैं शरणागति करता हूँ ॥१५६॥ पाप करते रहने वाले, विषयासक्त, अज्ञानी तथा उत्तम कुल से रहित भी जीव जिन भगवान् शङ्कर के शरण में जाकर सुखी हो जाते हैं, उन शरण प्रदान करने वाले भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१५७॥ जिनका तेज करोड़ों चन्द्रमा और सूर्य के समान है जिन्होंने देवताओं तथा दानवों के हृदय को भयभीत बना देने वाले, अत्यन्त वेगवान् कालकूट हलाहल विष का पान कर लिया । उन शरण प्रदान करने वाले शङ्करजी को में प्रणाम करता हूँ ॥१५८॥ जिन भगवान् शङ्कर ने ब्रह्मा इन्द्र, रुद्र, मरुद्गण तथा कार्तिकेय, इत्यादि देवताओं को अनेक बार वरदान प्रदान किया तथा नन्दी को जिन्होंने मृत्यु के मुख से वचा लिया, उन शरणागत रक्षक भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१५९॥ महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य ने हिमालय पर्वत के वन में जिनकी आराधना अत्यन्त कठोर धूमब्रत ऊ द्वारा की थी, और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान करने वाले शरणागत रक्षक भगवान् शङ्करजी की मैं शरणागति करता हूँ ॥१६०॥ अनेक प्रकार के हाथी तथा विडाल जैसे मुख वाले, तथा दक्ष के यज्ञ को विध्वस्त करने वाले महाबलवान् गणों द्वारा जिनकी पूजा की जाती रहती है तथा देवताओं का समूह एवं लोकपाल जिनकी प्रार्थना करते हैं, उन शरण प्रदान करने वाले भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१६१॥ जो भगवान् शङ्कर शङ्क, चन्द्रमा तथा कुन्द के समान श्वेत शरीर वाले महाबलवान् नन्दी बैल पर चढकर पार्वतीजी के साथ प्रालयकालीन मेघ से विभूषित आकाश मार्ग में विचरण करते हैं, उन शरणागत रक्षक भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१६२॥ यमराज की आज्ञा से भयङ्कर यमदूतों द्वारा ले जाये जाते हुए भयभीत शान्त, भक्ति प्रवण स्तुति करते हुए महर्षि मार्कण्डेय की रक्षा जिन्होंने बलपूर्वक कर ली; उन शरणागत रक्षक भगवान् शङ्कर की

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