Srishti Khanda Extracted Page 447
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-447
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण प्रसादः क्रियतां मह्यं नय मामपि राघव । इदानीमर्थमार्गे त्वं कथं स्थास्यसि शत्रुहन् ॥१४५॥ लक्ष्मणस्त्वब्रवीद्रामं ना हं गंता वने पुनः । लक्ष्मणं संस्थितं ज्ञात्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥१४६॥ मानुब्रज सौमित्र एको यास्यामि काननम्। द्वितीया मे त्वियं सीता रामेणोक्तस्तु लक्ष्मणः ॥९४७॥ गृहीत्वाऽथ समुत्तस्थौ रामवाक्यं सलक्ष्मणः । मर्यादापर्वतं प्राप्तौ क्षेत्रसीमां परंतपौ ॥१४८॥ | अजगंधं च देवेशं देवदेवं पिनाकिनम् । अष्टांगप्रणिपातेन नत्वा रामस्त्रिलोचनम् ॥१४९॥ । तुष्टव प्रयतः स्थित्वा शङ्करं पार्वतीप्रियम् । कृतांजलिपुटो भूत्वा रोमांचित शरीरकः ॥१५०॥ सात्विकं भावमापन्नो विनिर्धूतरजस्तमाः । लोकानां कारणं देवं बुबुधे विबुधाधिपम् ॥१५१॥ राम उवाच कृत्स्नस्य योस्य जगतः सचराचरस्य। कर्ता कृतस्य च पुनः सुखदुःखदश्च ॥ संहारहेतुरपि यः पुनरंतकाले तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१५२॥ योऽयं सकृद्विमलचारुविलोलतोयां गङ्गां महोर्मिविषमां गगनात्पतन्तीम् ।ˆ मूर्ध्ना दधै स्त्रजमिव प्रविलोलपुष्पां तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥९५३॥ कैलासशैलशिखरं परिकम्प्यमानं कैलासश्रंगसदृशेन दशाननेन । यत्पादपद्मविधृतं स्थिरतां दधार तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥९५४॥ येनासकृद्दनुसुताः समरे निरस्ता विद्याधरोरगगणाश्च वरैः समग्रैः । संयोजिता मुनिवराः फलमूलभक्षा स्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥१ ५५॥ दक्षाध्वरे च नयने च तथा भगस्य पूष्णस्तथादशनपक्तिमपातयच्च । तस्तंभ यः कुलिशयुक्तमथेद्रहस्तं तं शङ्करं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥९५६॥ नहीं रह सकता हूँ। आपकी जो गति होगी वहीगति मेरी भी होगी ॥१४४॥ हे राघव ! कृपा कीजिये; मुझे भो अपने साथ ले चलिये । हे शत्रुघ्न ! इस समय बीच रास्ते में कैसें रहोगे ?॥१४५॥ लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा में नहीं जाने वाला हूँ। लक्ष्मण को बैठे हुए देखकर राम ने कहा ॥१४६॥ लक्ष्मण तुम मेरे साथ चलो यह सीता भी मेरे साथ चलेगी । श्रीरामजी की बातों को सुनकर लक्ष्मणजी उठकर खड़े हो गये । इसके बाद वे दोनों पुष्कर क्षेत्र की सीमा मर्यादा पर्वत पर पहुँचे ॥१४७-१४८॥ इसके बाद वे देवाराध्य पिनाकधारी भगवान् अजगंन्ध शिव को साष्टाङ्ग प्रणाम किये ॥ १४९॥ उसके वाद उन्होंने रोमाञ्चित होकर तथा हाथ जोड़कर पार्वती पति शिवजी की स्तुति की।१५०॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजी ने रजोगुण एवं तमोगुण से रहित सात्त्विक भावना से भरकर देवाधिदेव, शङ्करजी को सम्पूर्ण जगत् का कारण समझकर उनकी स्तुति की ॥१५१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- जो इस सम्पूर्ण चरचर जगत् की सृष्टि करते हैं, जो सृष्ट जगत् को सुख-दुःख रूप कर्मफलों को प्रदान करते हैं, और प्रलय काल की बेला आ जाने पर जो जगत् का संहार करते हैं, शरण प्रदान करने वाले उन शङ्करजी की में शरणागति करता हूँ ॥१५२॥ जिन्होंने एक बार स्वच्छ मनोहर तथा चञ्चल जलतरङ्ग से युक्त तथा ऊँची लहरियों से बिषम बनी हुयी तथा आकाश से गिरने वाली गङ्गाजी को अत्यन्त चञ्चल पुष्यो से निर्मित माला के समान अपने शिर पर धारण किया, उन शरण प्रदान करने वाले शङ्करजी की मैं शरणागति करता हूँ ॥१५३॥ कैलास पर्वत के शिखर के समान आकार वाले रावण के द्वारा कैलास पर्वत के कँपाये जाते हुए पर्वत शिखर जिनके चरण कमल के रख दिए जाने के कारण स्थिर हो गये, उन शरणागत रक्षक भगवान् शङ्कर की में शरणागति करता हूँ ॥१५४॥ जिन्होंने अनेक बार दैत्यों को परास्त कर दिया तथा विद्याधर उरगगण तथा श्रेष्ठमुनियों को समस्त वरों को प्रदान करे उत्तम बना दिया उन शरणागत रक्षक शङ्करजी की में शरणागति करता हूँ ॥१५५॥ जिन्होने दक्ष के यज्ञ में भग देवता की आँखों को * अन्य संस्करण में आये हुए श्लोक : यं योगिनो विगतमोहरजस्तमस्का भव्त्यैकतानमनसो विनिवृत्तकामाः। ध्यायन्ति निश्चलधियोऽमितदिव्यभावं तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि।। यश्चेन्दुखण्डममलं विलसन्मयूखं बद्ध्वा सदा प्रियतमां शिरसा बिभर्ति। यश्चार्धदेहमददाङ्गिरिराजपुत्र्यै तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि।। ___ वचि
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