Srishti Khanda Extracted Page 446
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-446
Sanskrit Original
मृतश्च ते पिता रामत्यक्त्वा राज्यमकंटकम् । विनिक्षिप्य वने त्वां च कैकेय्याः प्रियकाम्यया॥१२९॥ इह स्थिता सा कैकेयी धनं सर्वे च बांधवाः । महाराजो दशरथ एक एव गतो गतिम् ॥९३०॥ मन्येऽ हं न त्वया सार्थ सीता यास्यति वै ध्रुवम् । करिष्यसे किमनया वद राघव सांप्रतम् ॥१३९॥ श्रुत्वा चाश्रुतपूर्व हि वाक्यं लक्ष्मणभाषितम्। विमना राघवस्तस्थौ सीता चापि वरानना ॥१३२॥ यदुक्तं लक्ष्मणेनाथ सीता सर्व चकार ह। स्नात्वा भुक्त्वा ततो वीरौ पुष्करे पुष्करेक्षणौ॥१३३॥ नीत्वा विभावरी तत्र गमनाय मनो दधुः । एह्युत्तिष्ठ च सौमित्रे व्रजामो दक्षिणां दिशम्॥९३४॥ सौमित्रिरब्रवीद्रामं नाहं यास्ये कथंचन । ब्रजत्वमनया सार्धं भार्यया कमलेक्षण ॥१३५॥ नान्यद्नं गमिष्यामि नैवायोध्यां च राघव । अस्मिन्वने वसिष्यामि वर्षाणीह चतुर्दश ॥१३६॥ मया विना त्वयोध्यायां यदि त्वं न गमिष्यसि। अनेन वर्त्मना भूप आगंतव्यं त्वया विभो ॥१३७॥ यदि जीवामि तत्कालं पुनर्यास्ये पितुः पुरम् । तपस्संभावयिष्यामि मया त्वं कि करिष्यसि ॥१३८॥ ब्रज सौम्य शिवः पंथा मा च ते परिपंथिनः। पश्यामि त्वां पुनः प्राप्तं सभार्यं कमलेक्षणम् ॥१३९॥ पितृपैतामहं राज्यमयोध्यायां नराधिप। शत्रुध्नभरतौ चोभौ त्वदाज्ञाकरणे स्थितौ ॥१४०॥ अहं ते प्रतिकूलस्तु वनवासे विशेषतः । अनारतं दिवा चाहं रात्रौ चैव परंतप॥१४९॥ कर्म कर्तु न शक्रोमि व्रज सौम्य यथासुखम्। एवं ब्रुवाणं सौमित्रिमुवाच रघुनंदनः ॥१४२॥ कथं पूर्वमयोध्याया निर्गतोसि मया सह । वने वत्स्याम्यहं राम नववर्षाणि पंच च ॥१४३॥ न तु त्वया विरहितः स्वर्गेपि निवसे क्वचित् । या गतिस्ते नरव्याघ् मम सापि भविष्यति॥१४४॥ ऐसा कहीं नहीं दिखता है, पत्नी, पुत्र, धन कुछ भी नहीं जाता है, यह मनीषियों ने कहा है ॥१२८॥ पिताजी कैकेयी को प्रसन्न करने के लिए, आपको वन में भेजकर, अकण्टक राज्य छोड़कर चले गये ॥१२९॥ कैकेयी, धन और सभी बान्धव यहीं रह गये, अकेले महाराज ही मरकर चले गये ॥१३०॥ मैं यह भी मानता हुँ कि आपके साथ सीताजी भी नहीं जायेंगी । आप इनको अपनाकर क्या करेंगे ? बतलइये ॥ १३ १॥ श्रीलक्ष्मणजी की इस अश्रुतपूर्व वाणी को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी तथा सीताजी दोनों उदास हो गये और चुपचाप पड़े रहे ॥१३२॥ उसके बाद श्रीलक्ष्मणजी ने जो कुछ कहा-- उसे सीताजी ने किया । उसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण दोनों पुष्कर में स्नान करक भोजन किए ॥१३३॥ रात्रि बीत जाने के बाद वे जाने का मन बनाये । श्रीरामजी ने कहा लक्ष्मण आओ, उठो अब दक्षिण दिशा में चलें ॥१३४॥ श्रीलक्ष्मणजी ने कहा-- राम मैं नहीं जा सकता हूँ, हे कमलनयन ! आप अपनी पत्नी के साथ यहाँ से जायँ ॥१३५॥ हे राघव ! न में किसी दूसरे बन में जाऊंगा और न तो मैं अयोध्या जाऊंगा। मैं इसी वन में चौदह वर्षों तक निवास करूंगा ॥१३६॥ यदि आप मेरे बिना अयोध्या नहीं जा सकते हैं तो फिर आप इसी मार्ग से आइयेगा ॥१३७॥ यदि में जीवित रहुँगा तो अपने पिताजी के नगर में जाऊंगा । मैं यहाँ तपस्या करूंगा, आप मुझको अपने साथ रखकर क्या करेंगे ॥१३८॥ हे सौम्य ! आप जायं, आप का मार्ग मङ्गलमय हो, आपका कोई विरोधी नहीं रहे । अब मैं आपके लौटने पर ही आपका दर्शन करूंगा ॥१३९॥ हे नराधिप ! आपकी आज्ञा से पिता पितामह से प्राप्त राज्य शत्रुघ्न और भरत कर रहे हैं ॥१४०॥ खासकर वनवास के विषय में मै आपके प्रतिकूल रहने वाला हूँ । मैं रात-दिन निरन्तर आपकी सेवा नहीं कर सकता हूँ । इस तरह से कहने वाले लक्ष्मणजी से श्रीरामचन्द्रजी ने कहा ॥१४१-१४२॥ तो तुम पहले ही हे राम ! मैं आपके साथ चौदह वर्षां तक वन में निवास करूंगा, यह कहकर क्यों आये ?।।१४३॥ तुमने कहा था-- हे नरव्याघ्र ! आपके बिना में स्वर्ग में भी
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