Srishti Khanda Extracted Page 445

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-445

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Sanskrit Original

शुश्राव च ततो वाचं देवदूतेन भाषितम्। भो भो राघव भत्रं ते तीर्थमेतत्सुदुर्लभम् ॥११४॥ अस्मिन् स्थाने स्थितो वीर आत्मनः पुण्यता कुरु । देवकार्य त्वया कार्य हंतव्या देवशत्रवः ॥१९५॥ ततो हृष्टमना वीरो हयब्रवील्लक्ष्मणं वचः । सौमित्रेऽ नुगृहीतोहं देवदेवेन ब्रह्मणा ॥११६॥ अत्राश्रमपदं कृत्वा मासमेकं च लक्ष्मण । व्रतं चारितुमिच्छामि कायशोधनमुत्तमम् ॥९९७॥ तथेति लक्ष्मणेनोक्ते व्रतं परिसमाप्य तु । पिंडदानादिभिदनिः श्रान्दैश्वेव पितामहान्॥११८॥ पुष्करे तु तदा रामोऽतर्पयद्विधिवत्तदा । कनका सुप्रभा चैव नंदा प्राची सरस्वती ॥११९॥ पंचस्त्रोताः पुष्करेषु पितृणां तुष्टिदायिनी । दैनंदिनी पितृणां तु पूजां तां पित्पूर्विकाम्॥१२०॥ रचयित्वा तदा रामो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । एहि लक्ष्मणशीघ्रं त्वं पुष्कराज्जलमानय ॥१२९॥ पादप्रक्षालनं कृत्वा शयनं कुरु संस्तरे । विभावर्यां निवृत्तायां यास्यामो दक्षिणां दिशम्॥१२२॥ लक्ष्मणस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतयानीयतां पयः। नाहं राम सर्वकाले दासभावं करोमि ते ॥१२३॥ इयं पुष्टा च सुभृशं पीवरी च ममाप्युत। किं त्वं करिष्यस्यनया भार्यया वद सांप्रतम् ॥१२४॥ किं वा मृतस्य वै पृष्ठ इयं यास्यति ते प्रिया । रक्षसे त्वं सदा कालं सुपुष्टां चैव सर्वदा ॥१२५॥ हृष्टा चैषा क्लेशयति सततं मां रघूत्तम । त्वं च क्लेशयसे राम परत्र जायते क्षतिः ॥१२६॥ त्वत्कृते च सदाचाहं पिपासां क्षुधया सह । संसहामि न संदेहः परत्र च निशामय ॥१२७॥ मृतानां पृष्ठतः कश्चिद्वतो नैव च दृश्यते। भार्य्या पुत्रो धनं चापि एवमाहुर्मनीषिणः ॥१२८॥ इन तीनों ने उस दिन रात्रि में वहीं निवास किया । सूर्योदय हो जाने पर उन लोगों ने वहाँ से जाने का मन बनाया॥ ११२॥ वहाँ से वे कोशभर पूर्व ज्येष्ठ पुष्कर में गये और ज्येष्ठ पुष्कर में ठहर गये ॥११३॥ उसी समय श्रीरामजी ने देवदूत की वाणी को सुना-- हे राम जी ! यह अत्यन्त दुर्लभ तीर्थ है ॥११४॥। हे वीर यहाँ पर रहकर आप अपने को पवित्र बनायें । आपको देवताओं का कार्य करना है; तथा देवताओं के शत्रुओं का वध करना है।। ११५।। उसके बाद प्रसन्न होकर श्रीरामजी ने प्रसन्न होकर लक्ष्मणजी से कहा-- हे लक्ष्मण ! देवाराध्य ब्रह्माजी ने मेरे ऊपर कृपा की है ॥११६॥ मैं यहीं पर आश्रम बनाकर एक मास तक शरीर शोधन पूर्वक उत्तम ब्रत करना चाहता हूँ ॥११७॥ लक्ष्मणजी ने कहा ठीक है, इसके बाद ब्रत पूरा करके श्रीरामजी ने पिण्डदान तथा सरस्वती दोनों के द्वारा अपने पितरों को तृप्त किया ॥११८॥ उस समय पुष्कर में रहकर श्रीरामजी ने कनका, सुप्रभा, नन्दा, प्राची तथा तर्पण तीर्थो में जाकर विधिपूर्वक तर्पण किया ॥११९॥ पुष्कर में उपर्युक्त पाँचों स्रोत पितरों को अत्यन्त तृप्त करने वाले हैं । पिता पूर्वक पितरों की प्रतिदिन की पूजा करके श्रीराम ने श्रीलक्ष्मणजी से कहा हे लक्ष्मण ! तुम शीत्र ही पुष्कर का जल लाओ ॥१२०॥ और पैर घोकर जल्दी से चटाई पर सो जाओ । रात्रि बीत जाने पर प्रात:काल हमलोग यहाँ से दक्षिण दिशा में चलेंगे । उस समय लक्ष्मणजी ने कहा-- कि जल लाने का काम सीताजी करें, हे राम ! सदैव में आपका दास नहीं बना रहुँगा ॥१२३॥ ये हमेशा पुष्ट और मोटी बनी रहती हैं, बतलाइये आप ऐसी पत्नी को रखकर क्या करेंगे 2॥१२४॥ क्या आपके मरने पर ये आपके पीछे-पीछे जायेंगी ? कि आप सदा इनकी रक्षा करने में ही लगे रहते हैं ॥१२४-१२५॥ हे रघूत्तम ! ये प्रसन्न रहकर हमेशा मुझे क्लेश देती रहती हैं हे राम आप भी हमेशा हमें दुःख देते रहते हैं; किन्तु मेरी तो क्षति होती रहती है ॥१२६॥ आप सुन लें आपके लिए तो मैं परलोक में भी कष्ट उठाऊंगा और यहाँ भी भूख-प्यास बर्दास्त करता हूँ ॥१२७॥। मरने वालों के पीछे कोई जाये

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