Srishti Khanda Extracted Page 444

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-444

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Sanskrit Original

पितरस्तु मया दृष्टा ब्राह्मणांगेषु राघव । दृष्ट्वा त्रपान्विता चाहमपक्रांता तवांतिकातू॥९९॥ त्वया वै भोजिता विप्रा: कृतं श्राद्धं यथाविधि । वल्कलाजिनसंवीता कथं राज्ञः पुरः सरा ॥१००॥ भवामि रिपुवीरघ्न सत्यमेतदुदाहृतम् । कौशेयानि च वस्त्राणि कैकेय्यापहृतानि च ॥१०१॥ । ततः प्रभृतिचैवाहं चीरिणी तु वनाश्रयम्। ज्ञात्वाहं न वदे किंचिन्मा ते दुःखं भवत्विति।१०२॥ बाहं स्मरामि वै मातुर्नपितुश्च परंतप। कदाभविष्यतीहांतो वनवासस्य राघव ॥१०३॥ एतदेवानिशं रामचिंतयंत्याः पुनः पुनः । व्रजंति दिवसा नाथ तवपदभ्यां शपाम्यहम् ॥१०४॥ स्वहस्तेन कथं राज्ञो दास्ये वै भोजनं त्विदम्। दासानामपि यद् दासो नोपभूंजीत यत् क्वचित् ॥१० ५॥ एतादृशी कथं त्वस्मै संप्रदातुं समुत्सहे। याहं राज्ञा पुरा दृष्टा सर्वालङ्कार भूषिता ॥१०६॥ वालव्यजनहस्ता च वीजयंती नराधिपम् । सा स्वेदमलदिगूधांगी कथं पश्यामि भूमिपम् ॥१०७॥ व्यक्तं त्रिविष्टपं प्राप्तस्त्वया पुत्रेण तारितः । दृष्ट्वा मां दुःखितां बालां वनेक्लिष्टामनागसम्॥१०८॥ शोकः स्यात्पार्थिवस्यास्य तेन नष्टास्मि रावव । भवान् प्राणसमो राम न ते गोप्यं भवत्विह ॥१०९॥ | सत्येन तेन चैवाथ स्पृशामि चरणौ तव। तच्छुत्वा राघवः प्रीतः प्रियां तां प्रियवादिनीम्॥१९०॥ अंकमानीयसुदूढं परिष्वज्य च सादरम्। भुक्तौ भोज्यं तदा वीरौ पश्चाद्भुक्ता च जानकी॥१९९॥ एवं स्थितौ तदा सा च तां रात्रिं तत्र राघवौ। उदिते च सहस्रांशौ गमनाय मनो दधुः ॥११२॥ प्रत्यङ्मुखं गतः क्रोशं ज्येष्ठं यावच्च पुष्करम् । पूर्वभागे पुष्करस्य यावत्तिष्ठति राघव: ॥१९३॥ सभी आभरणों से भूषित थे, तथा उनके ही समान दो पुरुष और आये । हे रघुनंदन ! वे तीनों ब्राह्मणों के देह से संयुक्त हो गये ॥९८॥ उन ब्राह्मणों के अङ्गों में ही मैंने पितरों का दर्शन किया उनको देखकर में लज्जित हो गयी और आपके पास से दूर चली गयी ॥९९॥ आपने अकेले ब्राह्मणों को भोजन कराया और विधिवत् श्राद्ध किया वल्कल एवं अजिन धारण की हुयी में महाराज के सामने कैसे जाती ?।।१००॥ हे शत्रुओं को मारने वाले वीर मैंने सभी बातें सच्ची-सच्ची बता दिया । कैकेयी ने तो मेरे रेशमी वस्त्रों को ले लिया था ॥१०१॥ उसी समय से में वन में रहती हूँ तथा चीर वस्त्रों को धारण करती हूँ । में किसी बात को जानकर आपको बतलाये बिना कैसे रह सकती हूँ ? अतएव आपको कष्ट नहीं होना चाहिए ॥१०२॥ हे परन्तप न तो मैं अपनी माँ का स्मरण करती हूँ और न पिताजी को याद करती हूँ । में सदा यही सोचती हूँ कि वनवास का समय कब समाप्त होयेगा ॥१०३॥ हे श्रीराम ! इसी बात का बार-बार चिन्तन करते हुए मैं आपके चरणों की शपथ खाकर कहती हूँ कि मेरे दिन बीत जाते हैं। १ ०४॥ जिसको दासों के दास भी कभी नही खाते हैं, उस भोजन को मैं अपने हाथों से कैसे दे सकती थी॥१०५॥ महाराज ने तो मुझे सभी अलङ्कारां से अलंकृत देखा था, वहीं मैं इस अवस्था में कैसे भोजन दे सकती हूँ ॥१०६॥ जो में अपने हाथ से चामर लेकर महाराज को भोजन कराती थी वही स्वेदजन्य मैल से भरे हुए अङ्गो वाली होकर में महाराज का दर्शन कैसे कर सकती हूँ ?।।१०७।। आप जैसे पुत्र को प्राप्त करके महाराज स्वर्ग में | चले गये, निर्दोष दुःखिनी तथा वन में दु:ख प्राप्त मुझको देखकर महाराज को कष्ट होता, हे राघव ! इसीलिए मैं दूर | चली गयी, हे राम ! आप तो मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, आपके लिए मेरे पास कुछ भी गोप्य नहीं है।१०८-१०९॥ । उसी सत्य के कारण आपके चरणों को मैं स्पर्श करती हूँ (प्रणाम करती हूँ) प्रियतमा तथा प्रिय बोलने वाली | श्रीजानकीजी की बातों को सुनकर श्रीराम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया । इसके बाद श्रीराम लक्ष्मण ने भोजन शि और श्रीजानकीजी ने उन दोनों के बाद भोजन किया ॥११०-१११॥ इस तरह श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी

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