Srishti Khanda Extracted Page 443
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-443
Sanskrit Original
लक्ष्मणं चाब्रवीद्रामो मेध्यमाहर मे मृगम् । शुद्धेक्षणं च शशकं कृष्णशाकं तथा मधु ॥८३॥ जंबीराणि च मुख्यानि मूलानि विविधानि च। पक्वानि च कपित्थानि फलान्यन्यानि यानि च ॥८४॥ तान्याहरस्व वै श्राद्धे क्षिप्रमेवास्तु लक्ष्मण । तथातत्कृतवान् सर्व रामादेशाच्च राघवः ॥८५॥ बदरेङ्गुदिशाकानि मूलानि विविधानि च । तत्राहृत्य च रामेण कूटाकारः कृतो महान्॥८६॥ परिपक्वं च जानक्या सिद्धं रामे निवेदितम् । स्नात्वा रामो योगवाप्यां मुनीस्ताननुपालयन् ॥८ ७॥ मध्याह्वाच्चलिते सूर्ये काले कुतपके तथा । आयाता ऋषयः सर्वे ये रामेणानुमंत्रिताः ॥८८॥ तानागतान् मुनीन् दृष्ट्वा वैदेहीजनकात्मजा । रामांतिकं परित्यज्य व्रीडिताऽन्यत्र संस्थिता ॥८९॥ विस्मयोत्फुल्लनयना चिंतयाना च वेपती । ब्राह्मणानेह जानंति श्राद्धकाले ह्युपस्थिताः ॥९०॥ रामेण भोजिता विप्राः स्मृत्युक्तेन यथाविधि । वैदिक्यश्च कृतास्सर्वाः सत्क्रिया यास्समीरिताः ॥९ ९॥ पुराणोक्तो विधिश्चैव वैश्वदेविक पूर्वकः । भुक्तवत्सु चविप्रेषु दत्वा पिंडान्यथाक्रमम् ॥९२॥ प्रेषितेषु यथाशक्ति दत्वा तेषु च दक्षिणाम्। गतेषु विप्रमुख्येषु प्रियां रामोब्रवीदिदम् ॥९३॥ किमर्थ सुश्चु नष्टासि मुनीन् दृष्ट्वा त्विहागतान्। तत्सर्वत्वमिदं तत्वं कारणं वद माचिरम् ॥९४॥ भवितव्यं कारणेन तच्च गोप्यं न मे कुरु । शापितासि मम प्राणै लक्ष्मणस्य शुचिस्मिते ॥९५॥ एवमुक्ता तदाभर्त्रा त्रपयाऽ वाङ्मुखी स्थिता । विमुंचंती साऽश्रुपातं राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥९६॥ श्रृणु त्वं नाथ यद्दृष्टमाश्चर्यमिह यादृशम् । राम त्वया चिंत्यमानो राजेंद्रस्त्विह चागतः ॥९७॥ सर्वाभारणसंयुक्तौ द्वौ चान्यौ च तथाविधौ । द्विजानां देहसंयुक्ता त्रयस्ते रघुनंदन ॥९८॥ हें । हे राजन् ! इस तरह से श्रीरामचन्द्रजी से कहकर वे मुनिगण चले गये ॥८२॥ उसके बाद श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मणजी से कहा-- तुम मेरे लिए मेध्य मृग, शुद्ध नेत्रों वाला खरगोश, कालाशाक, मधु ॥|८३॥ जम्बीर, मुख्यमूल, अनेक प्रकार के मूल, पके कैंथ तथा दूसरे प्रकार के फल ॥८४॥ इन सबों को श्राद्ध करने के लिए शीघ्र लाओ । श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा प्राप्त करके लक्ष्मणजी ने भी वैसा ही किया ॥८५॥ बेर, इङ्गदी, अनेक प्रकार के शाक तथा मूल इन सबों को लाकर वे वहाँ ढेर लगा दिये ॥८६॥ श्रीराम के कहने पर श्रीजानकीजी ने उन सबों को सिद्ध किया । श्रीरामजी योगवापी में स्नान करके उन मुनियों के आने की प्रतीक्षा करने लगे ।८७॥ जब मध्याह्न के बाद कुतप की बेला आयी, उत्ती समय वे सभी ऋषि आ गये, जिन ऋषियों को श्रीरामचन्द्र ने निमन्त्रित किया था॥८८॥ उन आये हुए ऋषियों को देखकर श्रीसीताजी लज्जित होकर श्रीरामजी से दूर चली गयीं ॥८९॥ उनके नेत्र चिन्ता से विकसित हो गये थे, वे सोच रही थीं और काँप रही थीं ब्राह्मण यह नहीं जानते है किन्तु श्राद्ध के समय उपस्थित हो गये ॥९ ०॥ श्रीरामजी ने स्मृतिप्रोक्त विधि से ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा वैदिक विधि से उन्होंने ब्राह्मणों का सत्कार किया ॥९१॥ उन्होंने बलि वैश्वदेव विधि से पौराणिक प्रक्रिया को भी सम्पन्न किया । ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर उन्होंने क्रमानुसार पिण्डदान किया ॥९ २॥ अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देकर उनको विदा कर देने के बाद श्रीरामजी ने सीताजी से पूछा ॥९३॥ हे सुन्दरि ! यहाँ पर आये हुए ऋषियों को देखकर तुम यहाँ से हट क्यों गयी ? अतएवं शीघ्र तुम इसका कारण बतलाओ ॥९४॥ यहाँ पर जो भी कारण हो उसे तुम मुझसे छिपाना मत । तुमको मेरे तथा लक्ष्मण के प्राणों की शपथ है ॥९५॥ श्रीरामजी के इसतरह से कहने परे लज्जित होकर नीचे मुख करके, अपने आँसुओं को बहाती हुयी श्रीरामजी से सीताजी ने कहा ॥९६॥ हे नाथ ! यहाँ पर मैंने जो आश्चर्य देखा उसे आप सुनें हे श्रीराम ! आपके स्मरण करते ही महाराज दशरथ यहाँ पधार गये ॥९७॥ वे
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