Srishti Khanda Extracted Page 442

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-442

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

एह्यागच्छस्व पश्यस्व वापी तामवियोगदाम् । अवियोगश्व सर्वैश्च कूप एवात्र जायते ॥६६॥ आमुष्मिके चैहिके च जीवितोपि मृतस्य वा । एतद्वाक्यं मुनींद्रस्य श्रुत्वा लक्ष्मणपूर्वजः ॥६७॥ सस्मार रामो राजानं तदा दशरथं नृप । भरतं सह शत्रुघ्नं भ्रातृनन्यांश्च नागरान् ॥६८॥ एवंचिंतयतस्तस्य॒ संध्याकालो व्यजायत । उपास्य पश्चिमां संध्यां मुनिभिः सह राघवः ॥६९॥ सुष्वाप तां निशां तत्र भ्रातृभार्यासमन्वितः । विभावर्यवसाने तु स्वप्नांते रघुनंदनः ॥७०॥ पित्रा मात्रा तथा चान्यैरयोध्यायां स्थितः किल । विवाहमङ्गले वृत्ते बहुभिबांधवैः सह ॥७९॥ समासीनः सभार्योसावृषिभिः परिवारितः । लक्ष्मणेनाप्येवमेव दृष्टोऽसौ सीतया तथा ॥७२॥ प्रभाते तु मुनीनां तत्सर्वमेव प्रकीर्तितम् । ऋषिभिश्च तथेत्युक्तः सत्यमेतद्रधूत्तम॥७३॥ मृतस्य दर्शने श्राद्धं कार्यमावश्यकं स्मृतम् । वृद्धिकामास्तु पितरस्तथा चैवान्नकांक्षिणः ॥७४॥ ददंति दर्शनं स्वप्रे भक्तियुक्तस्य राघव। अवियोगस्तु ते भ्रात्रा पित्रा च भरतेन च ॥७५॥ चतुर्दशानां वर्षाणां भविता राघवध्षुवम्। कुरु श्राद्धं तथा वीर राज्ञो दशरथस्य च ॥७६॥ अमी च ऋषयः सर्वे तव भक्ताः कृतक्षणाः। अहं च जमदभ्निश्च भारद्वाजश्च लोमशः ॥७७॥ देवरातः शमीकश्च षडेते वै द्विजोत्तमाः । श्राद्धे च ते महाबाहो संभारास्त्वमुपाहर ॥७८॥ मुख्यं चेंगुदिपिण्याकं बदरामलकैः सह । श्रीफलानि च पक्वानि मूलं चोच्चावचं बहु ॥७९॥ मार्गेण चाथ मांसेन धान्येन विविधेन च । तृप्तिं प्रयच्छविप्राणां श्राद्धदानेन सुव्रत॥८०॥ पुष्करारण्यमासाद्य नियतो नियताशनः । पितृंस्तर्पयते यस्तु सोश्वमेधमवाण्नुयात्॥८ १॥ स्नानार्थ तु वयं रामगच्छामो ज्येष्ठपुष्करम्। इत्युक्तवा ते गताः सर्वे मुनयो राघवं नृप ॥८२॥ तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में आप यहाँ आये ॥६५॥ आइये उस अवियोगदा वापी का दर्शन कीजिये । इस कूप पर हो सबों का अवियोग हो जाता है ॥६६॥ पारलोकिक, लौकिक, जीवित तथा मृत सबों का यहाँ अवियोग हो जाता है । मुनीन्द्र के इस वाक्य को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ॥६७॥ महाराज दशरथ का भरत, शत्रुघ्न तथा दूसरे नागरिकों का स्मरण किए ॥६८॥ इस तरह से श्रीरामचन्द्रजी के सोचते हुए सन्ध्या का समय हो गया । श्रीरामचन्द्रजी ने मुनियों के साथ सायं सन्ध्या किया ॥६९॥ वहीं पर वे रात्रि में अपने भाई तथा पत्नी के साथ सोए । रात्रि की समाप्ति के समय वे स्वप्न में ॥७०॥ देखे कि वे अपने पिता, माता तथा भाइयों के साथ अयोध्या में विद्यमान हे । विवाह मङ्गल के समाप्त हो जाने पर वे अपने अनेक बान्धवों के साथ तथा पत्नी तथा ऋषियों के साथ बैठे हें । उसी तरह लक्ष्मण ने तथा सीताजी ने भी स्वप्न देखा ॥७१-७२॥ प्रातःकाल होने पर उन्होंने स्वप्न का वृतान्त ऋषियों को सुनाया तो ऋषियों ने कहा हे रघूत्तम ! यह आप सत्य कह रहे हैं ॥७३॥ मृत व्यक्ति का स्वप्न में आपने पुत्रों की वृद्धि करने की इच्छा से पितृगण अन्न प्राप्त करना चाहते हैं ॥७४॥ जो भक्तियुक्त होता है, उसी को वे स्वप्न में दिखायी देते हें । आपका पिता तथा भाई भरत से चौदह वर्षो के बाद अवियोग होगा । हे वीर राजा दशरथ का आप श्राद्ध करें ॥७५-७६॥ ये सभी ऋषि आपके भक्त हैं, तथा आपके इस शुभ कार्य में सहायक हैं । में जमदग्नि, भारद्वाज, लोमश ।।७७।। देवरात, शमीक, ये छहो द्विजोत्तम हैं हे महाबाहो ! बेर, आँवला इन सबों के साथ पके हुए बेल, तथा अनेक प्रकार के मूल ॥७८॥ इन सभी वस्तुआं से तथा श्राद्ध संबन्धी दान के द्वारा आप ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करें ॥७९-८ ०॥ इस पुष्कराण्य में जो नियम पूर्वक रहता है तथा नियमित आहार करके श्राद्ध करता है वह अश्वमेध याग करने का फल प्राप्त करता है ॥८१॥ हे राम ! हमलोग स्नान करने के लिए ज्येष्ठ पुष्कर जा रहे

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know