Srishti Khanda Extracted Page 441
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-441
Sanskrit Original
अनेनवनवासेन राज्ञस्तु मरणेन च। भरतस्य वियोगेन परितप्येह्यहं त्रिभिः ॥५१॥ तद्वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा विप्रर्षभस्तदा । ध्यात्वा च सुचिरं कालमिदं वचनमब्रवीत्॥५ २॥ अत्रिरुवाच साधुपृष्टं त्वया वीर रघूणां वंशवर्धन । मम पित्रा कृतं तीर्थ पुष्करं नामविश्रुतम् ॥५३॥ पर्वतौ द्वौ च विख्यातौ मर्यादायज्ञपर्वतौ । कुंडत्रयं तयोर्मध्येज्येष्ठ मध्य कनिष्ठकम् ॥५४॥ तेषु गत्वा दशरथं पिंडदानेन तर्पय । तीर्थानां प्रवरं तीर्थ क्षेत्राणामपि चोत्तमम् ॥५५॥ अवियोगा च सुरसा वापी रघुकुलोद्दह । तथा सौभाग्य कूपोन्यः सुजलो रघुनंदन ॥५६॥ तेषु पिण्डप्रदानेन पितरो मोक्षमाध्रुयुः। आभूतसंप्लवं कालमेतदाह पितामहः ॥५७॥ तत्र राघव गच्छस्व भूयोप्यागमनं क्रियाः । तथेति चोक्त्वा रामोऽपि गमनायमनो दधे ॥५८॥ ऋक्षवंतमभिक्रम्य नगरं वैदिशं तथा । चर्मण्वतीं समुत्तीर्य प्राप्तोसौ यज्ञपर्वतम् ॥५९॥ तमतिक्रम्य वेगेन मध्यमे पुष्करे स्थितः । पितृन्संतर्पयामास अद्धिर्देवांश्न सर्वशः ॥६०॥ स्नानावसाने रामेण मार्कडो मुनिपुंगवः । आगच्छन् शिष्यसंयुक्तो दृष्टस्तत्रैव धीमता ॥६१॥ गत्वा वै ससुखं तस्य प्रणिपत्य च सादरम् । पृष्टोऽवियोगदः कूपः कतमस्यां दिशि प्रभो ॥६२॥ सुतो दशरथस्याहं रामो नाम जनैः स्मृतः। सौभाग्यवापीं तां द्रष्टुमहं प्राप्तोऽ त्रिशासनात् ॥६३॥ तत् स्थानं तौ च वै कूपौ भगवान्प्रब्रवीतु मे। एवमुक्तश्च रामेण मार्कडः प्रत्युवाच ह॥६४॥ मार्कडेय उवाच साधु राघव भद्रं ते सुकृतं भवता कृतम्। तीर्थयात्राप्रसंगेन यत् प्राप्तोसीह सांप्रतम् ॥६५॥ वनवास, महाराज की मृत्यु तथा भरत के वियोग इन तीनों के कारण मैं संतप्त हूँ ॥५१॥ श्रीराम की उस वाणी को सुनकर महर्षि ने दीर्घकाल तक ध्यान करके देखा और कहा ॥५२॥ अत्रि महर्षि ने कहा--- हे रघुवंश को बढाने वाले श्रीराम ! आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, मेरे पिता ब्रह्माजी ने पुष्कर नामक विख्यात तीर्थ का निर्माण किया है ॥५३॥ वहाँ के मर्यादा पर्वत तथा यज्ञपर्वत ये दोनों विख्यात पर्वत हैं । उन दोनों के बीच में तीन कुण्ड हैं-- ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर ॥५४॥ वहाँ जाकर पिण्ड दान करके महाराज दशरथ को तृप्त करो। सभी तीर्थो में तथा सभी क्षेत्रों में पुष्कर श्रेष्ठ है ॥५५॥ हे रघूद्वह वहाँ पर अवियोगा नाम की वावली- है । हे रधुनन्दन ! वहाँ पर सुन्दर जल वाला सौभाग्य कूप है ॥५६॥ इन स्थानों में पिण्डदान करने से पितृगण मुक्त हो जाते हैं, ब्रह्माजी ने कहा है कि उस पिण्डदान से पितरों को प्रलय काल तक तृप्ति बनी रहती है ॥५७॥ हे राम ! पहले तुम वहाँ जाओं और उसके बाद यहाँ आना । श्रीराम भी बहुत अच्छा कहकर वहाँ जाने का मन बनाये ॥५८॥ वे ऋक्षपर्वत, विदिशा नगरी तथा चर्मण्वती नदी को पार करके यज्ञपर्वत पर आये ।।५९।। उसको पार करके वे मध्यपुष्कर पर आ गये । वहाँ पर वे जल से पितरों तथा देवों का तर्पण किए ॥६०॥ स्नान करने के बाद श्रीरामजी ने वहीं पर अपने शिष्यों के साथ आते हुए मुनिपुंगव मार्कण्डेय को देखा ॥६ १॥ श्रीरामचन्द्रजी उन महर्षि के समक्ष जाकर आदर पूर्वक साष्टङ्ग प्रणाम करके उनसे पूछे हे प्रभो ! अवियोग कुण्ड कहाँ पर हैं ?।।६२॥ मैं महाराज दशरथ का पुत्र राम हूँ, में सौभाग्यवापी का दर्शन करने के लिए महर्षि अत्रि के आदेश से आया हूँ ॥६३॥ अतएव आप मुझे उस स्थान को तथा उन दोनों कूपों को बतलायें । श्रीरामचन्द्रजी के इस तरह से कहने पर महर्षि मार्कण्डेय ने कहा ॥६४॥ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--- हे श्रीराम ! आपका कल्याण हो, आपने बहुत अच्छा काम किया कि
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