Srishti Khanda Extracted Page 440

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-440

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Sanskrit Original

शृंगशब्दाभिधानानि शुभप्रस्नवणानि च । ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो नित्यं सन्निहितास्रयः ॥३८॥ पुष्करेषु महाराज नातः पुण्यतमं भुवि । विरजं विमलं तोयं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥३९॥ ब्रह्मलोकस्य पन्थानं धन्याः पश्यंति पुष्करम् । यस्तुवर्षशतं साग्रमप्रिहोत्रमुपासिता ॥४०॥ कार्तिकी वा वसेदेकां पुष्करे सममेव च । कर्तुम्मया न शकितं कर्मणा नैव साधितम् ॥४९॥ तदयत्मात््वया तात मृत्युस्सर्वहरोजितः। तत्र दृष्टस्सदेवेशो ब्रह्मालोकपितामहः ॥४२॥ नान्यो मर्त्यस्त्वया तुल्यो भविता जगतीतले। अहं वै तोषितो येन पञ्चवार्षिकजन्मना ॥४३॥ वरेण त्वं मदीयेन उपमां चिरजीविनाम् । गमिष्यसि न सन्देहस्तथाशीर्वचनम्मम ॥४४॥ एवं वदन्ति ते सर्वे व्रजलोकान् यथेप्सितान् । एवं लब्धप्रसादेन मृकण्डुतनयेन च ॥४५॥ आश्रमः स्थापितस्तेन मार्कण्डाश्रम इत्युत। तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥४६॥ सर्वपापविशुद्धात्मा चिरायुर्जायते नर: । पुलस्त्य उवाच तथान्यं ते प्रवक्ष्यामि इतिहासं पुरातनम् ॥४७॥ यथा रामेण वै तीर्थपुष्करं तु विनिर्मितम् । चित्रकूटात्पुरा रामो मैथिल्या लक्ष्मणेन च ॥४८॥ अत्रेराश्रममासाद्य पप्रच्छ मुनिसत्तमम् । राम उवाच कानि पुण्यानि तीर्थानि किं वा क्षेत्रं महामुने ॥४९॥ यत्र गत्वा नरो योगिन् वियोगं सह बंधुभिः । नैव प्राप्रोति भगवन्तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥५०॥ इसको मैं नहीं जानता हूँ ॥३७॥ शृङ्ग (शिखर) शब्द से कहे जाने वाले तथा तीनों स्रोत रूप से वहाँ पर सदा ब्रह्मा, विष्णु का सान्निध्य बना रहता है ।॥।३८। अतएव हे महाराज भीष्म, पुष्कर से बढकर भूलोक में कोई दूसरा तीर्थ नहीं हैं । वहाँ का स्वच्छ तथा विमल जल त्रैलोक्य में विख्यात है ॥३९॥ वही (पुष्कर ही) ब्रह्मलोक का मार्ग है । धन्य पुरुष ही पुष्कर का दर्शन कर पाते हैं । एक सौ एक वर्ष तक अग्नियों की उपासना करने वाले व्यक्ति तथा कार्तिकी पूर्णिमा के दिन पुष्कर में एक रात्रि का निवास करने वाले व्यक्ति दोनों को समान फल होता है । जिन कर्मो को मैं नहीं कर स्का और न जिसकी साधना मैं कर सका ॥४०-४१॥ हे तात ! तुमने उस सबों को मारने वाली मृत्यु को जीत लिया है तुमने लोक पितामह ब्रह्माजी का दर्शन कर लिया है ॥४२॥ इस पृथिवी पर तुम्हारे समान कोइ दूसरा पुरुष नहीं होगा । तुमने पाँच वर्ष की अवस्था में मुझको प्रसन्न कर दिया ॥४३॥ मेरा तुम्हारे लिए आशीर्वाद है कि मेरे आशीर्वाद को प्राप्त करके तुम चिरंजीवियों में सर्वश्रेष्ठ हो जाओगे । इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥४४॥ सबलोग बतलाते हैं, कि महर्षि मृकण्डु के पुत्र मर्कण्डेय आशीर्वाद प्राप्त करके पुष्कर आये और ॥४५॥ वहाँ पर मार्कण्ड आश्रम के नाम से आश्रम स्थापित किये । वहाँ पर पवित्र होकर स्नान करने वाला मनुष्य वाजपेययज्ञ करने का फल प्राप्त करता है ॥४६॥ सभी पापों से रहित वह विशुद्धात्मा पुरुष दीर्घायु हो जाता है । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- अब मैं तुम्हे दूसरा प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ ।॥'४७॥ जिस तरह श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ बनाया उसे सुनाता हूँ । एक बार श्रीराम चित्रकूट में जानकीजी तथा लक्ष्मण के साथ ॥४८॥ महर्षि अत्रि के आश्रम में आकर उन मुनिश्रेष्ठ से पूछे । श्रीराम ने कहा-- हे महामुने ! आप हमें यह बतलाइये कि वे कौन से पवित्र तीर्थ तथा क्षेत्र हैं॥४९॥ हे योगिन् भगवन् ! जहाँ पर जाकर मनुष्य अपने बांधवों के वियोग को नहीं प्राप्त करता है ॥५०॥ इस

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