Srishti Khanda Extracted Page 439
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-439
Sanskrit Original
S१४ श्रीपद्ममहापुराण एवमुक्तस्तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः। ऋतवाक्यादियं भूमिः संस्थिता सर्वतोभया॥ २ ३॥ ब्रह्मोवाच मत्समश्चायुषा बालो मार्कडेयो भविष्यति । कल्पस्यादौ तथा चांते मतो मे मुनिसत्तमः ॥२४॥ एवं ते मुनयो बालं ब्रह्मलोके पितामहात् । संसाध्य प्रेषयामासु भूयोप्येनं धरातलम् ॥२५॥ तीर्थयात्रां गता विप्रा मार्कडेयो निजं गृहम्। जगाम तेषु यातेषु पितरं स्वमथाब्रवीत् ॥२६॥ ब्रह्मलोकमहं नीतो मुनिभि ब्रह्मवादिभिः । दीर्घायुश्च कृतश्चास्मि वरान् दत्वा विसर्जितः ॥२७॥ एतदन्यच्च मे दत्तं गतं चिन्ताकरं तव । कल्पस्यादौ तथा चांते भविष्ये समनंतरे ॥२८॥ लोककतुर्बरह्मणोहं प्रसादात्तस्य वै पितः। पुष्करं वै गमिष्यामि तपस्तप्तुं समुद्यतः॥२९॥ तत्राहं देवदेवेशमुपासिष्ये पितामहम्। सर्वकामावाप्तिकरं सर्वारातिनिबर्हणम् ॥३०॥ सर्वसौख्यप्रदं देवमिन्द्रादीनां परायणम्। ब्रह्माणं तोषयिष्यामि सर्वलोकपिताहम् ॥३९॥ मार्कण्डेय वचः श्रुत्वा मृकंडुर्मुनिसत्तमः । जगाम परमं हर्ष क्षणमेकं समुच्छवसन् ॥३२॥ धैर्य सुमनसा स्थाप्य इदं वचनमब्रवीत् । अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्॥३३॥ सर्वस्य जगतां स्रष्टा येन दृष्टः पितामहः । त्वया दायादवानस्मि पुत्रेण वंशधारिणा॥३४॥ त्वं गच्छ पश्य देवेशं पुष्करस्थं पितामहम् । दृष्टे तस्मिन् जगन्नाथे न जरामृत्युरेव च ॥३५॥ नृणां भवति सौख्यानि तथैश्वर्यं तपोऽक्षयम्। त्रीणि शृङ्गाणि शुभ्राणि त्रीणि प्रस्रवणानि च॥३६॥ पुष्कराणि तथा त्रीणि नविद्यस्तत्र कारणम्। कनीयांसं मध्यमं च तृतीयं ज्येष्ठपुष्करम्॥३७॥ दूसरा कौन सा उपाय है कि आपकी वाणी के साथ-साथ हमलोगों की भी वाणी सत्य हो ॥२२॥ इस तरह से सप्तर्षियों द्वारा कहे जाने पर लोकपितामह ब्रह्माजी ने कहा सत्य भाषण करने के ही कारण पृथिवी अभय होकर स्थित है ॥२३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- मुनियों में श्रेष्ठ यह बालक मार्कण्डेय मेरे ही समान आयु वाला होगा । यह कल्प की आदि और अन्त दोनों में रहेगा ॥२४॥ इस प्रकार वे मुनि ब्रह्माजी से उस बालक को दीर्घायु बनवाकर उसे पृथिवी पर भेज दिए ॥२५॥ सप्तर्षिगण तो तीर्थ यात्रा में चले गये और मार्कण्डेय अपने घर आये । उन ऋषियों के चले जाने पर मार्कण्डेय अपने पिता के पास गये और कहे ॥२६॥ ब्रह्मवादी ऋषिगण मुझे ब्रह्मलोक ले गये थे । ब्रह्माजी ने मुझे दीर्घायु होने का वरदान देकर भेज दिया है ॥२७॥ उस वर देने से अब आपको किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए; मैं कल्प की आदि में तथा अन्त में भी रहुँगा ॥२८। लोककर्ता ब्रह्माजी की कृपा से में ऐसा हो गया हूँ, में तपस्या करने के लिए पुष्कर तीर्थ में जाना चाहता हूँ ॥२९॥ वहाँ पर मैं देवाराध्य ब्रह्माजी की उपासना करूँगा । ब्रह्माजी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा समस्त शत्रुओं को विनष्ट करने वाले हें ॥३०॥ वे सभी प्रकार के सौख्य को प्रदान करने वाले तथा इन्द्र आदि देवताओं के भी आश्रय हैं । मैं सर्वलोक पितामह ब्रह्माजी को प्रसन्न करूँगा ।।३१।। बालक माकण्डेय की बात सुनकर मृकण्डु महर्षि थोड़ी देर तक हर्षातिरेक के कारण मौन रहे। ३ २॥ उसके बाद धैर्य धारण करके प्रसन्नता पूर्वक कहे-- आज मेरा जन्म सफल हो गया और मेरा जीवन भी सफल हो गया ॥३३॥ क्योंकि सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी का तुमने दर्शन किया है । तुम जैसे पुत्र को प्राप्त करके मैं पुत्रवान् तथा दायादवान् हो गया ॥३४॥ तुम पुष्कर जाकर देवेश ब्रह्माजी का दर्शन करो उनकादर्शन करने वाले के पास न तो बुढापा आती है और न मृत्यु आती है ॥३५॥ मनुष्यों को अक्षय सुख तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । वहाँ पर तीन श्वेत शिखिर तथा तीन स्रोतस हैं ॥३६॥ तथा तीन ही पुष्कर भी हैं, क्यों ऐसा है
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