Srishti Khanda Extracted Page 438

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-438

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Sanskrit Original

स तच्छुत्वा वचो भीष्म ज्ञानिना यदुदाहृतम् । अथोपनयनं चक्रे बालकस्य पिता तदा ॥९॥ आह चैनं पिता पुत्रमृषीस्त्वमभिवादय । एवमुक्तः स वै पित्रा प्ररहृष्टश्चाभिवादने॥१०॥ नवर्णावर्णतां वेत्ति सर्ववर्णाभिवादनः । पंचमासास्त्वतिक्रांता दिवसाः पंचविंशतिः ॥९९॥ मार्गेणाथ समायाता ऋषयस्तत्र सप्त वै । बालेन तेन ते दृष्टाः सर्वेचाप्यभिवादिताः ॥१२॥ आयुष्पान्भव तै रक्त: सबालो दंडमेखली । उक्त्वैवं पुनर्बालमपश्यन् क्षीणजीवितम् ॥१३॥ दिनानि पंचतस्यायु ज्ञात्वाभ्रीताश्व ते नृप। तं गृहीत्वा बालकं च गतास्ते ब्रह्मणोंतिकम् ॥१४॥ प्रतिमुच्य च तं राजन् प्रणिपेतुः पितामहम् । अयमावेदितस्तैस्तु तेन ब्रह्माभिवादितः ॥१५॥ चिरायुर्त्रह्मणा बालः प्रोक्तः स ऋषिसन्निधौ । ततस्ते मुनयः प्रीताः श्रुत्वा वाक्यं पितामहात् ॥१६॥ पितामह ऋषीन् दृष्ट्वा प्रोवाच विस्मयान्वितः। कार्येण येन चायातः कोऽयं बालो निवेद्यताम् ॥१७॥ ततस्त ऋषयो राजन् सर्व तस्मै न्यवेदयन् । पुत्रो मृकंडोः क्षीणायुः सायुषं कुरु बालकम् ॥१८॥ अल्पायुषस्त्वस्य मुनिर्बुध्वेमां चापि मेखलाम्। यज्ञोपवीतं दंडं च दत्वा चैनमबोधयत् ॥१९॥ यं कंचित्पश्यसे बाल भ्रमंतं भूतले जनम्। तस्याभिवादः कर्तव्य एवमाह पिता वचः ॥२०॥ अभिवादनशीलोऽयं क्षितौ दृष्टः परिभ्रमन् । तीर्थयात्राप्रसंगेन दैवयोगात्पितामह ॥२१॥ चिरायुर्भवपुत्रेति प्रोक्तोसौ तत्र बालक: | कथं वचो भवेत्सत्यमस्माकं भवता सह ॥२२॥ कितनी है 2॥६॥ आप इसकी आयु को गिनकर बतलायें चाहे वह कम हो अथवा अधिक हो। मृकण्डु के द्वारा इस तरह से पूछे जाने पर ज्ञानी पुरुष ने कहा ॥७॥ हे मुनीश्वर ! ब्रह्माजी के द्वारा रचित इस बालक की आयु केवल छह मास बची है । आपको इस विषय में कोई शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि मैने आपसे सत्य कहा है ॥८॥ ज्ञानी पुरुष द्वारा कही गयी बात को सुनकर मृकण्डु महर्षि ने उस बालक का उपनयन संस्कार कर दिया ॥९॥ उन्होंने अपने पुत्र से कहा-- तुम ऋषियों को प्रणाम किया करो । पिता की बात को सुनकर वह प्रसन्नता पूर्वक प्रणाम करने लगा ॥१०॥ किसी भी ऋषि के वर्ण को जाने बिना ही प्रणाम करने लगा । इसतरह करते हुए उसके पाँच मास पचीस दिन और बीत गये ॥११॥ उसी मार्ग से सप्तर्षि आ रहे थे । उन लोगों को देखकर उस बालक ने सबों को प्रणाम किया ॥१२॥ दण्ड तथा मेखला धारण किए हुए उस बालक को देखकर सप्तर्षियों ने कहा आयुष्मान् भव । इस तरह से उस बालक को कहकर ऋषियों ने देखा कि इसकी आयु क्षीण हो चली है ॥१३॥ हे राजन् ! यह जानकर वे भयभीत हो गये कि इसकी आयु केवल पाँच दिन बची है । उस बालक को लेकर वे ब्रह्माजी के पास गये।। १४।। उस बालक को छोड़कर उनलोगों ने ब्रह्माजी को साष्टाङ्ग प्रणाम किया । उसके बाद उन लोगों के द्वारा प्रेत उस बालक ने भी ब्रह्माजी को प्रणाम किया ॥१५॥ उन ऋषियों के सामने ब्रह्माजी ने उस बालक को चिरायु होने का आशीर्वाद दिया । ब्रह्माजी की बात को सुनकर वे सप्तर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥१६॥ ऋषियों को देखकर आश्चर्यचकित होकर ब्रह्माजी ने कहा-- आपलोग जिस कार्य से आये हों उस कार्य को तथा इस बालक को बतलाइये कि यह कौन है 2॥१५७॥ इसके बाद उन ऋषियों ने सारी बातें बतला दी । ऋषियों ने कहा-- यह मृकण्डु ऋषि का पुत्र है, उसकी आयु क्षीण हो चली है, इसे आयु से युक्त आप बना दें ॥१८॥ मुनि ने इसके अल्पायुष्टवा को जानकर इसका उपनयन कर दिया और मेखलाबंध करके यज्ञोपवित और दण्ड प्रदान करके कहा कि ॥१९॥ हे बालक ! जिस किसी भी ऋषि को पृथिवी पर घूमते हुए देखो उसे प्रणाम किया करो ॥२०॥ हे पितामह ! तीर्थयात्रा के हर प्रसङ्ग में इसबालक ने दैवयोग से हमलोगों को देखा । इसको हमलोगों ने चिरायु होने का आशीर्वाद दे दिया । अब

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