Srishti Khanda Extracted Page 437

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-437

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Sanskrit Original

उक्ता तया तथा गङ्गादिशं प्राचीं व्रजस्व ह । विस्मर्तव्या न चाहं ते व्रज देवि यथागतम् ॥१५६॥ इति श्रीपदामहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे तीर्थावतारो नाम द्वात्रिशोऽध्यायः ॥३२॥ ae तैतीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच मार्कडेयेन वै रामः कथमत्र प्रबोधितः । कथं समागमो भूतः कस्मिन्काले कदा मुने ॥१॥ मार्कडेयः कस्य सुतः कथं जातो महातपाः । नाम्रोस्य निगमं ब्रुहि यथा भूतं महामुने॥२॥ पुलस्त्य उवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि मार्कडेयोद्धवं पुनः । पुराकल्पे मुनिःपूर्वं मृकडु नाम विश्रुतः ॥३॥ भृगोः पुत्रो महाभागः सभार्यस्तप्तवांस्तपः । तस्य॒ पुत्रस्तदा जातो वसतस्तु वनांतरे ॥४॥ स पंचवार्षिको भूतो बाल एव गुणाधिकः । ज्ञानिना स तदा दृष्टो भ्रमन् बालस्तदांगणे ॥५॥ स्थित्वा स सुचिरं कालं भाव्यर्थ प्रत्यबुध्यत । तस्य पित्रा स वै पृष्टः कियदायुः सुतस्य मे ॥६॥ संख्ययाचक्ष्व वर्षाणि तस्याल्पान्यधिकानि वा । मृकंडुनैवमुक्तस्तु स ज्ञानी वाक्यमब्रवीत्॥७॥ षण्मासमायुः पुत्रस्य धात्रा सृष्टं मुनीश्वर । नैव शोकस्त्वया कार्यः सत्यमेतदुदाहृतम् ॥८॥ पश्चिमाभिमुख गयी हैं ॥१५५॥ सरस्वती ने गङ्गाजी से कहा की तुम पूर्व दिशा में जाओ । हे देवि ! तुम कभी मुझे भूलना मत ॥१५६॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के तीर्थावतार नामक बत्तीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।३२।। — rte मार्कण्डेय महर्षि की उत्पत्ति का वर्णन, उनके आश्रम का वर्णन, श्रीरामचन्द्रजी का महर्षि मार्कण्डेय से समागम, मार्कण्डेय आश्रम में श्रीरामचन्द्रजी का स्वप्न में महाराज दशरथ का दर्शन, श्रीरामजी द्वारा वहाँ श्राद्ध, महाराज दशरथ को वहाँ प्रत्यक्ष देखकर सीताजी को लज्जा, श्रीरामजी का ज्येष्ठ पुष्कर में एक मास तक निवास, श्रीरामजी द्वारा अजगन्ध शिव का दर्शन, अजगन्थ शिव द्वारा श्रीरामजी की प्रशंसा श्रीभीष्मजी ने कहा-- हे मुने ! श्रीरागजी की महर्षि मार्कण्डेय से कब तथा किस स्थान पर एवं कैसे भेंट हुयी ? उन्होंने श्रीरामजी को कैसे प्रबोधित किया 2॥१॥ महर्षि मार्कण्डेय किसके पुत्र थे, वे महातपस्वी केसे हो गये? इनका नाम मार्कण्डेय कैसे हुआ 2॥२॥ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- में तुम्हें मार्कण्डेय महर्षि की उत्पित्ति को बतलाता हुँ । पहले के कल्प में मृकण्डु नाम के विख्यात मुनि थे ॥३॥ वे महर्षि भृगु के पुत्र थे और वन में पत्नी के साथ जाकर तपस्या करने लगे वन में रहते समय ही उनको एक पुत्र हुआ ॥४।। बालक बचपन से ही गुणवान् था, जब वह पाँच वर्ष का हुआ तो बालक को आंगन में घूमते हुए किसी ज्ञानी व्यक्ति ने देखा ॥५॥ वह दीर्घकाल तक खड़ा होकर भावी अर्थ का विचार कर रहा था । उससे उस बालक के पिता ने पूछा कि मेरे पुत्र की आयु

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