Srishti Khanda Extracted Page 436

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-436

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Sanskrit Original

प्राची सरस्वती तत्र नरैः किं मृग्यते परम्। तस्यां स्नानात्फलं तृप्त्यै तपोयज्ञादि लक्षणम् ॥१४०॥ ये पिबंति नराः पुण्यां प्राचीं देवीं सरस्वतीम् । न ते नराः सुरा ज्ञेया मार्कडेयर्षिरव्रब्रीत् ॥९४१॥ सरस्वतीनदीं प्राप्य न स्नानेनियमः क्वचित् । भुक्ते वा न च वा भुक्ते दिवा वा यदि वा निशि॥१४२॥ तत्तीर्थं सर्वतीर्थानां प्राचीनं प्रवरं स्मृतम् । पापघ्नं पुण्यजननं प्राणिनां परिकीर्तितम् ॥१४३॥ ये पुनर्भावितात्मानस्तत्र स्नात्वा जनार्दनम् । पूजयन्ति यथा शक्ति ते प्रयांति त्रिविष्टपम् ॥९४४॥ देवानां प्रवरो विष्णुस्तेन यत्र सरस्वती । सेविता तत्परं तीर्थ क्षितौ ब्रह्मसुतोब्रवीत् ॥१४५॥ ततस्तस्मान् महातीर्थं मन्यमाना महोदयम् । मंदाकिनीमुदीक्षंती स्थिता तत्र सरस्वती॥१४६॥ तत्तीर्थं सर्वतीर्थानां परं स्वायंभुवो ब्रवीत् । मंदाकिन्या समंयत्र प्राप्य पुण्यसमागमम् ॥१४७॥ तत्र स्थानेस्थिता देवैः स्तुता देवी सरस्वती। मत्वा चैकाकिनीं तां तु दीनास्यां दीनमानसाम्॥१४८॥ सखीं तदा सृजद्दह्यारूपिणी विमलेक्षणाम्। हरिणीं हरिरप्याशु जज्ञे कमललोचनाम् ॥१४९॥ वञ्रिणीमपि देवेशो वद्रपाणिर्विसृष्टवान् । सुकुरङ्गरुचिं देवो नीलकंठो वृषध्वजः ॥१५०॥ सखीं सञ्जनयामास सरस्वत्यास्त्रिलोचनः । विलोक्यमाना सा राजन् सखीभिः सुरसुंदरी॥९५९॥ प्रहृष्टायातुमारब्धा देवादेशान्महानदी। तत: सखीभिः सार्द्ध सा प्राचीना गंतुमुद्यता ॥१५२॥ सरस्वती समस्तानां तासां श्रेष्ठतमा स्मृता। प्राची सरस्वती तोयं ये पिबंति मृगा भुवि ॥१५३॥ तेपि स्वर्ग गमिष्यंति यज्ञैर्हिजिवरा यथा । चिंतामणिरिवात्रैषा प्राची ज्ञेया सरस्वती ॥९५४॥ तथाकामफलस्येयं हेतुभूता महानदी । दक्षिणां दिशामालोक्य पुनः पश्चान्मुखीगता॥९५५॥ है यदि वह सुवर्ण तथा खिचड़ी भी दान करता है, वह स्वर्ग लोक में जाकर सुखी होता है ॥१३९॥ प्राचीन सरस्वती तीर्थ वही हैं, उसमें स्नान करने से तपस्या एवं यज्ञ से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति होती है ॥ १४०॥ जो लोग प्राचीन सरस्वती के जल का पान करते हैं, वे देवताओं से भी बढकर है यह महर्षि मार्कण्डेय ने कहा है ॥१४१॥ सरस्वती नदी में स्नान करने का कोई नियम नहीं है; यहाँ दिन में या रात में, या भोजन करके, या बिना भोजन किए किसी भी दशा में स्नान कर लेना चाहिए ॥१४६॥ वह तीर्थ सभी तीर्थो से प्राचीन और श्रेष्ठ है । उसे प्राणियों के पाप को विनष्ट करने वाला तथा पुण्य प्रदान करने वाला बतलाया गया है ॥१४३॥ जो भक्ति सम्पन्न लोग वहाँ पर स्नान करके अपनी शक्ति के अनुसार भगवान् जनार्दन की पूजा करते हैं, वे स्वर्गलोक में जाते हैं ॥१४४॥ जहाँ पर देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं वहाँ पर रहने वाली सरस्वती का सेवन ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है यह ब्रह्माजी ने कहा है । जहाँ पर गङ्गा के साथ सरस्वती का पवित्र सङ्गम है ॥१४६-१४७॥ वहाँ पर सभी देवता रहकर सरस्वती देवी की स्तुति करते हैं । उस सरस्वती को अकेली तथा दीन समझकर ।।१४८॥ ब्रह्माजी ने उसकी सखी के रूप में विमलेक्षण की सृष्टि की । भगवान् श्रीहरि ने कमल के समान नेत्रों वाली हरिणी नाम की उसकी सखी की सृष्टि की॥ १४९॥ वञ्रपति इन्द्र ने वज्रिणी की सृष्टि की, नीलकण्ठ भगवान् वृषध्वज शङ्करजी ने सरस्वती नदी की सखी के रूप में कुरङ्गाक्षी की सृष्टि की ॥१५०॥ अपनी सखियों को देखकर सरस्वती देवी ब्रह्माजी का आदेश प्राप्त कर प्रसन्नता पूर्वक उन सबों के साथ जाने के लिए तैयार हो गयीं ॥१५१-१५२॥ उन सभी सखियों में सरस्वती श्रेष्ठ हें । इस लोक में जो मृग भी प्राची सरस्वती के जल को पीते हैं ॥१५३॥ वे भी उसी तरह स्वर्ग जाते हैं, जिस तरह श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञों को करके स्वर्गलोक जाते हैं । यहाँ पर विद्यमान प्राची सरस्वती चिन्तामणि के समान हैं ॥१५४॥ यह महानदी चिन्तामणि के ही समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं, वहाँ से दक्षिण दिशा में जाकर फिर

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