Srishti Khanda Extracted Page 435

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-435

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Sanskrit Original

योऽत्र पूजाजपोहोमः कृतो भवति देहिनाम्। अनन्तं तत्फलं सर्व ब्रह्मभक्तिरतात्मनाम् ॥१२५॥ तत्र दीपप्रदानेन ज्ञानचक्षुरतीद्रियः । प्राप्रोति धूपदानेन स्थानं ब्रह्मनिषेवितम् ॥१२६॥ अथ किं बहुनोक्तेन संगमे यत्प्रदीयते। तदनंतफलं प्रोक्तं जीवतो वा मृतस्य च॥१२७॥ स्नानाज्जपात्तथा होमादनंतफलसाधकम्। रामेणागत्य वै तत्र पिंडं दशरथस्य च ॥९२८॥ दत्तं श्राद्धं तत्र तेन मार्कडेयेन दर्शिते । तत्र वापी चतुः कोणा तत्रपिंडप्रदा नराः ॥१२९॥ हंसयुक्तेन यानेन सर्वे यांति त्रिविष्टपम् । तस्यां वाप्यां तु वै ब्रह्मा पितृमेधं चकार ह॥१३०॥ यज्ञं यज्ञविदां श्रेष्ठः समाप्तवरदक्षिणम् । वसवः पितरो ज्ञेया रुद्राश्चैव पितामहाः ॥१३९॥ आदित्याश्च ततस्तेषां विहिताः प्रपितामहाः । त्रिविधा अपि आहूय पुनरुक्ता विरिचिना ॥१३२॥ भवद्भि: पिंडदानाद्यं ग्राह्ममत्र स्थितैस्सदा । यत् कृतं पितृकार्यं च तदनंतफलं भवेत् ॥१३३॥ वृत्यर्थ पितरस्तेषां तुष्टाश्चैव पितामहाः। लभंते तर्पणात्तृप्ति पिंडदानात्त्रिविष्टपम् ॥१३४॥ तस्मात् सर्व परित्यज्य प्राचीने पिंडदो भवेत् । दत्वा पुत्रः प्रयत्नेन पितृन् सर्वाश्च तर्पयेत् ॥१३५॥ प्राचीनेश्वरदेवस्य पुरोभूतं प्रतिष्ठितम् । आदितीर्थं॑तदित्युक्तं दर्शनादपि मुक्तिदम् ॥१३६॥ स्पृष्ट्वा तु सलिलं तत्र मुच्यते जन्मबन्धनात्। अवगाहनाद्वह्मणोऽसौ भवत्यनुचरः सदा ॥१३७॥ आदि तीर्थे नरः स्नात्वा यः प्रदद्यात्समाधिना । अन्नमल्पमपि प्रायः प्रायशस्स्वर्गमाप्रुयात्॥९३८॥ यस्तत्र ब्रह्मभक्तानां नरः स्नात्वा ददेद्धनम्। कृसरेणापि हेम्ना च सस्वर्गे मोदते सुखी ॥१३९॥ करते हैं ॥१२४।। इस तीर्थ में जो लोग पूजा, होम तथा जप करते हैं वे ब्रह्माजी की भक्ति से युक्त मनुष्य अनन्त फल को प्राप्त करते हैं ॥१२५॥ इस तीर्थ में दीपदान करने से दिव्य ज्ञान चक्षु की प्राप्ति होती है, तथा धूप देने से ब्रह्माजी का लोक प्राप्त होता है ॥१२६॥ बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ? संगम स्थल में जीवित अथवा मृत व्यक्ति के उद्देश्य से जो दान दिया जाता है, उससे उसके अनन्त फल की प्राप्ति होती है ॥१२७॥ यहाँ पर स्नान, जप तथा होम करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है यहीं आकर महर्षि मार्कण्डेय की आज्ञा से श्रीराम ने महाराज दशरथ का पिण्डदान एवं श्राद्ध किया था । वहीं पर एक चतुष्कोण छोटी सी वावली है, वहाँ पर पिण्डदान करने वाले लोग ॥१२८-१२९॥ हंस युक्त विमान के द्वारा स्वर्गलोक में जाते हैं । उसी वापी पर ब्रह्माजी ने भी पितृमेध (पितृश्राद्ध) किया था । यज्ञ को जानने वालों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने उस श्राद्ध में श्रेष्ठ दक्षिणा दी थी । उसमें उन्होंने वसुओ को पितृस्थान पर नियुक्त किया, रुद्रो को पितामह रूप से नियुक्त किया ॥१३०-१३१॥ और आदित्यों को उन्होंने प्रपितामह के स्थान पर नियुक्त किया । तीनों प्रकार से नियुक्त करके ब्रह्माजी ने कहा-- ॥१३२॥ आप सब लोग यहाँ पर स्थित रहकर सदा पिण्डदान ग्रहण करेंगे । यहाँ पर किया गया पितृकार्यं अनन्त फल प्रदान करने वाला होता है ॥१३३॥ यहाँ पर श्राद्ध करने वालों के पितृगण उन सबों की जीविका का आशीर्वाद देते हैं । वे इस स्थान पर तृप्त हो जाते हैं और पिण्डदान करने पर स्वर्गलोक में चले जाते हैं ॥१३४।। अतएव हर प्रकार से प्राचीन तीर्थ में पिण्डदान करना चाहिए । यहाँ पिण्डदान करने वाला पुत्र अपने समस्त पितरों को तृप्त कर देता है॥१३५॥ प्राचीनेश्वर के सामने ही अदि तीर्थहैं, उसका दर्शन करने मात्र से भी मुक्ति मिल जाती हैं ॥१३६॥ वहाँ पर जल का स्पर्श करके भी मनुष्य जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है । वहाँ पर स्नान कर लेने से मनुष्य ब्रह्माजी का सदा के लिए अनुचर हो जाता है ॥१३७॥ जो मनुष्य आदि तीर्थ में स्नान करके भक्तिपूर्वक थोड़ा सा भी अन्न दान करता है वह स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥१३८॥ जो व्यक्ति वहाँ पर स्नान करके ब्रह्माजी के भक्तों को धन दान करता

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