Srishti Khanda Extracted Page 434
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-434
Sanskrit Original
एषां च क्रियतां पूजा वाङ्मनः कायकर्मणा । सरस्वती सुरेंद्राणां कृत्ता पूजाविधिक्रमम् ॥१११॥ क्रमेण ब्रह्मजा पश्चात् संगता तु सखीजनम् । ज्येष्ठमध्यमयोर्मध्ये संगमो लोकविश्रुतः॥९९२॥ पश्चान्मुखी ब्रह्मसुता जाह्नवी तु उदङ्मुखी । ततस्ते विबुधाः सर्वे पुष्करं ये समागताः ॥११३॥ विदित्वा दुष्करं कर्म तस्याः स्तुतिमकारयन्। त्वं बुद्धिस्त्वं मति लक्ष्मी स्त्वं विद्या त्वं गतिः परा ॥११४॥ त्वं श्रद्धा त्वं परानिष्ठा बुद्धि मेधा रतिः क्षमा। त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा त्वं पवित्रं मतं महत् ॥१ ९५॥ संध्या रात्रिः प्रभा भूति मेंधा श्रद्धा सरस्वती। यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभना ॥१९६॥ आन्वीक्षिकी तु या वार्ता दंडनीतिश्च कथ्यते । नमोस्तु ते पुण्यजले नमः सागरगामिनि ॥१९७॥ नमस्ते पापनिर्मोके नमो देवि जगत् प्रिये। एवं स्तुता हि सा देवी दिव्या स्वार्थपरायणैः॥१९१८॥ एवं सा प्राङ्मुखी तत्र स्थिता देवी सरस्वती । सर्वतीर्थथयी देवी सर्वामरसमन्विता ॥११९॥ प्राची सेति बुधै ज्ञेया ब्रह्मणो वचनं तथा । तत्र शुद्धावटं नाम तीर्थ पैतामहं स्मृतम्॥९२०॥ दर्शनेनापि वै तस्य महापातकिनोपि ये । भोगिभोगान् समश्नंति विशुद्धा ब्रह्मणोतिके ॥९२९॥ प्रायोपवेशं तत्र प्रकुर्वंति नरोत्तमाः । ते मृता ब्रह्मयानेन दिवं यांत्यकुतोभयाः ॥१२२॥ तत्राल्पमपि यै दानि दत्तं ब्रह्मविदात्मनाम् । जन्मांतरशतं तेषां तैदर्त्त भावितात्मनाम् ॥९२३॥ खण्डस्फुटितसंस्कारं तत्र कुर्वन्ति ये नराः । ते ब्रह्मलोकमासाद्य मोदन्ते सुखिनस्सदा ॥१२४॥ तो देवताओं का अत्यन्त कठिन काम किया है ॥१०६-१०९॥ हे देवि ! तुमने देवताओं के उस कार्य को किया है, जिसको दूसरा कोई नहीं कर सकता है; इसीलिए ये देवगण तुम्हारा दर्शन करने के लए आये हैं ॥११०॥ इन सबों की तुम मन, वाणी तथा कर्म से पूजा करो । इसके बाद सरस्वती भी उन देवताओं की सविधि पूजा की ॥१११॥ उसके बाद सरस्वती अपनी सखियों से क्रमशः मिलीं यह गङ्गा तथा सरस्वती का लोक विख्यात मिलन ज्येष्ठ पुष्कर तथा मध्यम पुष्कर के बीच में हुआ है ॥११२॥ उसके बाद पुष्कर में आये हुए देवता तथा ऋषिगण सरस्वती को पश्चिमाभिमुख तथा गङ्गा को उत्तराभिमुखी देखकर और सरस्वती के दुष्कर कर्म को जानकर सरस्वती की स्तुति करने लगे । देवताओं ने कहा-- हे देवि ! तुम ही, बुद्धि, मति, लक्ष्मी, विद्या तथा परमा गति हो ॥११३-११४॥। तुम ही श्रद्धा हो, तुम ही परा निष्ठा हो, तुम ही बुद्धि, मेधा, रति तथा क्षमा हो । तुम ही सिद्धि, स्वधा, स्वाहा तथा पवित्र एवं महान् सिद्धान्त हो ॥११५॥ तुम ही संध्या, रात्रि, प्रभा, भूति, मेधा, श्रद्धा, सरस्वती, यज्ञविद्या, महाविद्या, गुह्यविद्या ॥११६॥ सुन्दर अन्विक्षिकी (तर्कविद्या) वार्ता, दण्ड, तथा नीति भी तुम ही कहलाती हों । हे पवित्र जलवाली देवि ! आपको नमस्कार हैं । हे सागर गामिनि ! तुम्हें नमस्कार हैं ॥११७॥ हे पापों को विनष्ट करने वाली; तुम्हें नमस्कार है, हे जगत प्रिये देवि ! तुम्हें नमस्कार हैं । उन स्वार्थ परायण देवताओं द्वारा इस प्रकार से स्तुति किए जाने पर दिव्य गुण सम्पन्न समस्त तीर्थ स्वरूपिणी तथा समस्त देवताओं से युक्त सरस्वती देवी।११८-११९॥ को ब्रह्माजी ने कहा कि इसे ही प्राची सरस्वती जानना चाहिए । वहीं पर ब्रह्माजी का शुद्धावट नामक तीर्थ है ॥१२०॥ उस तीर्थ का दर्शन करने मात्र से भी बड़े-बड़े पापी शुद्ध होकर ब्रह्माजी के लोक में जाकर अनेक प्रकार के भोगों को प्राप्त करते हैं ॥१२१॥ जो श्रेष्ठपुरुष उस तीर्थ में जाकर उपवास व्रत करते हैं वे मृत्यु के पश्चात् ब्रह्म विमान से स्वर्गलोक में जाते हैं ओर निर्भय हो जाते हैं ॥१२२॥ जो वहाँ पर (पुष्कर में) जाकर ब्रहमज् पुरुषों को थोड़ा सा भी दान करते हैं वे अगले सैकड़ों जन्मों तक उस दान के पुण्य को भोगते हैं ॥१२३॥ जो लोग पुष्कर तीर्थ में जाकर वहाँ के टूटे-फूटे तीर्थों का जीर्णोद्धार करते हैं, वे सुखी मनुष्य ब्रह्मलोक में जाकर आनन्दानुभव
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