Srishti Khanda Extracted Page 432
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-432
Sanskrit Original
श्रीफलैः शिखरं भाति समन्तात्सुमनोहरैः । गुंजद्धिः षट्पदकुलैः समंतादुपशोभितम् ॥८ ३॥ कोकिलारावरुचिरं शिखिकेकारवाकुलम्। शृंगे मनोहरे तस्मिन्नुद्रतासु मनोरमा॥८४॥ पुण्यापुण्यजलोपेता नदीयं ब्रह्मणस्सुता । वंशस्तम्बात्सुविपुला प्रवृत्ता चोत्तरामुखी ॥८५॥ गत्वा ततो नाति दूरात्पुनर्याति पराङ्मुखी । ततः प्रभृति सा देवी प्रसन्ना प्रकटा स्थिता ॥८६॥ अन्तर्धानं परित्यज्य प्राणिनामनुकम्पया । कनका सुप्रभा चैव नन्दा प्राची सरस्वती ॥८७॥ पंचस्त्रोताः पुष्करेषु ब्रह्मणा परिभाषिता। तस्यास्तीरे सुरम्याणि तीर्थन्यायतनानि च ॥८८॥ संसेवितानि मुनिभिः सिद्धैश्चापि समंततः । तेषु सर्वेषु भविता धर्महेतुः सरस्वती॥८९॥ हाटकाक्षितिगौरीणां तत्तीर्थेषु महोदयम् । दानं दत्तं नरैः स्ातैर्जनयत्यक्षयं फलम्॥९०॥ धान्यप्रदानं प्रवरं वदंति तिलप्रदानं च तथामुनीद्राः । यैस्तेषु तीर्थेषु नरैः प्रदत्तं तद्धर्महेतुप्रवरं प्रदिष्टम् ॥९१॥ प्रायोपवेशं प्रयतः प्रयत्नाद् यस्तेषु कुर्यात्प्रमदा पुमान्वा । तीर्थेपि संयोज्य मनोपि चेत्थं भुंक्ते फलं ब्रह्मगृहे यथेष्टम् ॥९२॥ तस्योपकंठे म्रियते हि यैस्तु कर्मक्षयात् स्थावरजंगमैश्च । ते चापि सर्वे सकलं प्रसह्य लभंति यज्ञस्य फलं दुरापम् ॥९३॥ ततस्तु सा धर्मफलारणी च जन्मादिदुः खार्दितचेतसां तु । सर्वात्मना चारुफला सरस्वती सेव्या प्रयत्नात्पुरुषै महानदी ॥९४॥ तत्र ये सलिलं पूतं पिबंति सततं नराः । न ते मनुष्या देवास्ते जगत्यामिह संस्थिताः ॥९५॥ मार्ग हो । सुन्दर, विकसित तथा सघन विल्वों के द्वारा वह रोमाञ्च युक्त स्निग्ध तथा वस्तराच्छादित ख्बियों के स्तन के समान प्रतीत होता है । वह शिखर हर ओर से गुनुगुनाते हुए श्रमरों से सुशोभित होता है ॥८ २-८३॥ कोयलों की ध्वनि तथा मयूरों की केका ध्वनि से वह शिखर सुशोभित होता है । उस सुन्दर शिखर से अत्यन्त सुन्दर तथा पवित्र सरस्वती नदी निकलती है ॥८४॥ पवित्र जलसे युक्त सरस्वती नदी ब्रह्माजी की पुत्री है । वंश स्तम्ब से वह धारा विस्तृत हो जाती है, वहाँ से थोड़ी दूर तक वह उत्तर की ओर प्रवाहित होती है । थोड़ी दूर के बाद वह पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है । वहाँ से प्रसन्न वह सरस्वती देवी प्रकट हो जाती है ॥८५-८६॥ वह प्राणियों पर कृपा करने के लिए अन्तर्धान नहीं होती हैं । पुष्करतीर्थ में ब्रह्माजी ने सरस्वती नदी के पाँच स्रोतों का वर्णन किया है । वे स्रोत हैं १. कनका, २. सुप्रभा, ३. नन्दा, ४. प्राची और ५. सरस्वती ॥८७॥ सरस्वती नदी के तट में अत्यन्त मनोहर तीर्थ तथा मन्दिर विद्यमान हैं ॥८८॥ उन सबों में सिद्धों तथा मुनियों का निवास है । उन सबों में होने वाले धर्मों का कारण सरस्वती नदी है ॥८९॥ उन तीर्थो मे स्नान करके सुवर्ण, परथिवी तथा कन्या का दान करना अक्षय फलप्रद होता है ॥९०॥ मुनीन्द्रो ने वहाँ पर अन्नदान करने तथा तिलदान करने का श्रेष्ठ फल बतलाया है । उन तीर्थो में अन्नदान करने को अत्यन्त कल्याणप्रद बलाया गया है ॥९१॥ जो स्त्री अथवा पुरुष संयम पूर्वक रहकर वहाँ पर प्रयत्नपूर्वक उपवास करते हैं, वे ब्रह्मलोक में जाकर यथेष्ट फल को प्राप्त करते हैं ॥९२॥ जो स्थावर अथवा जङ्गम प्राणी कर्म का क्षय ही जाने के कारण सरस्वती के तट पर अपने शरीर को त्यागते हैं, वे भी यज्ञों के दुष्प्राप्य फल को प्राप्त करते है ।९३।। अतएव जन्मादि दुःखों से संतप्त जीवों के लिए यह सरस्वती नदी धर्मरूपी फल को प्रदान करती है । वह सरस्वती नदी हर प्रकार से मनोहर फल प्रदान करने वाली है, अतएव मनुष्यों को उसका
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