Srishti Khanda Extracted Page 431
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-431
Sanskrit Original
तत्रागतास्तु ये वर्णाः सर्वे ते पुण्यभाजनाः । द्विजैस्तुल्या न संदेहो विना मंत्रेण ते नृप ॥६८॥ आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित्। महती सा तिथिज्ञेया स्नाने दाने तथोत्तमा ॥६९॥ यदा याम्यं तु भवति ऋक्षं तस्यां तिथौ क्वचित् । तिथिः सापि महापुण्या यतिभिः परिकीर्तिता ॥७०॥ प्राजापत्यं यदा ऋक्षं तिथौ तस्यां नराधिप। सा महाकार्तिकी प्रोक्ता देवानामपि दुर्लभा॥७ ९॥ यदाचार्के गुरौ सोमे वारेष्वेतेषु वै त्रिषु । त्रीण्येतानि च च ऋक्षाणि स्वयं प्रोक्तानि ब्रह्मणा॥७२॥ अत्राश्चमेधिकं पुण्यं स्नातस्य भवति ध्रुवम् । दानमक्षयतां याति पितृणां तर्पणं तथा ॥७३॥ विशाखासु यदा भानुः कृत्तिकासु च चंद्रमाः । सयोगः पुष्करो नाम पुष्करेष्वति दुर्लभः ॥७४॥ अंतरिक्षावतीर्णे तु तीर्थे पैतामहे शुभे । स्नानं येऽत्र करिष्यंति तेषां लोका महोदयाः ॥७५॥ नस्पृहां तेन्यपुण्यस्य कृतस्याप्यकृतस्य च । करिष्यंति महाराज सत्यमेतदुदाहतम्॥७६॥ तीर्थानां प्रवरं तीर्थ पृथिव्यामिह पठ्यते । नास्मात्परं पुण्यतीर्थं लोकेषु नृप पठ्यते ॥७७॥ कार्तिक्यां तु विशेषेण पुण्या पापहरा शुभा। उदुंबरवनात्तस्मादागाता च सरस्वती ॥७८॥ तया तत्पूरितं तीर्थ पुष्करं मुनिसेवितम् । दक्षिणे शिखरं भाति पर्वतस्याविदूरतः ॥७९॥ नीलाञ्जनचयप्रख्यं वर्णतो नीलशाद्दलम् । तया तच्छिखरं तस्य खस्थितं पुष्करं यथा ॥८०॥ प्रावृट्काले वियत्पूर्ण घनवृंदमिवोच्छितम्। कदंबपुष्पगंघाढ्यं कुटजार्जुनभूषितम् ॥८ १॥ रथमार्गमिवारोढुं रवेस्तच्छिखरं स्थितम् । वृत्तेस्सपुलकैस्स्निग्धे: स्त्रीणामिव पयोधरैः ॥८ २॥ हे । हे राजन् ! वह पुष्कर ब्रह्माजी के साथ सबों को भी पुण्य प्रदान करता है ॥६७॥ वहाँ पर जिस वर्ण के भी मनुष्य आ जायँ वे सभी पुण्य के भागी होते हैं । वे मन्त्र के बिना भी ब्राह्मणों के सदृश हो जाते है ॥६८॥ यदि कार्तिक पूर्णिमा के दिन अग्नि देवताक कृतिका नक्षत्र हो तो उसे महती तिथि समझना चाहिए तथा वह स्नान एवं दान के लिए उत्तम हैं ॥६९॥ यदि उस तिथि को यम देवताक भरणी नक्षत्र हो तो उसे यति जनों ने अत्यन्त पुण्यप्रद तिथि बतलाया है ॥७०॥ हे नराधिप ! यदि उस तिथि को प्रजापति देवताक रोहिणी नक्षत्र हो तो उस तिथि को महाकार्तिकी कहा गया है वह देवताओ को भी दुर्लभ है ॥७१॥ यदि ये तिथियाँ रवि, गुरु अथवा सोमवार को उपर्युक्त नक्षत्र से युक्त हों तो उस दिन पुष्कर में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, यह ब्रह्माजी ने कहा है । तथा इस तिथि को किया हुआ दान एवं पितरों को तर्पण अक्षय होता है ॥७२-७३॥ यदि विशाखा नक्षत्र में सूर्य हों तथा कृत्तिका नक्षत्र में चन्द्रमा हों तो उसे पुष्करयोग कहते है, और पुष्करों में वह दुर्लभ होता है ॥७४॥ अन्तरिक्ष से अवतीर्ण हुए ब्रह्माजी का तीर्थ (पुष्कर) में उस समय जो स्नान करता है, उसको अत्यन्त आभ्युदयिक लोकों की प्राप्ति होती है ॥७५॥ हे महाराज ! मैं यह सत्य कहता हूँ कि वे लोग किसी दूसरे पुण्य को करने अथवा नहीं करने की इच्छा नहीं करेंगे ॥७६॥ हे राजन् ! पुष्कर तीर्थ सभी तीर्थो में श्रेष्ठ तीर्थ हे, इससे बढकर कोई भी दूसरा तीर्थ नहीं है ॥७७॥ उदूम्बर वन से आयी हुयी सरस्वती नदी कार्तिक पुर्णिमा के दिन विशेष रूप से पुण्यों को प्रदान करने वाली तथा पापों को विनष्ट करने वाली होती है ॥७८॥ उस सरस्वती नदी ने ही पुष्कर तीर्थ को जल से भर दिया है । वह पर्वत के सन्निकट दक्षिण शिखुर पर सुशोभित होती है ॥७९॥ वह शिखर नीलाज्ञन (काजल) के समान वर्ण वाला तथा घासों से भरा है । उस सरस्वती नदी के द्वारा वह शिखर पुष्कर के समान स्थित है ॥८०॥ वर्षाकाल में आकाशस्थ मेघ वृन्द के समान काला-काला प्रतीत होता है । वह कदम्ब पुष्प की सुगन्धि से भरा हुआ तथा कुटज एवं अर्जुन वृक्षों से भरा हुआ है ॥८१॥ लगता है कि जैसे वह शिखर सूर्य रथ के ऊपर चढने का
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