Srishti Khanda Extracted Page 430

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-430

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Sanskrit Original

प्रेतानां तु विमानानि आगतानि समंततः । अस्य विप्रस्य संभाषात्पुण्यसंकीतनेन च॥५४॥ तस्मात्सर्व प्रयत्नेन सतां संभाषणं कुरु । यदि ते श्रेयसा कार्य गङ्गासुत अतंद्रितः ॥५५॥ तिलकं सर्वधर्मस्य पञ्च प्रेतकथामिमाम्। पठेल्लक्षं योऽस्य कुले न प्रेतो जायते नरः ॥५६॥ श्रृणोति वाप्यभीक्ष्णं वा श्रद्धया परयान्वितः । भक्तया समन्वितो वापि न प्रेतो जायते नरः ॥५७॥ भीष्म उवाच अंतरिक्षे किमर्थ तु पुष्करं परिकीर्त्यते। मुनिभिर्धर्मशीलैश्च लभ्यते तत्कथं त्विह ॥५८॥ येन तल्लभ्यते लब्धं लब्धं चैव फलप्रदम्। तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कौतुकादेव पृच्छतः ॥५९॥ पुलस्त्य उवाच ऋषिकोटिस्समायाता दक्षिणापथवासिनी । स्नानार्थ पुष्करे राजन् पुष्करं च वियद्वतम्॥६०॥ मत्वा ते मुनयः सर्वे प्राणायामपरायणाः । ध्यायमाना: परंब्रह्म स्थिता द्वादशवत्सरान् ॥६१॥ ब्रह्मा महर्षयस्तत्र देवास्सेन्द्रास्समागताः । ऋषयोन्तर्हिताः प्रोचुर्नियमांस्ते सुदुष्करान् ॥६२॥ आकारणं पुष्करस्य मंत्रेण क्रियतां द्विजाः । आपोहिष्ठेति तिसृभि ऋग्भिः सांनिध्यमेष्यति॥६ ३॥ अघमर्षणजप्येन भवेद्वे फलदायकम् । विप्रैर्वाक्यावसाने तु सर्वैस्तैस्तु तथाकृतम् ॥६४॥ कृतेन पुण्यतां प्राप्ता ये निदेशाच्च ते द्विजाः | गर्हिता धर्मशास्त्रेषु ते विप्रा दक्षिणोत्तराः॥६५॥ ये चान्ये पार्वतीयाश्च श्राद्धेनार्हन्ति केतनम् । एतस्मात्कारणाद्राजन् वियत्येवं समास्थितम् ॥६६॥ कार्तिक्यां पुष्करं स्नानात्पूततामभियच्छति । ब्रह्मणा सहितं राजन्सर्वेषां पुण्यदायकम्॥६७॥ देवताओं ने अनेक प्रकार के पुष्पों की वृष्टि की ॥५३॥ उसी समय प्रेतों के लिए विमान आ गये, क्योंकि उस ब्राह्मण के साथ प्रेतों की वर्ता हुयी थी और उस ब्राह्मण ने पुण्यों का वर्णन किया था ॥५४॥ हे गङ्गापुत्र ! यदि तुम्हे कल्याण प्राप्त करना हो तो निरालस होकर तुम भी हर प्रकार के प्रयास द्वारा सज्जनों के साथ बाते करो ॥५५॥ पाँच ् रेतों की यह कथा सभी धमो में श्रेष्ठ है, जो इस कथा को पढता है, वह मृत्यु के बाद प्रेत नहीं होता है ॥५६॥ अथवा जो व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा सम्पन्न होकर इस कथा का श्रवण करता है, वह मरकर प्रेत नहीं होता है ॥५७॥ भीष्मजी ने कहा-- पुष्कर को अन्तरिक्षस्थ क्यों बतलाया जाता है ? क्यों यह कहा जाता है कि धर्मशील मुनिगण ही उसे प्राप्त करते हैं ।॥५८।। जिसने इस पुष्कर को प्राप्त किया तथा उसे प्राप्त करके जिस फल को प्राप्त किया, उन सारी बातों को आप मुझे बतलायें, में इस बात को कौतुकवशात् पूछ रहा हूँ ॥५९॥ पुलस्त्य महर्षि नेकहा-- हे राजन् ! एक बार दक्षिणापथ में रहने वाले करोड़ो मुनिगण पुष्कर में स्नान करने के लिए आये ॥६०॥ प्राणायाम परायण वे लोग पुष्कर को आकाश स्थित मानकर परब्रह्म का ध्यान करते हुए बारह वर्षों तक वहाँ रहे ॥६१॥ उस समय वहाँ, ब्रह्माजी, महर्षिगण, इन्द्र तथा सभी देवता आकर अन्तर्धान ही रहकर उन्हें अत्यन्त दुष्कर नियमों को बतलाये ॥६२॥ उन लोगों ने कहा हे ऋषियों ! आपलोग आवाहन मन्त्र से पुष्कर का आवाहन कीजिये । आपो हिष्ठाः इत्यादि तीन मन्त्रों से आवाहन करने पर वह पुष्कर सन्निकट आ जायेगा ॥६३।। अघमर्षण मन्त्र का जप करने से वह फलप्रद होता है । यह सुनकर उन ब्राह्मणों ने वैसा ही किया ॥६४॥ जिन ब्राह्मणों ने कर्म करके पुण्य प्राप्त किया है, अथवा जो कहने मात्र के लिए ब्राह्मण है, जिनको धर्मशास्रं में निन्दित बतलाया गया है, वे ब्राह्मण दक्षिणोत्तर है ॥६५॥ जो पार्वतीय ब्राह्मण, हैं, उनको श्राद्ध में नहीं सम्मिलित किया जाता है । हे राजन् ! इसी कारण पुष्कर आकाश में ही स्थित है ॥६६॥ कार्तिक पूर्णिमा के दिन उसमें स्नान करने से वह पावित्र्य प्रदान करता

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