Srishti Khanda Extracted Page 429
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-429
Sanskrit Original
झक श्रीपद्ममहापुराण देवतातिथिपूजासु गुरुपूजासु नित्यशः । रतो वै पितृपूजासु न प्रेतो जायते नरः ॥४२॥ शुक्लांगारकसंयुक्ता चतुर्थी जायते यदा । श्रद्धया श्राद्धकृत्तस्यां न प्रेतो जायते नरः ॥४३॥ जितक्रोधविमर्शों यस्तृष्णासंगविवर्जितः। क्षमावान् दानशीलश्च न प्रेतो जायते नरः ॥४४॥ गोब्राह्मणांश्च तीर्थानि पर्वतांश्च नदीस्तथा । देवांश्चैव तु यो वन्द्यान्न प्रेतो जायते नरः ॥४५॥ प्रेता ऊचुः श्रुताश्च विविधा धर्माः पृच्छामो दुःखिता मुने । येन वै जायते प्रेतस्तन्नो वद महामते ॥४६॥ ब्राह्मण उवाच शूद्रान्नेन तु भुक्तेन ब्राह्मणेन विशेषतः । प्रियते ह्युदरस्थेन स वै प्रेतो भवेन्नरः ॥४७॥ मातरं पितरं भ्रातृन् भगिनीं सुतमेव च । अदृष्टदोषांस्त्यजति स ग्रोतो जायते नरः ॥४८॥ अयाज्ययाजनाच्चैव याज्यस्य च विवर्जनात् । रतो वै शूद्रसेवासु स प्रेतो जायते नरः॥४९॥ न्यासापहर्ता मित्रश्चुक् शूद्रपाकरतः सदा । विस्रम्भघाती कूटस्थः स प्रेतो जायते नरः ॥५०॥ ब्रह्महा गोघ्नकः स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगः । भूमि कन्यापहर्त्ता च स प्रेतो जायते नरः ॥५१॥ सामान्यां दक्षिणां लब्ध्वा एक एव निगूहति । नास्तिकीभावनिरतः स वै प्रेतोभिजायते ॥५२॥ एवं ब्रुवाणे विप्रेनद्रे आकाशे दुंदुभिस्वनः । पुष्पवृष्टिः पपातोर्व्यां देवैर्मुक्ता सहस्रशः ॥५३॥ अपमान दोनों को एक समान मानता है, अथवा सुवर्ण तथा मिट्टी के ढेले दोनों को एक समान समझता है, शत्रु तथा मित्र दोनों के साथ एक समान व्यवहार करने वाला भी प्रेत नहीं होता है ॥४१॥ जो व्यक्ति देवता, अतिथि तथा गुरुजन की पूजा करता है, पितरों का पूजन करता है वह व्यक्ति प्रेत नहीं होता है ॥४२॥ जिस दिन शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि हो उस दिन जो श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करता है, वहं प्रेत नहीं होता है । शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को यदि भौमवार हो उस दिन यदि कोई पितरों श्राद्ध करता है तो वह मृत्यु के पश्चात् प्रेत नहीं होता हे॥४३॥। जो विचारशील व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर लेता है तथा जो लालच तथा आसक्ति से रहित होता है, क्षमा करने वाला तथा दानशील होता है, वह मृत्यु के पश्चात् प्रेत नहीं होता है ।४४॥ जो गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, नदी, पर्वत तथा देवताओं की वन्दना करता है, वह मृत्यु के पश्चात् प्रेत नहीं होता है ।॥४५॥। प्रेतों ने कहा-- हे मुने ! हमलोगों ने अनेक धर्मों को आपसे सुना, किन्तु दुःखी होने के कारण हम आप से पूछते हैं; आप हमें उन कर्मो को बतलायें जिनके कारण कोई प्रेत होता है ॥४६॥ ब्राह्मण ने कहा-- यदि कोई ब्राह्मण किसी शूद्र का अन्न खाय और उस अत्न को पचाये बिना ही यदि मर जाय तो वह मरकर प्रेत होता है ॥४७॥ यदि कोई अपने निर्दोष माता-पिता, भाई-बहन तथा पुत्र का परित्याग कर देता है तो वह मर कर प्रेत होता है ।॥४८।। अयाज्य याजन कराने वाला तथा याज्य के याजन का परित्याग करने वाला, तथा शूद्रों की सेवा करने वाला ब्राह्मण मर कर प्रेत होता है।।४९॥ किसी के घरोहर को हड़पने वाला, मित्र से द्रोह करने वाला, शूद्र का भोजन बनाने वाला, विश्वस्त व्यक्ति के साथ विश्वासघात करने वाला तथा कूटभाषी (झगड़ा लगाने वाला) व्यक्ति मरकर प्रेत होता है ॥५०॥ ब्राह्मण तथा गौ की हत्या करने वाला, चोर, शराबी, गुरु की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने वाला, भूमि तथा कन्या का अपहरण करने वाला ये सबके सब मरकर प्रेत होते हैं ॥५१॥ सम्मिलित रूप से सबों की दक्षिणा लेकर जो ब्राह्मण अकेले उसे छिपा कर रख लेता है, सदा नास्तिकता से युक्त रहने वाला ये सबके सब मर कर प्रेत होते हैं ॥५२॥ जिस समय वह ब्राह्मण इस तरह की बातें कह रहा था उसी समय आकाश में दुन्दुभि की ध्वनि होने लगी और
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