Srishti Khanda Extracted Page 428

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-428

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Sanskrit Original

पर्युषितो लम्बग्रीवो लंबोदर उदाहत:। बृहद्वृषणलंबोष्ठ: पापादस्मादजायत ॥२९॥ एतत्ते सर्वमाख्यातमात्मवृत्तं सहेतुकम् । पृच्छस्व यदि ते श्रद्धा पृष्टाश्च कथयामहे ॥३०॥ ब्राह्मण उवाच ये जीवा भुवि तिष्ठंति सर्वेप्याहारमूलकाः । युष्माकमपि चाहारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३१॥ प्रेता ऊचुः श्रृणुष्वाहारमस्माकं सर्वसत्वविगर्हितम् । यच्छुत्वा निंदसे विप्र भूयो भूयश्च नित्यशः॥३२॥ श्लेष्ममूत्रपुरीषैण योषिदङ्गमलेन च। गृहाणि त्यक्तशौचानि प्रेताभुंजंति तत्र वै ॥३३॥ स्रीभिर्दग्धानि कीर्णानि प्रकीर्णोच्छिष्टकानि च । मलेनापि जुगुप्स्यानि प्रेता भुंजंति तत्र वै ॥३४॥ चित्तलज्जाविहीनानि होमहीनानि यानि च। व्रतैश्चैव विहीनानि प्रेता भुंजति तत्र वै॥३५॥ गुरवो नैव पूज्यते स्त्रीजितानि गृहाणि च । क्रोधलोभगृहीतानि प्रेता भुंजंति तत्र वै॥३६॥ त्रपा मे जायते तात कथ्यमानेस्वभोजने । अस्मात् परतरं चान्यन्न वक्तुमपि शक्यते ॥३७॥ निवृत्तिं प्रेतभावस्य पृच्छामस्त्वां दृढव्रत । यथा न भवति प्रेतस्तन्मे वद तपोधन ॥३८॥ ब्राह्मण उवाच एकरात्रद्विरात्रादि कृच्छ्चांद्रायणादिभिः। व्रतैरन्यैःकृतै नित्यं न प्रेतो जायते नरः ॥३९॥ त्रीनम्नीन्पञ्च चैकं वा योहन्यहनि सेवते। सर्व भूतदयापन्नो न प्रेतो जायते नरः ॥४०॥ तुल्यो मानेऽपमाने च तुल्यः कांचनलोष्टयोः। तुल्यः शत्रौ च मित्रे च न प्रेतो जायते नरः ॥४१॥ मे पर्युर्षित हूँ मेरी गर्दन लम्बी हो गयी है और पेट बड़ा हो गया है । पाप के कारण मेरे अण्डकोश बड़े हो गये हैं, ओठ लम्बे हो गये हैं । यह इसी पाप का फल है । इसतरह से हमलोगों ने अपना वृत्तान्त बतलाया । आपका मन हो तो दूसरा कुछ भी पूछिये । पूछने पर हमलोग बतलायेंगे ॥२९-३०॥ ब्राह्मण ने कहा-- संसार में रहने वाले सभी जीवों को अपने आहार के ही बलपर रहना पड़ता हे । अतएव आपलोगों का आहार क्या है ? उसे आप हमें बतलायें ॥३ १॥ प्रेतों ने कहा-- हमलोगों का आहार अत्यन्त निन्दित है, उसे आप सुनें । उसको सुनकर आप हमारी बार-बार निन्दा करेंगे ॥३२॥ बलगम, पेशाब, विष्ठा और स्त्रियों के शरीर का मल, ये ही हमारे भोजन हैं । जिस घर में पावित्र्य का पालन नहीं किया जाता है, उस धर में प्रेत भोजन करते हैं ॥३३॥ जिस घर में स्त्रियों द्वारा जले हुए तथा इधर-उधर छीटें गये जूठे पड़े रहते हैं, जो विष्ठा से भी अधिक घृणित पदार्थ हैं, वे जहाँ रहते हैं, वहीं पर प्रेत भोजन करते हैं ॥।३४॥। जिस घर के लोगों में निर्लज्जता है, होम नहीं किया जाता है, जहाँ के लोग व्रत नहीं करते हैं, उस स्थान पर प्रेत भोजन करते हैं ॥३५॥ जिस घर में अपने से बड़े लोगों का अपमान होता है, जिस घरमे स्तरियो का ही प्रभुत्व हो और घर में रहने वाले लोग क्रोधी और लोभी हों उसी घर में प्रेत भोजन करते हैं ॥३६॥हे तात ! हमे अपने भोजन का वर्णन करने में स्वयं लज्जा होती है, अतएव इससे अधिक मैं वर्णन नही कर सकताहूँ ॥३७॥ हे दृढत्रत ! हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि किस कर्म के करने से प्रेतत्व से मुक्ति मिलती है ? जिसके करने से जीव प्रेत नहीं होता है, हे तपोधन ! हमें उस साधन को आप बतलाइये ॥३८॥ ब्राह्मण ने कहा-- एक रात अथवा दो रातों का भी कृच्छ चान्द्रायण आदि ब्रत करने वाला भी मनुष्य प्रेत नहीं होता है । दूसरेत्रतों को भी करने से जीव प्रेत नहीं होता है ।॥।३९॥ जो व्यक्ति प्रतिदिन तीन अग्नियों अथवा पञ्जग्नियों का सेवन करता है, वह प्रेत नहीं होता है । दूसरे जीवों पर दया करने वाला प्रेत नहीं होता है ॥४०॥ जो व्यक्ति मान तथा

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