Srishti Khanda Extracted Page 427

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-427

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Sanskrit Original

कि वा चैव कृतं कर्म येन प्राप्ताश्न वैकृतम्। कथमेवं विधाः सर्वे प्रस्थिताः कुत्र चाध्वनि ॥९७॥ प्रेता ऊचुः क्षुत्पिपासान्विता नित्यं महादु: खसमावृताः । हृतप्रज्ञा वयं सर्वे नष्ट सञ्ज्ञा विचेतसः ॥१८॥ न जानीमो दिशं चापि प्रदिशं चापि कांचन । नांतरिक्षं महीं चापि न जानीमो दिवं तथा ॥१९॥ यदेतदुःखमाख्यात मेतदेवसुखं भवेत् । प्रभातमिदमाभाति भासकरोदय दर्शनात् ॥२०॥ अहं पर्युषितो नाम सूचीमुखस्तथा परः । शीघ्रगो रोहकश्चैव पंचमो लेखकस्तथा ॥२१॥ ब्राह्मण उवाच प्रेतानां कमीर्तानां नाम्नां वै संभवः कुतः । किं तत्कारणमुद्दिश्य यतो यूयं सनामकाः ॥२२॥ प्रेता ऊचुः अहं स्वादुसदाभुंजे दद्यां पर्युषितं द्विजे। एतत्कारणमासाद्य नाम पर्युषितो मम ॥२३॥ सूचिता बहवोनेन विप्राश्चान्नाद्यकांक्षिणः । एतत्कारणमुद्दिश्यसूचीमुखाभिधो मतः ॥२४॥ शीघ्रे गतोस्मि विप्रेण याचितः क्षुधितेन च । एतत्कारणमुद्दिश्यशीघ्रगो द्विजसत्तम ॥२५॥ गृहोपरि सदा स्वादु भुंक्ते द्विजभयेन हि । उद्विग्रमानसस्तत्र तेनासौ रोहकः स्मृतः ॥२६॥ मौने चापि स्थितो नित्यं याचितो विलिखन्महीम् । अस्माकमपि पापिष्ठो लेखको नाम नामतः॥२७॥ कृच्छेण लेखको याति रोहकस्तु आवाकशिरा: । शीघ्रगः पंगुतां प्राप्तः सूची सूचीमुखोभवत्॥२८॥ भयङ्कर तथा पापी उन पुरुषों को देखकर, वे थोड़ा डर गये और वहीं चुपचार खड़े हो गये ॥१५॥ उसके बाद धैर्य धारण करके तथा भय को छोड़कर उन सवों से मधुर वाणी में पूछे; आपलोग कौन हैं ? और आपलोगों का आकार क्यों विकृत हैं ?॥१६॥ आपलोगों ने कोन सा कर्म किया है; जिसके कारण इस तरह का आपलोगों का आकार हो गया ?। आपलोग यहाँ पर क्यों रास्ते में खड़े हैं ?।।१७॥। प्रेतों ने कहा-- हमलोग भूखे-प्यासे हैं, हमलोगों को बड़ा ही कष्ट है । हम सबों का ज्ञान नष्ट हो गया है, हमारी चेतना भी समाप्त हो गयी है ।।१८॥ हमलोगों को दिशाओं और विदिशाओं का कोई भी ज्ञान नहीं है । हमलोग अंतरिक्ष, पृथिवी तथा स्वर्गलोक को भी नहीं जानते हैं॥१९॥ हमलोग दुःख को ही सुख समझ लेते हैं । सूर्योदय को ही देखकर हम जानते हैं कि सबेरा हो गया ॥२०॥ मेरा नाम पर्युषित है, इस दूसरे का नाम सूचीमुख है, तीसरे का नाम शीघ्रग है, चौथे का नाम रोहक है और पाञ्चवे का नाम लेखक है ।।२१॥ ब्राह्मण ने कहा-- आपलोग तो अपने कर्म के फल स्वरूप प्रेत हो गये हैं अतएव आपलोगों का नाम कैसें सम्भव है ? किस कारण से आपलोगों के ये नाम हो गये हें ?॥।२२॥ प्रेतों ने कहा-- में सदा स्वादिष्ट वस्तु खाता था और ब्राह्मणों को वासी वस्तुएँ देता था, इसी कारण से मेरा नाम पर्युषित हो गया॥२३॥ इस दूसरे सूचीमुख ने भूखे बहुत से ब्राह्मणों को मार दिया था, इसीकारण से इसका नाम सूचीमुख है ॥२४॥ तीसरा यह शीघ्रग है, किसी भूखे ब्राह्मण के मांगने पर यह शीघ्रता से चल देता था । हे द्विजश्रेष्ठ ! इसी कारण से इसका नाम शीघ्रग है ॥२५॥ इस चौथे का रोहक नाम इसलिए है कि यह अकेले ही छिपकर अच्छी वस्तुएँ खा लेता था कि कोई ब्राह्मण मुझसे इन सब वस्तुओं को माँग न ले । अतएव यह रोहक है ॥२६॥ यह लेखक हम पाँचों में सबसे बड़ा पापी है । यह किसी ब्राह्मण के कुछ माँगने पर मौन होकर खड़ा हो जाता था अथवा अपने पैर से जमीन कुरेदने लग जाता था ॥२७॥ यह लेखक लङ्गड़ा है, बड़ी मुश्किल से चल पाता है, इस रोहक को शिर नीचे और पैर ऊपर करके चलना पड़ता है । यह शीघ्रग लङ्गडा हो गया है सूचीमुख का मुँह सूई से सिल दिया गया है ॥२८॥

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